मंगलवार, 22 अगस्त 2017

... पता ही नहीं चला.


बारिश की बूंदे 
गिरती लगातार 
रोक देती हैं 
गति जिंदगी की 
और बहा ले जाती हैं 
अपने साथ 
कभी दर्द 
तो 
कभी खुशी भी 
वक्त संग संग 
बहता है 
और नहीं 
रूकता 
अपनी 
आदत के अनुसार 
और बूंदे 
कभी 
दर्द मिटाती हैं 
कभी 
खुशी चुराती हैं 
और कैसे वक्त को 
बहा ले जाती हैं 
कुछ ऐसे 
कि 
मुंह से बस 
यही 
निकलता है 
कि 
कब वक्त 
बीत गया 
पता ही नहीं चला. 

शालिनी कौशिक 
(कौशल) 

रविवार, 20 अगस्त 2017

राजीव गांधी :अब केवल यादों में - शत शत नमन


एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनकी जयंती के अवसर पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी कैसे चाह रहे थे कि राजीव जी आयें और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाएँ क्योंकि ये बच्चों की समझ थी कि जो जल्दी से आकर कुर्सी पर बैठ जायेगा वही प्रधानमंत्री हो जायेगा.तब हमारे दिमाग की क्या कहें वह तो उनके व्यक्तित्व पर ही मोहित था जो एक शायर के शब्दों में यूँ था-
''लताफत राजीव गाँधी,नफासत राजीव गाँधी ,
         थे सिर से कदम तक एक शराफत राजीव गाँधी ,
नज़र आते थे कितने खूबसूरत राजीव गाँधी.''
राजीव जी का  जन्म २० अगस्त १९४४ को हुआ था और राजनीति से कोसों दूर रहने वाले राजीव जी अपनी माता श्रीमती इंदिरा जी के  कारण राजनीति में  आये और देश को पंचायत राज और युवा मताधिकार जैसे उपहार उन्होंने दिए .आज  उनकी जयंतीके अवसर पर मैं उन्हें याद करने से स्वयं को नही रोक पाई किन्तु जानती हूँ कि राजीव जी भी राजनीति में आने के कारण बोफोर्स जैसे मुद्दे का कलंक अपने माथे पर लगाये २१ मई १९९१  को एक आत्मघाती हमले का शिकार होकर हम सभी को छोड़ गए आज भी याद है वह रात जब १०.२० मिनट पर पापा कहीं बाहर से आकर खाना खा रहे थे और  हम कैरम खेल रहे थे कि विविध भारती  का  कार्यक्रम छाया गीत बीच में  बंद हुआ और जैसे ही एक उद्घोषक ने कहा ,''अखिल भारतीय कॉंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष....''और इससे पहले कि वह कुछ बोलता कि पापा बोले कि राजीव गाँधी की हत्या हो गयी हम चीख कर पापा से क्या लड़ते क्योंकि अगले पल ही यह समाचार उद्घोषक बोल रहा था और हमारा राजनीति  से सम्बन्ध तोड़ रहा था राजीव जी के साथ हमने राजनीति में रूचि को भी खो दिया बस रह गयी उनकी यादें जो हम आज यहाँ आप सभी से शेयर  कर रहे हैं हालाँकि जानते हैं कि ब्लॉग जगत में अधिकांश उनके खिलाफ हैं किन्तु हम जिनसे आज तक  जुड़े हैं वे राजीव जी ही थे और वे ही रहेंगे.
श्रीमती मुमताज़ मिर्ज़ा के शब्दों में -
''रहबर गया,रफीक गया,हमसफ़र गया,
राजीव पूरी कौम को मगमून कर गया.
सदियाँ भुला सकेंगी न उसके कमाल को,
राजीव चंद सालों में वो काम कर गया.''


शालिनी कौशिक
                      

शनिवार, 19 अगस्त 2017

शत शत नमन शंकर दयाल शर्मा जी को


Shankar Dayal Sharma 36.jpg
विकिपीडिया से साभार 
 आज जन्मदिन है देश के  नौवें राष्ट्रपति  डाक्टर शंकर दयाल शर्मा जी का और वे सदैव मेरे लिए श्रद्धा के पात्र रहेंगे क्योंकि उनके बारे में जो सबसे महत्वपूर्ण है वह ये कि मुझे अच्छी तरह से याद है कि देश के प्रथम नागरिक के पद से जब उनकी सेवानिवृति का अवसर आया तो उनके चेहरे पर तनिक भी विषाद  नहीं था बल्कि थी हमेशा की तरह मुस्कान। आज उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर मैं आपके और अपने लिए विकिपीडिया से कुछ जानकारी जुटा  लायी हूँ और चाहती हूँ कि आप भी मेरी तरह इन महान शख्सियत को ऐसे समय में याद करें और नमन करें जब स्वयं को देश पर थोपने वाले नेताओं की केंद्र में भीड़ बढती जा रही है। तो लीजिये आप भी जानिए हमारे देश को गौरवान्वित  और स्वयं किसी भी घमंड से दूर रहने वाले सीधे सरल इन्सान शंकर दयाल शर्मा जी के बारे में -

शंकरदयाल शर्मा

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
शंकरदयाल शर्मा

कार्य काल
२५ जुलाई १९९२ – २५ जुलाई १९९7
उप राष्ट्रपति  कोच्चेरी रामण नारायणन
पूर्ववर्तीरामस्वामी वेंकटरमण
उत्तरावर्तीकोच्चेरी रामण नारायणन

जन्म१९ अगस्त १९१८
भोपालमध्यप्रदेशभारत
मृत्यु२६ दिसंबर १९९९
नई दिल्लीभारत
राजनैतिक पार्टीभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
जीवनसंगीविमला शर्मा
धर्महिन्दू
शंकरदयाल शर्मा (१९ अगस्त १९१८- २६ दिसंबर १९९९भारत के नवें राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल २५ जुलाई १९९२ से २५ जुलाई १९९७ तक रहा।राष्ट्रपति बनने से पूर्व आप भारत के आठवे उपराष्ट्रपति भी थे, आप भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री (1952-1956) रहे तथा मध्यप्रदेश राज्य में कैबिनेट स्तर के मंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षा, विधि, सार्वजनिक निर्माण कार्य, उद्योग तथा वाणिज्य मंत्रालय का कामकाज संभाला था। केंद्र सरकार में वे संचार मंत्री के रूप में (1974-1977) पदभार संभाला। इस दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (1972-1974) भी रहे।

शिक्षा तथा प्रारम्भिक जीवन[संपादित करें]

डॉक्टर शर्मा ने सेंट जान्स कॉलेज आगरा, आगरा कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालयलखनऊ विश्वविद्यालय, फित्ज़विल्यम कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लिंकोन इन् तथा हारवर्ड ला स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। इन्होंनेहिन्दीअंग्रेजीसंस्कृत साहित्य में एम.ए. की डिग्री विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त की, आपने एल.एल.एम. की डिग्री भी लखनऊ विश्व विद्यालय से प्रथम स्थान के साथ प्राप्त की थी, विधि में पी.एच.डी. की डिग्री कैम्ब्रिज से प्राप्त की, आपको लखनऊ विश्विद्यालय से समाज सेवा में चक्रवर्ती स्वर्ण पदक भी प्राप्त हुआ था। इन्होंने लखनऊ विश्विद्यालय तथा कैम्ब्रिज में विधि का अध्यापन कार्य भी किया, कैम्ब्रिज में रहते समय आप टैगोर सोसायटी तथा कैम्ब्रिज मजलिस के कोषाध्यक्ष रहे, आपने लिंकोन इन से बैरिस्टर एट ला की डिग्री ली, आपको वहां पर मानद बेंचर तथा मास्टर चुना गया था, आप फित्ज़विल्यम कॉलेज के मानद फैलो रहे। कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय ने आपको मानद डॉक्टर ऑफ़ ला की डिग्री दे कर सम्मानित किया। आपका विवाह विमला शर्मा के साथ हुआ था|

राजनैतिक शुरूआत[संपादित करें]

१९४० के दशक में वे भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हो गए, इस हेतु उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ले ली, 1952 में भोपाल के मुख्यमंत्री बन गए, इस पद पर 1956 तक रहे जब भोपाल का विलय अन्य राज्यों में कर मध्यप्रदेश की रचना हुई।

सक्रिय राजनैतिक जीवन[संपादित करें]

1960 के दशक में उन्होंने इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व प्राप्त करने में सहायता दी। इंदिरा कैबिनेट में वे संचार मंत्री (1974-1977) रहे, 1971 तथा 1980 में उन्होंने भोपाल से लोक सभा की सीट जीती, इसके बाद उन्होंने कई भूष्नात्मक पदों पर कार्य किया, 1984 से वे राज्यपाल के रूप में आंध्रप्रदेश में नियुक्ति के दौरान दिल्ली में उनकी पुत्री गीतांजली तथा दामाद ललित माकन की हत्या सिख चरमपंथियों ने कर दी, 1985 से 1986 तक वे पंजाब के राज्यपाल रहे, अन्तिम राज्यपाल दायित्व उन्होंने 1986 से 1987 तक महाराष्ट्र में निभाया। इसके बाद उन्हें उप राष्ट्रपति तथा राज्य सभा के सभापति के रूप में चुन लिया गया गया इस पद पर वे १९९२ में राष्ट्रपति बनने तक रहे।
शर्मा संसदीय मानको का सख्ती से पालन करते थे ,राज्य सभा में एक मौके पर वे इसलिए रो पड़े थे कि क्योंकि राज्य सभा के सदस्यों ने एक राजनैतिक मुद्दे पर सदन को जाम कर दिया था। राष्ट्रपति चुनाव उन्होंने जार्ज स्वेल को हरा के जीता था इसमे उन्हें 66% मत मिले थे। अपने अन्तिम कार्य वर्ष में उन्होंने तीन प्रधानमंत्रियो को शपथ दिलाई।

बीमारी तथा मृत्यु[संपादित करें]

अपने जीवन के अन्तिम पाँच वर्षो में वे बीमार रहे ,९ अक्टूबर १९९९ को उन्हें दिल का दौरा पड़ने पर दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।     

राष्ट्रपति  डाक्टर शंकर दयाल शर्मा जी के जन्मदिन पर हम सभी भारतवासियों की ओर से शत शत नमन 
शालिनी कौशिक 
          [कौशल ]

सोमवार, 31 जुलाई 2017

तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .

Image result for seeta agni pariksha image

अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम ,
अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे ,
करती रहेगी सीता सदा मर्यादा का पालन
पर ठेकेदार मर्यादा के यहाँ तुम ही रहोगे .
..........................................................
इक रात भी नारी अगर घर से रही बाहर
घर से निकाल तुम उसे बाहर ही करोगे ,
पर लौटके तुम आ रहे दस साल में भी गर
पवित्रता की मूर्ति बन सजते रहोगे .
...................................................
इज़्ज़त के नाम पे यहां नारी की खिंचाई
इज़्ज़त के वास्ते उसे तुम क़त्ल करोगे ,
हमको खबर है बहक कलियुगी सूर्पणखा से
सबकी नज़र में इज़्ज़तदार बने रहोगे .
.......................................................
कुदरत ने दिया नारी को माँ बनने का जो वर
उसको कलंक तुम ही बनाते रहोगे ,
नारी की लेके कदम-कदम अग्नि-परीक्षा
तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .
...........................................................
 
 शालिनी कौशिक
     [कौशल ]

बुधवार, 26 जुलाई 2017

बनोगी उसकी ही कठपुतली

Image result for kathputli image

माथे ऊपर हाथ वो धरकर
बैठी पत्थर सी होकर
जीवन अब ये कैसे चलेगा
चले गए जब पिया छोड़कर
..........................................
बापू ने पैदा होते ही
झाड़ू-पोंछा हाथ थमाया
माँ ने चूल्हा-चौका दे दिया
चकला बेलन हाथ थामकर .
......................................
पढ़ना चाहा पाठशाला में
बाबा जी से कहकर देखा
बापू ने जब आँख तरेरी
माँ ने डांट दिया धमकाकर .
........................................
आठ बरस की होते मुझको
विदा किया बैठाकर डोली
तबसे था बस एक सहारा
मेरे पिया मेरे हमजोली .
......................................
उनके बच्चे की माता थी
उनके घर की चौकीदार
सारा जीवन अपना देकर
मिला न एक भी खेवनहार .
..........................................
आज गए वो मुझे छोड़कर
घर-गृहस्थी कहीं और ज़माने
बच्चों का भी लगा कहीं मन
मुझको सारे बोझ ही मानें .
..............................................
व्यथा कहूं क्या इस जीवन की
जिम्मेदारी है ये खुद की
मर्द के हाथ में दी जब डोरी
बनोगी उसकी ही कठपुतली .
...............................................
शालिनी कौशिक
    [कौशल]

शनिवार, 22 जुलाई 2017

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

Image result for weeping indian daughter image

   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारीख दर तारीख अदालत के सामने गुहार लगाने के बावजूद कुछ नहीं कर पाए ,क्या वकील साहब अब कहीं इंसाफ नहीं है ? " रोते रोते उसने मेरे सामने अपनी बहन की दहेज़ हत्या में अदालत के निर्णय पर नाखुशी ज़ाहिर करते हुए फूट-फूटकर रोना आरम्भ कर दिया ,मैंने मामले के एक-एक बिंदु के बारे में उससे समझा-बुझाकर जानने की कोशिश की. किसी तरह उसने अपनी बहन की शादी से लेकर दहेज़-हत्या तक व् फिर अदालत में चली सारी कार्यवाही के बारे में बताया ,वो बहन के पति व् ससुर को ,पुलिस वालों को ,अपने वकील को ,निर्णय देने वाले न्यायाधीश को कुछ न कुछ कहे जा रहा था और रोये जा रहा था और मुझे गुस्सा आये जा रहा था उसकी बेबसी पर ,जो उसने खुद ओढ़ रखी थी .
             जो भी उसने बताया ,उसके अनुसार ,उसकी बहन को उसके पति व् ससुर ने कई बार प्रताड़ित कर घर से निकाल दिया था और तब ये उसे उसकी विनती पर घर ले आये थे ,फिर बार-बार पंचायतें कर उसे वापस ससुराल भेजा जाता रहा और उसका परिणाम यह रहा कि एक दिन वही हो गया जिसका सामना आज तक बहुत सी बेटियों-बहनो को करना पड़ा है और करना पड़ रहा है .
             ''दहेज़ हत्या'' कोई एक दिन में ही नहीं हो जाती उससे पहले कई दिनों,हफ्तों,महीनो तो कभी सालों की प्रताड़ना लड़की को झेलनी पड़ती है और बार बार लड़के वालों की मांगों का कटोरा उसके हाथों में दे ससुराल वालों द्वारा उसे मायके के द्वार पर टरका दिया जाता है जैसे वह कोई भिखारन हो और मायके वालों द्वारा, जिनकी गोद में वो खेल-कूदकर बड़ी हुई है ,जिनसे यदि अपना पालन-पोषण कराया है तो उनकी अपनी हिम्मत से बढ़कर सेवा-सुश्रुषा भी की है,भी कोई प्यार-स्नेह का व्यव्हार उसके साथ नहीं किया जाता ,समाज के विवाह की अनिवार्यता के नियम का पालन करते हुए जैसे-तैसे बेटी का ब्याह कर उसके अधिकांश मायके वाले उसके विवाह पर उसकी समस्त ज़िम्मेदारियों से मुक्ति मान लेते हैं और ऐसे में अगर उसके ससुराल वाले ,जो कि उन मायके वालों ने ही चुने हैं न कि उनकी बेटी ने ,अपनी कोई अनाप-शनाप ''डिमांड'' रख उनकी बेटी को ही उनके घर भेज देते हैं तो वह उनके लिए एक आपदा सामान हो जाती है और फिर वे उससे मुक्ति का नया हथियार उठाते हैं और ससुराल वालों की मांग कभी थोड़ी तो कभी पूरी मान ''कुत्ते के मुंह में खून लगाने के समान ''अपनी बेटी को फिर बलि का बकरा बनाकर वहीँ धकिया देते हैं .
               वैसे जैसे जैसे हमारा समाज विकास कर रहा है कुछ परिवर्तन तो आया है किन्तु इसका बेटी को फायदा अभी नज़र नहीं आ रहा है क्योंकि मायके वालों में थोड़ी हिम्मत तो अब आयी है .उन्होंने अब बेटी पर ससुराल में हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठानी तो अब शुरू की है जबकि पहले बेटी को उसकी ससुराल में परेशान होते हुए जानकर भी वे इसे बेटी की और घर की बदनामी के रूप में ही लेते थे और चुपचाप होंठ सीकर बेटी को ससुरालियों की प्रताड़ना सहने को मजबूर करते थे और इस तरह अनजाने में बेटी को मारने में उसके ससुरालियों का सहयोग ही करते थे ,कर तो आज भी वैसे वही रहे हैं बस आज थोड़ा बदलाव है अब लड़की वालों व् ससुरालवालों के बीच में कहीं पंचायतें हैं तो कहीं मध्यस्थ हैं और दोनों का लक्ष्य वही ....लड़की को परिस्थिति से समझौता करने को मजबूर करना और उसे उस ससुराल में मिल-जुलकर रहने को विवश करना जहाँ केवल उसका खून चूसने -निचोड़ने के लिए ही पति-सास-ससुर-ननद-देवर बैठे हैं .
               आज इसी का परिणाम है कि जो लड़की थोड़ी सी भी अपने दम पर समाज में खड़ी है वह शादी से बच रही है क्योंकि घुटने को वो,मरने को वो ,सबका करने को वो और उसको अगर कुछ हो जाये तो कोई नहीं ,न मायका उसका न ससुराल ,ससुरालियों को बहू के नाम पर केवल दौलत प्यारी और मायके वालों को बेटी के नाम पर केवल इज़्ज़त...प्यारी...ससुरालिए तो पैसे के नाम पर उसे उसके मायके धकिया देंगे और मायके वाले उसे मरने को ससुराल ,कोई उसे रखने को तैयार नहीं जबकि कहने को ''नारी हीन घर भूतों का डेरा ,यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता '' ऐसे पवित्र वाक्यों को सभी जानते हैं किन्तु केवल परीक्षाओं में लिखने व् भाषणों  में बोलने के लिए ,अपने जीवन में अपनाने के लिए नहीं .
                       बेटी को अगर ससुराल में कुछ हो जाये तो उसके मायके वाले दूसरों को ही कोसते हैं जो कि बहुत आसान है क्यों नहीं झांकते अपने गिरेबान में जो उनकी असलियत को उनके सामने एक पल में रख देगा .भला कोई बताये ,पति हो,सास हो ,ससुर हो,ननद-देवर-जेठ-पुलिस-वकील-जज कौन हैं ये आपकी बेटी के ? जब आप ही अपनी बेटी को आग में झोंक रहे हैं तो इन गैरों पर ऐसा करते क्या फर्क पड़ता है ? पहले खुद तो बेटी-बहन के प्रति इंसाफ करो तभी दूसरों से इंसाफ की दरकार करो .शादी करना अच्छी बात है लेकिन अगर बेटी की कोई गलती न होने पर भी ससुराल वाले उसके साथ अमानवीय बर्ताव करते हैं तो उसका मायका तो उससे दूर नहीं होना चाहिए ,कम से कम बेटी को ऐसा तो नहीं लगना चाहिए कि उसका इस दुनिया में कोई भी नहीं है .केवल दहेज़ हत्या हो जाने के बाद न्यायालय की शरण में जाना तो एक मजबूरी है ,कानून ने आज बेटी को बहुत से अधिकार दिए हैं लेकिन उनका साथ वो पूरे मन से तभी ले सकती है जब उसके अपने उसके साथ हो .अब ऐसे में एक बाप को ,एक भाई को ये तो सोचना ही पड़ेगा कि इन्साफ की ज़रुरत बेटी को कब है -मरने से पहले या मरने के बाद ?

शालिनी कौशिक 
      [कौशल]

शनिवार, 8 जुलाई 2017

काश ऐसी हो जाए भारतीय नारी



चली है लाठी डंडे लेकर भारतीय नारी ,
तोड़ेगी सारी बोतलें अब भारतीय नारी .
................................................
बहुत दिनों से सहते सहते बेदम हुई पड़ी थी ,
तोड़ेगी उनकी हड्डियां आज भारतीय नारी .
..........................................................
लाता नहीं है एक भी तू पैसा कमाकर ,
करता नहीं है काम घर का एक भी आकर ,
मुखिया तू होगा घर का मेरे कान खोल सुन
जब जिम्मेदारी मानेगा खुद शीश उठाकर ,
गर ऐसा करने को यहाँ तैयार नहीं है ,
मारेगी धक्के आज तेरे भारतीय नारी .
..........................................................
उठती सुबह को तुझसे पहले घर को सँवारुं,
खाना बनाके देके तेरी आरती उतारूँ,
फिर लाऊँ कमाई करके सिरपे ईंट उठाकर
तब घर पे आके देख तुझे भाग्य सँवारुं .
मेरे ही नोट से पी मदिरा मुझको तू मारे,
अब मारेगी तुझको यहाँ की भारतीय नारी .
.............................................................
पिटना किसी भी नारी का ही भाग्य नहीं है ,
अब पीट भी सकती है तुझे भारतीय नारी .
...........................................................
जीवन लिखा है साथ तेरे मेरे करम ने ,
तू मौत नहीं मेरी कहे भारतीय नारी .
.........................................................
लगाया पार दुष्टों को है देवी खडग ने ,
तुझको भी तारेगी अभी ये भारतीय नारी .
...................................................
शालिनी कौशिक
(कौशल 

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...