गुरुवार, 30 अगस्त 2012

कैराना उपयुक्त स्थान :जनपद न्यायाधीश शामली :




जिला न्यायालय के लिए शामली के अधिवक्ता इस सत्य को परे रखकर सात दिन से न्यायालय के कार्य  को ठप्प किये हैं जबकि सभी के साथ शामली इस प्रयोजन हेतु कितना उपयुक्त है वे स्वयं जानते हैं.
             शामली 28 सितम्बर २०११ को मुज़फ्फरनगर से अलग करके  एक जिले के रूप में स्थापित किया गया .जिला बनने से पूर्व शामली तहसील रहा है और यहाँ तहसील सम्बन्धी कार्य ही निबटाये जाते रहे हैं. न्यायिक कार्य दीवानी ,फौजदारी आदि के मामले शामली से कैराना और मुज़फ्फरनगर जाते रहे हैं .
    आज कैराना न्यायिक व्यवस्था  के मामले में उत्तरप्रदेश में एक सुदृढ़ स्थिति रखता है    कैराना में न्यायिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि के बारे में बार एसोसिएशन कैराना के अध्यक्ष ''श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट ''जी बताते हैं -
                                    
     ''   '' सन १८५७ में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रथम  स्वतंत्रता संग्राम के द्वारा ऐतिहासिक क्रांति का बिगुल बजने के बाद मची उथल-पुथल से घबराये ब्रिटिश शासन के अंतर्गत संयुक्त प्रान्त [वर्तमान में उत्तर प्रदेश ] ने तहसील शामली को सन 1887 में महाभारत काल के राजा कर्ण की राजधानी कैराना में स्थानांतरित कर दिया तथा तहसील स्थानांतरण के दो वर्ष पश्चात् सन १८८९ में मुंसिफ शामली के न्यायालय  को भी कैराना में स्थानांतरित कर दिया .ब्रिटिश शासन काल की संयुक्त प्रान्त सरकार द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश [तत्कालीन संयुक्त प्रान्त ]में स्थापित होने वाले चार मुंसिफ न्यायालयों -गाजियाबाद ,नगीना ,देवबंद व् कैराना है.मुंसिफ कैराना के क्षेत्राधिकार  में  पुरानी तहसील कैराना व् तहसील बुढ़ाना का  परगना कांधला सम्मिलित था .मुंसिफी कैराना में मूल रूप से दीवानी मामलों का ही न्यायिक कार्य होता था .विचाराधीन वादों  की संख्या को देखते हुए समय समय पर अस्थायी अतिरिक्त मुंसिफ कैराना के न्यायालय की स्थापना भी हुई ,परन्तु सन १९७५ के आसपास माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा कैराना में स्थायी अतिरिक्त मुंसिफ कैराना के न्यायालय की स्थापना की गयी .इस न्यायालय के भवन के लिए ९ मार्च सन १९७८ को उच्च न्यायालय इलाहाबाद के प्रशासनिक न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री ह्रदयनाथ सेठ द्वारा भवन का शिलान्यास किया गया .बार एसोसिएशन कैराना  की निरंतर मांग के उपरांत दिनांक ६ मई 1991 को कैराना में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय की स्थापना की गयी .तथा बाद में ४ जनवरी 1993 से कैराना में सिविल  जज सीनियर डिविजन का न्यायालय स्थापित हुआ  २ अप्रैल २०११ में यहाँ ए.डी.जे.कोर्ट की स्थापना हुई .''
ऐसे में राजनीतिक फैसले के कारण शामली को भले ही जिले का दर्जा मिल गया हो किन्तु न्यायिक व्यवस्था के सम्बन्ध में अभी शामली बहुत पीछे है .शामली में अभी कलेक्ट्रेट  के लिए भूमि चयन का मामला भी पूरी तरह से तय नहीं हो पाया है जबकि कैराना में अध्यक्ष महोदय के अनुसार तहसील भवन के नए भवन में स्थानांतरित होने के कारण ,जहाँ १८८७ से २०११ तक तहसील कार्य किया गया वह समस्त क्षेत्र इस समय रिक्त है और वहां जनपद न्यायाधीश के न्यायलय के लिए उत्तम भवन का निर्माण हो सकता है .साथ ही कैराना कचहरी में भी ऐसे भवन हैं जहाँ अभी हाल-फ़िलहाल में भी जनपद न्यायाधीश बैठ सकते हैं और इस सम्बन्ध में किसी विशेष आयोजन की आवश्यकता नहीं है.फिर कैराना कचहरी शामली मुख्यालय से मात्र १० किलोमीटर दूरी पर है ऐसे में यदि हाईकोर्ट ध्यान दे तो शामली जनपद न्यायाधीश के लिए कैराना उपयुक्त स्थान है क्योंकि शामली में अभी भी केवल तहसील कार्य ही संपन्न हो रहे हैं और जनपद न्यायधीश की कोर्ट वहां होने के लिए अभी शामली को बहुत लम्बा सफ़र तय करना है.
               शालिनी कौशिक 
                    [कौशल]
  

रविवार, 26 अगस्त 2012

तुम मुझको क्या दे पाओगे?

तुम मुझको क्या दे पाओगे?


Women Revolutionaries
google se sabhar
तुम भूले सीता सावित्री ,क्या याद मुझे रख पाओगे ,
खुद तहीदस्त हो इस जग में तुम मुझको क्या दे पाओगे?

मेरे हाथों में पल बढ़कर इस देह को तुमने धारा है ,
मन में सोचो क्या ये ताक़त ताजिंदगी भी तुम पाओगे ?

संग चलकर बनकर हमसफ़र हर मोड़ पे साथ निभाया है ,
क्या रख गुरूर से दूरी तुम ताज़ीम मुझे दे पाओगे ?

कनीज़ समझ औरत को तुम खिदमत को फ़र्ज़ बताते हो,
उस शबो-रोज़ क़ुरबानी का क्या क़र्ज़ अदा कर पाओगे?

फ़ितरत ये औरत की ही है दे देती माफ़ी बार बार ,
क्या उसकी इस इनायत का इकबाल कभी कर पाओगे?

शहकार है नारी खिलक़त की ''शालिनी ''झुककर करे सलाम ,
इजमालन सुनलो इबरत ये कि खाक भी न कर पाओगे.


शब्दार्थ :तहीदस्त-खाली हाथ ,इनायत- कृपा ,ताजिंदगी -आजीवन 
ताज़ीम -दूसरे को बड़ा समझना ,आदर भाव ,सलाम 
कनीज़ -दासी ,इजमालन -संक्षेप में ,इबरत -चेतावनी ,
इकबाल -कबूल करना ,शहकार -सर्वोत्कृष्ट कृति ,
खिलक़त-सृष्टि 
      
                    शालिनी कौशिक 
                                  [कौशल ]

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

संघ- भाजपा -मुस्लिम हितैषी :विचित्र किन्तु सत्य



संघ भाजपा -मुस्लिम हितैषी :विचित्र किन्तु सत्य 




 महात्मा गाँधी वध और बाबरी विध्वंस दो ऐसी घटनाएँ जिन्होंने संघ  और भाजपा दोनों को भारतीय अल्पसंख्यक समुदाय मुस्लिम समाज के विरोधी  के रूप मेंचिन्हित  किया  .महात्मा गाँधी का वध नाथूराम गोडसे ने किया और उसे ये कहकर  प्रचारित किया गया कि पीछे संघ का हाथ है जिसने पाकिस्तान की स्थापना से क्षुब्ध हो नाथूराम गोडसे का महात्मा गाँधी की हत्या में इस्तेमाल किया .भला कोई समझदार इस तथ्य पर विश्वास कर सकता  है ?हिन्दुस्तान काभारत -पाक में बटवारा कराया  अंग्रेजो ने फिर संघ जैसी सेवाभावी संस्था इसका ठीकरा महात्मा गाँधी के सिर फोड़ उनकी हत्या जैसी जघन्य करतूत कैसे करसकती थी ?फिर बाबरी विध्वंस कॉंग्रेस के शासन काल में हुआ और भारत जहाँ एक सबल  सशक्त केंद्र की स्थापना की गयी है वहां भाजपा जैसी पार्टी जो एकउदार विपक्ष की भूमिका निभाने में ही अपना बड़प्पन ज़ाहिर करती  है .भला सरकार को अस्थिर करने जैसे राष्ट्रविरोधी कार्यों को भाजपा जैसी राष्ट्रवादीपार्टी  द्वारा कैसे अंजाम दिया जा सकता है ?एक और जहाँ देश के प्रधानमंत्री पद पर कथित विदेशी महिला की नियुक्ति रोकने हेतु जहाँ भाजपा नेत्रियाँ सुषमा स्वराजऔर उमा भारती दोनों गंजी होने को तैय्यार हो जाती हैं वहीँ भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी उन्ही विदेशी महिला को अपने बेटे की शादी  में आमंत्रितकरने हेतु उनके निवास स्थल पर पहुँच अपनी सद्भावना का परिचय देते हैं .





कभी देश की प्रधानमंत्री रही श्रीमती इंदिरा गाँधी जिन्हें हिन्दू होते हुए पारसी से विवाह करने पर पुरी मंदिर  में प्रवेश से रोक दिया जाता है उन्ही के पौत्र वरुण  को न केवल ये पार्टी अपने सदस्य के रूप में स्थान देती है बल्कि उसे हिन्दू के रूप में मान्यता देते हुए उसके विवाह के कर्मकांड एक हिन्दू के रूप में किये जाने को भीमान्यता देती है .कहीं दिखेगी ऐसी धार्मिक सद्भावना ,जहाँ बाबरी विध्वंस के लिए सरकार तक की बलि चढ़ाने वाले अपने जनप्रिय नेता कल्याण  सिंह को पार्टीसे निष्कासित कर भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवानी जी जो पार्टी अध्यक्ष भी रहे हैं  ६ दिसंबर  १९९२ को अपने जीवन  का'' सबसे दुखद दिन ''मानते हैं .जहाँभारत पाक बंटवारे के मुख्य सूत्रधार मुहम्मद अली जिन्नाह को अडवाणी जी ''धर्मनिरपेक्ष ''बताते हुए अपनी छवि तक से भी खेल जाते हैं जो हिन्दूकट्टरवादी की बनी है .जहाँ पार्टी के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपयी जी  मुस्लिम रोजेदारों से पूरे अपनत्व से मिलते हैं वहां मुस्लिमों के प्रति दुर्भावनाकी बात सोची भी कैसे जा सकती है .
        सोचने की बात है कि आज तक मुस्लिम हितैषी होने का फायदा कॉंग्रेस उठाती आ रही है जबकि कभी भाजपा के चाणक्य रहे के.एस.गोविन्द आचार्य हीकह रहे हैं कि वर्तमान में कॉंग्रेस और भाजपा की नीतियों में ज्यादा अंतर नहीं है .ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव दोनों दलों को साथ मिलकर लड़ना चाहिए  उनकी इस बात के बाद भाजपा के मुस्लिम हितैषी होने पर कोई सवाल उठाया ही नहीं जा सकता .जब कॉंग्रेस की नीतियां  मुस्लिमों के लिए सद्भावना वाली  हैं तो भाजपा की भी नीतियां गोविन्दाचार्य जी के अनुसार मुस्लिम हितैषी ही जाएँगी..

      फिर अंत में हम सभी देखते है कि मनुष्य बचपन में व् वृद्धावस्था में बिल्कुल  निश्छल मासूम ,छल से दूर होता है सीधा सच्चा होता  है .कभी संघ प्रमुख रहेके.सी .सुदर्शन आज उसी स्थिति में हैं जब आदमी केवल अपना सच जीता  है .बनावटी मुखौटा उतर जाता है .ईद  के अवसर पर जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त सुदर्शन जी ने बधाई के लिए एशिया की सबसे बड़ी ताजुल मस्जिद जाने की जिद ठान ली और मुबारकबाद देकर मुस्लिम भाइयों  के साथ शीर [सीवाई] भी खाई .
       ऐसे में संघ भाजपा के बारे में ये कहना कि ये मुस्लिम विरोधी हैं समझदार लोगों के लिए तो कोरी अफवाह ही कही जाएगी अब कम अक्ल कुछ भी सोचेंक्या किया जा सकता है क्यूं सही है न ----वासुदेव शर्मा जी भी यही कहते है -

      ''शक की कैंची के फलके यदि अनजाने भी चल जाते हैं ,

       सच कहता हूँ विश्वासों में चन्दन वन भी जल जाते हैं .''
                
                     शालिनी कौशिक [कौशल]

बुधवार, 22 अगस्त 2012

संघ भाजपा -मुस्लिम हितैषी :विचित्र किन्तु सत्य


संघ भाजपा -मुस्लिम हितैषी :विचित्र किन्तु सत्य 



 महात्मा गाँधी वध और बाबरी विध्वंस दो ऐसी घटनाएँ जिन्होंने संघ  और भाजपा दोनों को भारतीय 

अल्पसंख्यक समुदाय मुस्लिम समाज के विरोधी  के रूप में चिन्हित  किया  .महात्मा गाँधी का वध नाथूराम 

गोडसे ने किया और उसे ये कहकर  प्रचारित किया गया कि पीछे संघ का हाथ है जिसने पाकिस्तान की 

स्थापना से क्षुब्ध हो नाथूराम गोडसे का महात्मा गाँधी की हत्या में इस्तेमाल किया .भला कोई समझदार इस 

तथ्य पर विश्वास कर सकता  है ?हिन्दुस्तान का भारत -पाक में बटवारा कराया  अंग्रेजो ने फिर संघ जैसी 

सेवाभावी संस्था इसका ठीकरा महात्मा गाँधी के सिर फोड़ उनकी हत्या जैसी जघन्य करतूत कैसे कर सकती 

थी ?फिर बाबरी विध्वंस कॉंग्रेस के शासन काल में हुआ और भारत जहाँ एक सबल  सशक्त केंद्र की स्थापना 

की गयी है वहां भाजपा जैसी पार्टी जो एक उदार विपक्ष की भूमिका निभाने में ही अपना बड़प्पन ज़ाहिर 

करती  है .भला सरकार को अस्थिर करने जैसे राष्ट्रविरोधी कार्यों को भाजपा जैसी राष्ट्रवादी पार्टी  द्वारा 

कैसे अंजाम दिया जा सकता है ?एक और जहाँ देश के प्रधानमंत्री पद पर कथित विदेशी महिला की नियुक्ति 

रोकने हेतु जहाँ भाजपा नेत्रियाँ सुषमा स्वराज और उमा भारती दोनों गंजी होने को तैय्यार हो जाती हैं वहीँ 

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी उन्ही विदेशी महिला को अपने बेटे की शादी  में आमंत्रित करने हेतु उनके 

निवास स्थल पर पहुँच अपनी सद्भावना का परिचय देते हैं .





कभी देश की प्रधानमंत्री रही श्रीमती इंदिरा गाँधी जिन्हें हिन्दू होते हुए पारसी से विवाह करने पर पुरी मंदिर  

में प्रवेश से रोक दिया जाता है उन्ही के पौत्र वरुण   को न केवल ये पार्टी अपने सदस्य के रूप में स्थान देती 

है बल्कि उसे हिन्दू के रूप में मान्यता देते हुए उसके विवाह के कर्मकांड एक हिन्दू के रूप में किये जाने को 

भी मान्यता देती है .कहीं दिखेगी ऐसी धार्मिक सद्भावना ,जहाँ बाबरी विध्वंस के लिए सरकार तक की बलि 

चढ़ाने वाले अपने जनप्रिय नेता कल्याण  सिंह को पार्टी से निष्कासित कर भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवानी 

जी जो पार्टी अध्यक्ष भी रहे हैं  ६ दिसंबर  १९९२ को अपने जीवन  का'' सबसे दुखद दिन ''मानते हैं .जहाँ 

भारत पाक बंटवारे के मुख्य सूत्रधार मुहम्मद अली जिन्नाह को अडवाणी जी ''धर्मनिरपेक्ष ''बताते हुए 

अपनी छवि तक से भी खेल जाते हैं जो हिन्दू कट्टरवादी की बनी है .जहाँ पार्टी के प्रधानमंत्री रहे अटल 

बिहारी वाजपयी जी  मुस्लिम रोजेदारों से पूरे अपनत्व से मिलते हैं वहां मुस्लिमों के प्रति दुर्भावना की बात 

सोची भी कैसे जा सकती है .
  

   सोचने की बात है कि आज तक मुस्लिम हितैषी होने का फायदा कॉंग्रेस उठाती आ रही है जबकि कभी 

भाजपा के चाणक्य रहे के.एस.गोविन्द आचार्य ही कह रहे हैं कि वर्तमान में कॉंग्रेस और भाजपा की नीतियों 

में ज्यादा अंतर नहीं है .ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव दोनों दलों को साथ मिलकर लड़ना चाहिए  

उनकी इस बात के बाद भाजपा के मुस्लिम हितैषी होने पर कोई सवाल उठाया ही नहीं जा सकता .जब 

कॉंग्रेस की नीतियां  मुस्लिमों के लिए सद्भावना वाली  हैं तो भाजपा की भी नीतियां गोविन्दाचार्य जी के 

अनुसार मुस्लिम हितैषी ही जाएँगी..

 फिर अंत में हम सभी देखते है कि मनुष्य बचपन में व् वृद्धावस्था में बिल्कुल  निश्छल मासूम ,छल से दूर 

होता है सीधा सच्चा होता  है .कभी संघ प्रमुख रहे के.सी .सुदर्शन आज उसी स्थिति में हैं जब आदमी केवल 

अपना सच जीता  है .बनावटी मुखौटा उतर जाता है .ईद  के अवसर पर जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त सुदर्शन जी 

ने बधाई के लिए एशिया की सबसे बड़ी ताजुल मस्जिद जाने की जिद ठान ली और मुबारकबाद देकर 

मुस्लिम भाइयों  के साथ शीर [सीवाई] भी खाई .
    
ऐसे में संघ भाजपा के बारे में ये कहना कि ये मुस्लिम विरोधी हैं समझदार लोगों के लिए तो कोरी अफवाह 

ही कही जाएगी अब कम अक्ल कुछ भी सोचें क्या किया जा सकता है क्यूं सही है न ----वासुदेव शर्मा जी भी 

यही कहते है -

  ''शक की कैंची के फलके यदि अनजाने भी चल जाते हैं ,

  सच कहता हूँ विश्वासों में चन्दन वन भी जल जाते हैं .''
                
                     शालिनी कौशिक [kaushal]

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

नारी के तुल्य केवल नारी


नारी के तुल्य केवल नारी 

     
                        

क्या कभी कोई कर पायेगा 
   तुलना नारी के नाम से,
     क्या कोई अदा कर पायेगा
         सेवा की कीमत दाम से.
 
नारी के जीवन का पल-पल
   नर सेवा में समर्पित है,
      नारी के रक्त का हरेक कण
          नर सम्मान में अर्पित है.
क्या चुका पायेगा कोई नर
   प्यार का बदला काम से,
       क्या कोई अदा कर पायेगा
           सेवा की कीमत दाम से

माँ के रूप में हो नारी
  तो बेटे की बगिया सींचें,
    पत्नी के रूप में होकर वह
       जीवन रथ को मिलकर खींचें.
क्या कर सकता है कोई नर
   दूर उनको मुश्किल तमाम से,
      क्या कोई अदा कर पायेगा
         सेवा की कीमत दाम से.
 
बहन के रूप में हो नारी
    तो भाई की सँभाल करे,
      बेटी के रूप में आकर वह
         पिता सम्मान का ख्याल करे.
क्या दे पायेगा उनको वह
   जीवन के सुख आराम से,
       क्या कोई अदा कर पायेगा
          सेवा की कीमत दाम से.

         शालिनी कौशिक
            [kaushal]

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी ,आन्दोलन और हम


 
[गूगल से साभार]
   आज सुबह जब मैं नाश्ता तैयार कर रही थी तभी तभी खिड़की की ओर से  दो आवाज़ सुनाई दी एक दूसरे से पूछ रहा था ,''स्कूल नहीं गया?'' ,तो जवाब सुनाई दिया ,''कि नहीं !आज छुट्टी है ''कितने अफ़सोस की बात है कि जिस दिन के लिए हमारे वीरों ने अपने प्राणों की क़ुरबानी दी हम उस दिन के लिए ऐसे भाव रखते हैं.''यूँ तो पहले से ही अफ़सोस था कि आज हम अपनी छत पर तिरंगा नहीं फहरा पाए और वह केवल इस कारण कि हमारे यहाँ बन्दर बहुत हैं और अभी २६ जनवरी को उन्होंने हमारे तिरंगे को कुछ नुकसान पहुंचा दिया था और हम कुछ नहीं कर पाए थे .हम नहीं चाहते थे कि हमारी थोड़ी सी लापरवाही हमारे तिरंगे के लिए हानिकारक साबित हो ,वो भी उस तिरंगे के लिए जिसकी आन के लिए न जाने कितने वीर शहीद हो गए .जिसके लिए महात्मा गाँधी ने कहा था -''लाखों लोगों ने ध्वज की आन के लिए कुर्बानियां दी हैं .भारत में रहने वाले हिन्दू ,मुस्लिम ,सिक्ख ,ईसाई सभी के लिए ज़रूरी है कि एक ध्वज के लिए जिए और मरें. '' हमारे घर में तो हमें स्वतंत्रता का महत्व बताया गया और इसकी प्राप्ति के लिए बलिदानों की लम्बी कहानी से भी परिचित कराया गया किन्तु लगता है कि आज के माता-पिता शायद इस ओर अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह नहीं कर रहे हैं .और अपने बच्चों को इस दिशा में मार्गदर्शन नहीं दे रहे हैं और इसी का परिणाम है कि आज के बच्चे इस दिन को छुट्टी मान रहे हैं.साथ ही इसकी कुछ जिम्मेदारी आज के शिक्षकों पर भी आती है जो बच्चों को स्मार्ट होकर स्कूल आना सिखा रहे हैं ,अंग्रेजी सिखा विश्व के समक्ष खड़े होने के काबिल बना रहे हैं किन्तु ये नहीं बता रहे हैं कि आज आप आज़ादी की साँस किन वीरों के प्रयासों के कारण ले रहे हैं ?क्या ये हमारा उत्तरदायित्व नहीं बनता कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को उन वीरों से परिचित कराएँ जिन्होंने हमारे जीवन की खुशहाली के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया .लता जी की आवाज़ में प्रदीप जी द्वारा लिखे इस गीत को ,जिसे सुनकर पंडित जवाहर लाल नेहरु की आँखों में आंसू आ गए थे तो ये कोई अनोखी बात नहीं थी ,जब हम जैसे लोग भी स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने बरसों बाद ये पंक्तियाँ -
    ''थी खून से लथपथ काया फिर भी बन्दूक उठाके ,
     दस दस को एक ने मारा फिर गिर गए होश गंवाके ,
     जब अंत समय आया तो कह गए कि हम मरते हैं ,
    खुश रहना देश के प्यारों अब हम तो सफ़र करते हैं .''
सुनकर रो सकते हैं तो पंडित जवाहर लाल नेहरु ने तो उन वीरों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर देश की आज़ादी के लिए अपना दिन रात एक कर दिया था तो उनकी आँखों में आंसू आना स्वाभाविक था ,क्या वे देश के प्यारे नहीं थे ,क्या वे भी हमारी तरह जिन्दा रहकर देश की आज़ादी में साँस नहीं ले सकते थे फिर क्यूं हम उन्हें भूलने लगे हैं ?क्या हमें आज उन सपनो को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहिए जिन्हें हमारे वीरों ने देखा और उनकी पूर्ति के लिए अपनी क़ुरबानी दे दी?हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम उन सपनो को अपने और अपने देशवासियों की आँखों में भर दें और उन सपनो को पूरा करने के लिए जूनून की हद तक सभी को प्रेरित करें.
  आज़ादी की प्राप्ति के बाद के भारत के लिए जो स्वप्न हमारे वीरों ने देखे उन पर विराम लगाने वाले न केवल हम बल्कि हमारी सरकार भी है .पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा था -''काफी साल पहले हमने नियति की साथ गुप्त भेंट की और अब समय आ गया हैकि हम अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करें .आधी रात को जब दुनिया सो जाएगी तब भारत में आज़ादी एक नई सुबह  लेकर आएगी .''
  नई सुबह आई किन्तु इस नई सुबह में सबने भुला दिया गुलामी के उन दिनों को ,उन संघर्षों को जिन्हें झेलकर हम आज़ाद हुए थे .अंग्रेजों ने एक जलियाँ वाला बाग हत्याकांड किया था किन्तु वे विदेशी थे उनका  हमसे कोई अपनत्व नहीं था किन्तु उसे क्या कहें जो पिछले वर्ष दिल्ली की सरकार ने किया आन्दोलन रत बाबा रामदेव और उनके अनुयायिओं को रातो- रात अंग्रेजी शासन का अहसास करा दिया .
  मैक्स मूलर ,जर्मन स्कॉलर ने कहा था-''अगर मुझसे पूछा जाये कि किस जगह मानव मस्तिष्क अपने चरम रूप में विकसित होता है  ,कहाँ समस्याओं का समाधान चुटकी बजाते निकल जाता है तो मैं कहूँगा ,''भारत वो जगह है .''
   कि क्यूं भारत में हर समस्या का समाधान आन्दोलन से ढूँढा जाता है ?क्यूं लोकपाल के लिए अन्ना को अनशन करना पड़ता है ?क्यूं काले धन की वापसी के लिए बाबा रामदेव को पिटना पड़ता है ?
  क्यूं उत्तर प्रदेश में बरसों से लगभग तीन दशक से  पश्चिमी यू.पी .के वकीलों को हाईकोर्ट की खंडपीठ की मांग  के लिए भूखा मरना पड़ता है ?क्या इसमें केवल वकीलों का हित है ?क्या सरकार का फ़र्ज़ नहीं है कि वह जनता के लिए न्याय प्राप्त करने की परिस्थितियाँ बनाये ?
  देश के विभिन्न हिस्सों में फैला नक्सलवादी /माओवादी आन्दोलन  जिसमे कभी विधायक ,कभी डी.एम्.,कभी विदेशी पर्यटक  अपहरण के तो कभी आम जनता ,पुलिस गोलीबारी के शिकार होते हैं.क्यूं नहीं सरकार सही कदम  सही समय पर उठाकर इन समस्याओं को निबटाने का प्रयास करती ?क्यूं हर समस्या को यहाँ वैसे ही आगे  के लिए  टाल दिया जाता है  जैसे पुलिस वाले पानी में बहती आई लाश को आगे बढ़ा देते हैं जिससे अपराध का ठीकरा उनके माथे पर न फूटे.क्यूं देश में हर समस्या का समाधान आन्दोलन के माध्यम से ढूंढना पड़ता है ?लोकतंत्र जनता की ,जनता के द्वारा और जनता के लिए सरकार है फिर क्यूं जनता के बीच से सरकार में पहुँच नेताओं की बुद्धि पर सत्ता का पानी चढ़ जाता है और पहले जनता के हित की बात कहने वाले सत्ता में पहुँच जनता को कुचलने पर आमादा हो जाते हैं ?
   और जनता के आन्दोलन भी जिस कार्य के लिए शुरू किये जाते हैं वहां से भटक जाते हैं .क्यूं अन्ना का आन्दोलन लोकपाल से हटकर राजनीति की गहराई की बातें करने लगता है ?क्यूं बाबा रामदेव का आन्दोलन काले धन की वापसी की बाते करते करते कॉंग्रेस  हटाओ की बात करने लगता है ?जबकि सभी जानते हैं कि राजनीति में सभी दल ''एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं ''.कारण एक ही है हमारा अपने आदर्शों से भटकाव .एक विकासशील देश  को जिन आदर्शों पर काम करना चाहिए हम उनसे भटक गए हैं .लोकतंत्र ने हमें अवसर दिया है देश को अपने हाथों से चलने का और ये हमें देखना है कि हम देश की बागडोर गलत हाथों में न जाने दें .किसी ने कहा है -
      ''वक़्त देखते ही किरदार बदल देता है ,
       इन्सान भी मय्यार बदल देता है ,
       अपनी ताकत का तुम्हे इल्म नहीं शायद 
      एक वोट देश की तकदीर बदल देता है .''
   ऐसा नहीं है कि स्वतंत्रता से लेकर आज तक एक ही दल की सरकार रही हो सरकारें आई गयी हैं किन्तु कार्यप्रणाली सभी की एक जैसी रही है .सभी ने पूँजी वादियों का पोषण और गरीबों का शोषण किया है सभी ने वोट के भंडार के आगे शीश नवाया  है .ऐसे में हमें देखना होगा कि ये देश हमारा है .हमें यहाँ आराजकता पैदा नही होने देनी है और न ही स्वार्थी प्रवर्तियों वाले दलों को उभरने देना है .हमें एक जुट होकर देश हित के लिए आगे बढ़ना है और जो  भी ताकत देश विरोधी दिखाई दे उसे मुहंतोड़ जवाब देना है .भ्रष्टाचार ,काला धन ,कन्या भ्रूण हत्या ,गरीबी ,महंगाई सब हमारे बीच की समस्याएं है और इनका दुष्प्रभाव भी हमीं पर पड़ता है ऐसे में इन चुनौतियों से लड़ने के लिए हमें ही एकजुट होना होगा .
  रामायण में एक जगह महर्षि विश्वामित्र कहते हैं-''साधू और पानी का रुकना सही नहीं होता .''सही भी है साधू का कार्य विश्व कल्याण है जो एक जगह रूककर नहीं होता और पानी यदि ठहर जाये तो गन्दा हो जाता है .सरकार में यही ठहराव आ गया है .विपक्ष का कमजोर होना सरकार को अति आत्मविश्वास से भर रहा है .सरकार बदलना इस समस्या का हल नहीं है बल्कि विपक्ष का मजबूत होना सरकार के लिए एक फ़िल्टर के समान है यदि हमारा विपक्ष मजबूत हो तो सरकार को उखड़ने का डर रहेगा और ऐसे में जिन समस्याओं के लिए जनता को आन्दोलन रत होना पड़ता है वे सरकार की समझ में स्वयमेव आती रहेंगी और आन्दोलन जैसी परिस्थितियां उत्पन्न ही नहीं होंगी .इसलिए ये जनता का ही कर्त्तव्य बनता है कि वह ऐसे लोगों को चुनकर भेजे जो चाहे सत्ता में रहें या विपक्ष में, अपना काम मजबूती से करें क्योंकि आज हमारे देश को सच्चे कर्मवीरों की ज़रुरत है ऐसे कर्मवीर जो हमारे शहीदों की शहादत की कीमत  समझें और उनके सपनो को पूरा करने के लिए जुट जाएँ .
      अंत में डॉ.राही निजामी के शब्दों में बस यही कहूँगी-
''वतन की अजमतों के जो हैं दुश्मन,
        इरादे उनके तू बेजान कर दे  .
तिरंगा है वतन की शान या रब ,
     उसे कुछ और भी जी शान कर दे.''
              शालिनी कौशिक [कौशल] 
    

सोमवार, 13 अगस्त 2012

तिरंगा शान है अपनी ,फ़लक पर आज फहराए ,


Flag Foundation Of India  Flag Foundation Of India 
तिरंगा 
शान है अपनी ,फ़लक पर आज फहराए ,
फतह की ये है निशानी ,फ़लक पर आज फहराए .

रहे महफूज़ अपना देश ,साये में सदा इसके ,
मुस्तकिल पाए बुलंदी फ़लक पर आज फहराए .

मिली जो आज़ादी हमको ,शरीक़ उसमे है ये भी,
शाकिर हम सभी इसके फ़लक पर आज फहराए .

क़सम खाई तले इसके ,भगा देंगे फिरंगी को ,
इरादों को दी मज़बूती फ़लक पर आज फहराए .

शाहिद ये गुलामी का ,शाहिद ये फ़राखी का ,
हमसफ़र फिल हकीक़त में ,फ़लक पर आज फहराए .

वज़ूद मुल्क का अपने ,हशमत है ये हम सबका ,
पायतख्त की ये लताफत फ़लक पर आज फहराए .

दुनिया सिर झुकाती है रसूख देख कर इसका ,
ख्वाहिश ''शालिनी''की ये फ़लक पर आज फहराए .

         शालिनी कौशिक [कौशल]

एक निवेदन सभी महिला ब्लोग्गर्स  से-आपको शिखा कौशिक  के एक नए ब्लॉग ''WORLD'sWOMAN BLOGGERS ASSOCIATION -JOIN THIS NOW  ''का लिंक दे रही हूँ यहाँ जुड़ें और महिला शक्ति को संगृहीत होने का सुअवसर दें.
             आभार 
           शालिनी कौशिक 





शनिवार, 11 अगस्त 2012

प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े


[गूगल से साभार ]

''सियासत को लहू पीने की लत है,
    वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .''
       ये पंक्तियाँ अक्षरश: खरी उतरती हैं सियासत पर  ,जिस आरक्षण को दुर्बल व्यक्तियों को सशक्त व्यक्तियों से  बचाकर पदों की उपलब्धता  सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था .जिसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक,सामाजिक ,शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को देश की मुख्य  धारा  में लाना था उसे सियासत ने सत्ता बनाये रखने  के लिए ''वोट '' की राजनीति में तब्दील  कर दिया .
    सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण इलाहाबाद उच्च न्यायालय  ने ख़ारिज कर दिया था .इसी साल अप्रैल में उच्चतम  न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के पूर्ववर्ती मायावती सरकार के निर्णय को ख़ारिज कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरक़रार रखा और अखिलेश यादव सरकार ने इस फैसले पर  फ़ौरन अमल  के निर्देश दिए थे किन्तु वोट कि राजनीति इतनी अहम् है कि संविधान के संरक्षक ''उच्चतम न्यायालय '' के निर्णय के प्रभाव को दूर करने के लिए विधायिका नए नए विधेयक लाती रहती है  और संविधान में अपना स्थान ऊँचा बनाने की कोशिश करती रहती है.जिस प्रोन्नति में आरक्षण को उच्चतम नयायालय  ने मंडल आयोग के मामले में ख़ारिज कर दिया था उसे नकारने के लिए संसद ने ७७ वां संशोधन अधिनियम पारित कर अनुच्छेद १६ में एक नया खंड ४ क जोड़ा जो यह उपबंधित  करता है -
 ''कि अनुच्छेद १६ में की कोई बात राज्य के अनसूचित जाति औ� A4 जनजाति के किसी वर्ग के लिए जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है प्रोन्नति के लिए आरक्षण के लिए कोई उपबंध करने से निवारित [वर्जित] नहीं करेगी.''
   और इसके बाद ८५ वां संविधान संशोधन अधिनियम २००१ द्वारा खंड ४क में शब्दावली ''किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में'' के स्थान पर ''किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में  परिणामिक श्रेष्ठता के साथ ''शब्दावली अंतःस्थापित की गयी जो इस संशोधन अधिनियम को १७ जून १९९५ से लागू करती है जिस दिन ७७ वां संशोधन अधिनियम लागू हुआ .इसका परिणाम यह होगा कि अनुसूचित जाति व् जनजातियों के अभ्यर्थियों की श्रेष्ठता १९९५ से लागू मानी जाएगी .पहली बार ऐसा भूतलक्षी प्रभाव का संशोधन संविधान से धोखाधड़ी का प्रत्यक्ष प्रमाण है.
के सी वसंत कुमार  के मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी थी कि अनुसूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति का आरक्षण सन २००० तक चलाया जाये और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की कसौटी आर्थिक हो तथा प्रत्येक ५ वर्ष पर इस पर पुनर्विचार हो .
  भारत संघ बनाम वीरपाल चौहान [१९९५ ] ६ एस.सी.सी.६३४ में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया ''कि सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति के लिए ''जाति ''को आधार बनाया जाना संविधान के अनुच्छेद १६[४] का उल्लंघन है.
    अनुच्छेद १६ के अनुसार-
         ''राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी.''
  जिसका एक अपवाद १६[४] है जिसके अनुसार -
    ''राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्याधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है ,नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध कर सकता है 
   इस प्रकार खंड ४ के लागू होने की दो शर्ते हैं-
  १-वर्ग पिछड़ा हो :अर्थात सामाजिक व् शैक्षिक दृष्टि से ,
 2- उसे राज्याधीन पदों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिल सका हो.
     केवल दूसरी शर्त ही एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती .ऐसे में सरकारी सेवा में लगे  लोगों को पिछड़ा मानना सामाजिक रूप से उन लोगों के साथ तो अन्याय ही कहा जायेगा जो इनसे अधिक योग्यता रखकर भी सरकारी नौकरियों से वंचित हैं और इसके बाद प्रोन्नति में आरक्षण के लिए केंद्र सरकार का विधेयक लाने को तैयार होना सरकार का झुकना है और इस तरह कभी ममता बैनर्जी ,कभी करूणानिधि और कभी मायावती के आगे झुक सरकार अपनी कमजोरी ह� E0��सूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति देश में विकास पाने के आकांक्षी हैं तो अन्य जातियां भी उन्नति की महत्वाकांक्षा रखती  हैं और एक लोकतंत्र तभी सफल कहा जायेगा जब वह अपने सभी नागरिकों से न्याय करे .पहले तो स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी आरक्षण लागू किया जाना ही गलत है इस पर प्रोन्नति में भी आरक्षण सरासर अन्याय  ही कहा जायेगा .यदि ये जातियां अभी तक भी पिछड़ी  हैं तो केवल नौकरी पाने तक ही सहायता ठीक है आगे बढ़ने के लिए तो इन्हें अपनी योग्यता ही साबित करनी चाहिए और सरकार को चाहिए की अपनी वोट की महत्वाकांक्षा में थोड़ी जगह  ''योग्यता की उन्नति'' को भी दे.नहीं तो योग्यता अंधेरों में धकेले जाने पर यही कहती नज़र आएगी जो ''हरी सिंह जिज्ञासु ''कह रहे हैं -'
                   ''अपने ही देश में हम पनाहगीर बन गए ,
                         गरीब गुरबां देश की जागीर बन गए ,
                   समझ नहीं आता कब बदलेगा यह परिवेश 
                          दिखाते रहे जो रास्ता राहगीर बन गए.''
                                                  शालिनी कौशिक 
                                                          [कौशल ]

न भाई ! शादी न लड्डू

  ''शादी करके फंस गया यार ,     अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उ...