मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

शुभकामना देती ''शालिनी''मंगलकारी हो जन जन को -२०१४

 
अमरावती सी अर्णवनेमी पुलकित करती है मन मन को ,
अरुणाभ रवि उदित हुए हैं खड़े सभी हैं हम वंदन को .

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अलबेली ये शीत लहर है संग तुहिन को लेकर  आये  ,
घिर घिर कर अर्नोद छा रहे कंपित करने सबके तन को .

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मिलजुल कर जब किया अलाव  गर्मी आई अर्दली बन ,
अलका बनकर ये शीतलता  छेड़े जाकर कोमल तृण को .

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आकंपित हुआ है जीवन फिर भी आतुर उत्सव को ,
यही कामना हों प्रफुल्लित आओ मनाएं हर क्षण को .

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पायें उन्नति हर पग चलकर खुशियाँ मिलें झोली भरकर ,
शुभकामना देती ''शालिनी''मंगलकारी हो जन जन को .

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शालिनी कौशिक
[कौशल]


शब्दार्थ :अमरावती -स्वर्ग ,इन्द्रनगरी ,अरुणिमा -लालिमा ,अरुणोदय-उषाकाल ,अर्दली -चपरासी ,अर्नोद -बादल ,तुहिन -हिम ,बर्फ ,अर्नवनेमी -पृथ्वी

रविवार, 29 दिसंबर 2013

.....और माँ माँ ही होती है -एक लघु कथा

''ये शोर कैसा है ''नरेंद्र ने अपने नौकर जनार्दन से पूछा ,कुछ नहीं बाबूजी ,वो माता जी को खांसी का धसका लगा और उनसे मेज गिर गयी जिससे उसपर रखी हुई दवाइयां इधर-उधर गिर गयी ,जनर्दन ने बताया ,''पता नहीं कब मारेंगी मेरी इतनी मेहनत की कमाई यूँ ही स्वाहा हुई जा रही है ,वे तो मेरे और इस घर पर बोझ ही बनकर पद गयी हैं .घर से निकाल नहीं सकता लोगों में सारी इज़ज़त गिर जायेगी मेरी ''बड़बड़ाते हुए नरेंद्र बाहर चले गए .
नरेंद्र....नरेंद्र...धीमी सी आवाज़ में कौशल्या देवी ने मुश्किल से आवाज़ लगायी तो जनार्दन तेज़ी से भागकर वहाँ पहुंचा ,जी माता जी ,जनार्दन के कहने पर कौशल्या देवी बोली ,''जनार्दन! कहाँ है नरेंद्र ?''..जी वे तो बाहर चले गए ..जनार्दन के कहने पर कौशल्या देवी बोली ..वो कुछ गुस्सा हो रहा था ,क्यूँ किस पर ?..जी आप पर ,वे कहते हैं कि आप घर पर बोझ हैं .''..जनार्दन के मुंह से ये सुनकर कौशल्या देवी का मन बैठ गया वे दुखी मन से बोली ,''मेरे पर क्यूँ गुस्सा हो रहा था ..मैंने क्या किया ...आज तक उसका और इस घर का करती ही आ रही हूँ ,जरा सा बीमार क्या पड़ गयी उसने तो घर को सर पर ही उठा लिया ,अरे जरा सा बुखार ही तो है दो चार दिन में ठीक हो जायेगा और आज तक मेरे ही तो पैसों पर पल रहा है ,चल रहा है उसका घर और उसका यारों दोस्तों में उठना बैठना ,उसने तो आज तक एक अठन्नी भी लाकर मेरे हाथ पर नहीं धरी ....और ये कहकर वे रोने लगी .
जनार्दन उन्हें थोडा समझकर कमरे से बाहर निकल आया तभी फोन की घंटी बजी ,हेलो ! जनार्दन ने रिसीवर कान से लगाकर कहा ,..देखिये आप नरेंद्र जी के घर से बोल रहे हैं ,..हाँ कहिये ....देखिये मैं युवराज बोल,रहा हूँ जनपद वाला ,नरेंद्र जी मेरे घर के बाहर खड़े होकर मुझे गलियां दे रहे थे और कंकड़ पत्थर मार रहे थे कि अचानक मेरे पडोसी नवीन जी का छज्जा उनपर गिर गया और वे गम्भीर रूप से घायल हो गए है ,उन्हें हम अस्पताल लेकर जा रहे हैं आप वहीँ आ जाइये ..ये कहकर फोन डिस्कनेक्ट हो गया .
माता जी ..माता जी ....नरेंद्र बाबू को बहुत चोट आयी है ,उन्हें कुछ लोग लेकर अस्पताल जा रहे हैं ....मैं भी जा रहा हूँ ....तू रुक ...जनार्दन को रोकते हुए कौशल्या देवी बोली ,मैं भले ही उसे बोझ लगती हूँ पर मेरे लिए मेरा बीटा कभी बोझ नहीं हो सकता ,मैं आज भी उसे ठीक करने की ताकत रखती हूँ भले ही वह मेरी जिम्मेदारी से मुकर जाये ......आँख में आये आंसू पौंछती हुई कौशल्या देवी को जनार्दन ने सहारा दिया और कहा ..चलिए माता जी सच में आप सही कह रही हैं ,आप माँ हैं और माँ माँ ही होती है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

क्यूँ खेल रहे हैं 'आप' आम आदमी से ?


केजरीवाल मेट्रों से जायेंगे शपथ लेने ,समाचार पत्रों की सुर्खियां बने इस समाचार ने आज एक बारगी फिर माथे पर चिंता की रेखाएं ला दी और यह चिंता न केवल अपनी ज़िंदगी को लेकर वरन उन सभी की ज़िंदगी को लेकर थी जिसके अपने होने का दम भरते हैं ''केजरीवाल और उनकी आप ''.
जेड सुरक्षा से इंकार ,रामलीला मैदान में शपथग्रहण ,सरकारी बंगले का ठुकराना ये सब क्या हा ? एक बार को तो लगता है कि ऐसा कर वे उस विशिष्ट श्रेणी वी.वी.आई.पी.का सफाया कर रहे हैं जिसके आभामंडल में आम आदमी का कोई स्थान नहीं होता किन्तु यदि हम गहराई में जाते हैं तो जनतंत्र को नौटंकी की जो परिभाषा केजरीवाल ने दी है वे अपने इन कृत्यों से उसी को साकार रूप दे रहे हैं .
जेड सुरक्षा या कोई भी सुरक्षा ,सरकारी बंगला ,विशिष्ट स्थान पर शपथ ग्रहण आदि समारोह की व्यवस्था हमारे इन संवैधानिक प्रमुखों को केवल कोई विशिष्ट दरजा देने के लिए ही नहीं दिया जाता बल्कि ये इनके साथ साथ प्रत्येक आम आदमी को भी सुरक्षित ,सुविधाजनक ज़िंदगी देने का भी एक न्यायिक तरीका है क्योंकि पहले ही हमारे इन नेताओं से ,संवैधानिक प्रमुखों से जन भावनाएं इस कदर जुडी रहती हैं कि इनको मात्र खरोंच पहुंचना भी आम आदमी के एक बड़े वर्ग को शहादत की राह पर पहुंचा देता है .
दुसरे सरकारी बंगलों में इनका निवास होना ज़रूरी है क्योंकि इनकी जीवन चर्या आम आदमी की जीवन चर्या से बिलकुल विपरीत होती है और इनका आम जनता के साथ रहना उनकी ज़िंदगी को असुविधाजनक बना देता है इसलिए ऐसे में उनका अलग महत्वपूर्ण आवास आवश्यक होता है .
और रही शपथ ग्रहण या अन्य समारोह की बात तो व्यवस्थाओं की कठिनता ऐसे समारोहों को विशिष्ट स्थलों से जोड़ देते हैं और यह ज़रूरी भी है क्योंकि सुरक्षा इंतज़ाम जब संसद जैसी विशिष्ट संवैधानिक संस्था के लिए नाकाफी हो जाते हैं तब बिल्कुल सामान्य स्थलों की सुरक्षा इंतज़ाम पहले ही प्रश्न चिन्ह के घेरे में होते हैं .
ऐसे में अरविन्द केजरीवाल बात तो आम जनता के हित की करते हैं और काम उसके विपरीत क्यूँ करते हैं .सुरक्षा घेरा तोड़ने का खामियाज़ा राजीव गांधी जैसे नेता की आतंकवादी हमले में मृत्यु द्वारा न केवल हमारी राजनीती बल्कि हमारी आम जनता भी भुगतती है .ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि अरविन्द केजरीवाल और इनकी आप हमारे देश के सिस्टम को भ्रष्टाचार मुक्त करने उतरे हैं या इस देश को ही सिस्टम मुक्त करने अगर ऐसा नहीं है तो पारदर्शिता की बात करने वाले अरविन्द और उनकी आप के नेता क्यूँ लेते हैं ''गोपनीयता की शपथ ''ऐसे में कोई शंका रह ही नहीं जाती है कि वाकई आप और अरविन्द आम आदमी की ज़िंदगी से खेल रहे हैं और दिल्ली को दहशत व् अव्यवस्था के हवाले कर रहे हैं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

दूरदर्शन :मजबूरी का सौदा

Doordarshan Logoदूरदर्शन देश का ऐसा चैनल जिसकी पहुँच देश के कोने कोने तक है .जिसकी विश्वसनीयता इतनी है कि आज भी जिन चैनल को लोग पैसे देकर देखते हैं उनके मुकाबले पर भी मुफ्त में मिल रहे दूरदर्शन से प्राप्त समाचार को देखकर ही घटना के होने या न होने की पुष्टि करते हैं ,विश्वास करते हैं और ऐसा लगता है इसी विश्वास पर आज दूरदर्शन इतराने लगा है और अपनी इस उपलब्धि पर ऐसे अति आत्मविश्वास से भर गया है कि हम जो भी करेंगे वही सर्वश्रेष्ठ होगा और वही सराहा जायेगा .
आज अन्य चैनल जहाँ अपनी रेटिंग बढ़ने के लिए ,अपनी गुणवत्ता सुधारने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं वहीँ दूरदर्शन को ऐसी कोई चिंता कोई फ़िक्र नहीं है .एक और जहाँ ''बुद्धा ''और ''चाणक्य ''जैसे कालजयी चरित्रों पर आधारित श्रेष्ठता की हर पायदान को पार करते धारावाहिकों की मात्र उपस्थिति ही दर्ज की जाती है वहीँ ''कहीं देर न हो जाये ''जैसे ''न गवाँरु न संवारूं '' ''न भोजपुरी न हिंदी '' ''न अभिनय न पटकथा ''और अधिक क्या कहूं 'कुल मिलाकर बकवास ' और ''फॅमिली नंबर.1 ''जैसे फूहड़ ,पारिवारिक संस्कृति की भद्द पीटने वाले धारावाहिकों को प्राइम टाइम दिया जाता है जिनके कारण न चाहते हुए भी और इसके साथ समय गुजारने की इच्छा रखते हुए टेलीविज़न को बंद रखना ही ज्यादा श्रेयस्कर प्रतीत होता है .
दुसरे यहाँ विज्ञापन को धारावाहिक की गुणवत्ता से ऊपर स्थान दिया गया है यदि अधिक विज्ञापन हैं तो वह धारावाहिक चलता रहेगा अन्यथा या तो उसका समय बदल दिया जायेगा या उसे बंद कर दिया जायेगा फिर चाहे वह धारावाहिक कसी हुई पटकथा से बंधा हो ,सुन्दर अभिनय से सजा हो कोई मायने नहीं रखता और विज्ञापन की इतनी भरमार कि एक बारगी तो यही लगता है कि हम देख विज्ञापन रहे हैं हाँ बीच बीच में कोई धारावाहिक आ जाता है इससे अच्छा तो ये है कि दूरदर्शन धारावाहिकों को बंद कर के विज्ञापनों को ही चला ले क्योंकि अब तो ये भी काफी रुचिकर बनते हैं और जिसे जिस चीज़ का विज्ञापन देखना होगा वह टेलीविज़न ऑन कर उसे देख लेगा .
क्रिकेट देश का ऐसा खेल कि चाहे कोई जाने या न जाने इसे देखने बैठ जाता है और फिर दूरदर्शन तो है ही फालतू के कार्यक्रमों का भंडार ,दिन भर के और कार्यक्रम तो फालतू में चलते हैं और हम फालतू में ही देखते हैं अर्थात फालतू कार्यक्रम और फालतू दर्शक ,काम का तो बस दूरदर्शन जिसके पास कहने को अपना 'स्पोर्ट्स चैनल 'है किन्तु सारा स्पोर्ट्स चलता यहीं है फिर क्यूँ उस पर समय व् पैसा व्यर्थ किया जाता है .
दूरदर्शन का एक चैनल है ''डी.डी .न्यूज़ '' यूँ तो सारा दिन ही इस पर न्यूज़ चलती रहती हैं किन्तु अन्य चैनल का मुकाबला करने को यह लाया है एक नया कार्यक्रम ''रात साढ़े दस बजे ''जिसे कोई फटाफट न्यूज़ कहता है तो कोई सामान्य ज्ञान का भंडार किन्तु इससे भी फटाफट तो दूरदर्शन के इसी चैनल पर पहले से ही मौजूद हैं दिन के ''१.२५ से १.३० तक ''फिर इस में अन्य कोई विशेषता जैसे बात नहीं कही जा सकती और दिन भर एक सी ही न्यूज़ को यहाँ बैठकर रटा जाता है तो इसके सारे ही समाचारों को सामान्य ज्ञान का भंडार कहा जा सकता है क्योंकि यदि कोई सारे दिन बैठकर इन्हें देख ले तो कम से कम प्रतियोगी परीक्षाओं में जनरल स्टडीज के पेपर में तो पास हो ही जायेगा इसके लिए ''रात साढ़े दस बजे ''तो बैठने की ज़रुरत ही नहीं रहेगी जिसके माध्यम से दूरदर्शन अपने को अन्य चैनल के समकक्ष खड़ा करना चाहता है .
इस सबके कारण आज यही कहा जा सकता है कि आज दूरदर्शन मात्र मजबूरी का सौदा बनकर ही रह गया है और मात्र उन्हीं के द्वारा देखा जा रहा है जो अन्य चैनल के लिए पैसा खर्च नहीं कर सकते ,जिन के क्षेत्रों में अन्य चैनल की पहुँच नहीं है ,जिनके पास ज्यादा कुछ देखने का समय नहीं है इन सबके आलावा आज जहाँ कहीं भी पैसे के फूकने वाले हैं ,समय बिताने के साधन ढूंढते रहते हैं और जिनके क्षेत्रों में अन्य चैनल की पहुँच है वे दूरदर्शन को कब से ''गुड बाई ''कह चुके हैं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

साफ़ हो गया अंतर राहुल-अरविन्द का


आख़िरकार साफ़ हो गया कि दिल्ली में ''आप''पार्टी सरकार बनाएगी और उसके मुखिया होंगे 'अरविन्द केजरीवाल 'और एक यही बात साफ कर गयी 'अंतर राहुल गांधी व् अरविन्द केजरीवाल का ',कहने वाले इस बात पर यही कहेंगें कि राहुल गांधी में योग्यता नहीं नेतृत्व करने की और अरविन्द केजरीवाल में क्षमता है सत्ता सँभालने की ,नहीं दिखेगी उन्हें वह 'लालसा 'जो अरविन्द केजरीवाल को देश की राजनीती में प्रमुखता दिलाने वाले अन्ना से भी उन्हें अलग कर गयी और जिसके कारण इनके मतभेद इतने गहरे हुए कि अन्ना ने उसी लोकपाल को मान्यता देते हुए अपना आंदोलन समाप्त कर दिया जिसे उन्ही के किसी समय साथी रहे अरविन्द केजरीवाल ने ''जोकपाल बिल ''करार दिया .
आज जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और 'आप'को दिल्ली की ही नहीं सारे देश की जनता नई उम्मीदों से देख रही है ऐसे में ये कयास लगाये जा रहे थे कि शायद अरविन्द दिल्ली के मुख्यमन्त्री का सेहरा आप के किसी अन्य नेता के सिर सजायेंगे किन्तु ऐसा नहीं हुआ वैसे भी भगवान राम ने भी कहा है कि ''राजमद केवल मेरे भरत को नहीं छू सकता '' फिर ऐसा मौका बार बार हाथ आये ये सम्भव भी तो नहीं है स्वयं अरविन्द केजरीवाल भी इस जनतंत्र को नौटंकी कह चुके हैं और वे स्वयं २६ दिसंबर को अब तक लगातार कई नौटंकी करने के बाद एक और नौटंकी करने के लिए आगे बढ़ लिए हैं रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करने .
स्वयं को जनता की पसंद कहने वाले ,जनता के कहे अनुसार करने वाले ये जनतंत्री अपना मुकाबला राहुल गांधी से करते हैं जो पिछले कितने ही वर्षों से देश के सबसे मजबूत संगठन 'कॉंग्रेस 'को देश की जनता के अनुसार बनाने व् पूर्ण रूप से जनता के हित में लगाने के लिए अपने को संगठन से ही जोड़े हुए हैं वर्ना देश का कोई भी मंत्री पद हो या प्रधानमंत्री पद उन्हें देने के लिए उनका पूरा संगठन कबसे तैयार खड़ा है किन्तु वे जानते हैं कि जनता का हित देखने के लिए उन्हें अभी यह बलिदान करना ही होगा .उनकी मंशा तो कलीम देहलवी के शब्दों में तो मात्र यही नज़र आती है -
''हमारा फ़र्ज़ है रोशन करें चराग-ए-वफ़ा ,
हमारे अपने मवाफिक हवा मिले न मिले .''
और रही विपक्षियों की घटिया उक्ति ''पैराशूट से उतरे गए तो 'ज्योतिष के रहस्य 'पुस्तक में पंडित रामप्रकाश त्रिवेदी जी के अनुसार [पेज 92 ]-.''.....योग्यतम व् कुशलतम ज्योतिषी द्वारा की गयी भविष्यवाणी भी अधिकतम ६०% या ७०% तक ही सही हो सकती है क्योंकि किसी व्यक्ति के भाग्य के १०% अंश को उसके पूर्वज प्रभावित करते हैं .......'' तो राहुल गांधी को उनके पूर्वजों के द्वारा देश हित में किये गए कार्यों का लाभ मिलना लाज़मी है और उस प्रभाव को जो उन्हें अपने पूर्वजों से मिला है आजकल के आये-गए ये नेता अपनी असभ्य भाषा के प्रयोग द्वारा ''फूंक से नहीं उड़ा सकते '' क्योंकि ये उस सीमेंट की तरह है जिसके लिए कहा जाता है कि
''इस सीमेंट में जान है .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 22 दिसंबर 2013

बदचलन कहने को ये मुंह खुल जाते हैं .

Farooq Abdullah scared of women!
अबला समझके नारियों पे बला टलवाते हैं,
चिड़िया समझके लड़कियों के पंख कटवाते हैं ,
बेशर्मी खुल के कर सकें वे इसलिए मिलकर
पैरों में उसे शर्म की बेड़ियां पहनाते हैं .
……………………………………………………………………
आवारगी पे अपनी न लगाम कस पाते हैं ,
वहशी पने को अपने न ये काबू कर पाते हैं ,
दब कर न इनसे रहने का दिखाती हैं जो हौसला
बदचलन कहने को ये मुंह खुल जाते हैं .
…………………..
बुज़ुर्गी की उम्र में ये युवक बन जाते हैं ,
बेटी समान नारी को ये जोश दिखलाते हैं ,
दिल का बहकना दुनिया में बदनामी न फैले कहीं
कुबूल कर खता बना भगवान बन जाते हैं .
……………………………………….
खुद को नहीं समझके ये सुधार कर पाते हैं ,
गफलतें नारी की अक्ल में गिनवाते हैं ,
कानून की मदद को जब लड़कियां बढ़ाएं हाथ
उनसे बात करने से जनाब डर जाते हैं .
…………………………………………………
नारी पे ज़ुल्म करने से न ये कतराते हैं,
बर्बरता के तरीके नए रोज़ अपनाते हैं ,
अतीत के खिलाफ वो आज खड़ी हो रही
साथ देने ”शालिनी ”के कदम बढ़ जाते हैं .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

अब आ पड़ी मियां की जूती मियां के सर .

Muslim bride and groom at the mosque during a wedding ceremony - stock photo
फिरते थे आरज़ू में कभी तेरी दर-बदर ,
अब आ पड़ी मियां की जूती मियां के सर .
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लगती थी तुम गुलाब हमको यूँ दरअसल ,
करते ही निकाह तुमसे काँटों से भरा घर .
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पहले हमारे फाके निभाने के थे वादे ,
अब मेरी जान खाकर तुम पेट रही भर .
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कहती थी मेरे अपनों को अपना तुम समझोगी ,
अब उनको मार ताने घर से किया बेघर .
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पहले तो सिर को ढककर पैर बड़ों के छूती ,
अब फिरती हो मुंह खोले न रहा कोई डर .
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माँ देती है औलाद को तहज़ीब की दौलत ,
मक्कारी से तुमने ही उनको किया है तर .
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औरत के बिना सूना घर कहते तो सभी हैं ,
औरत ने ही बिगाड़े दुनिया में कितने नर .
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माँ-पिता,बहन-भाई हिल-मिल के साथ रहते ,
आये जो बाहरवाली होती खटर-पटर .
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जीना है जो ख़ुशी से अच्छा अकेले रहना ,
''शालिनी ''चाहे मर्दों के यूँ न कटें पर .
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शालिनी कौशिक
[WOMAN ABOUT MAN]

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

श्रेय-एक लघु कथा

श्रेय-एक लघु कथा

''राजू .....राजू .....''मद्धिम सी पड़ती आवाज़ में अनुपम बाबू जी ने अपने पोते को पुकारा ,.....हाँ दादा जी .....कहकर तेज़ी से राजू बाहर से भागता हुआ आया ,.....बाबू जी ने उसे आँख खोलकर देखा ,कुछ कहते कहते रुक गए ,....दादा जी ,''आप कुछ कहिये तो जो आप कहेंगें मैं पूरा करूँगा ,अपने प्राण देकर भी पूरा करूँगा ,आप कहिये तो .''...नहीं रे!तेरे प्राण नहीं चाहियें ,तू ऐसा मत कह ,..कहते कहते बाबू जी रोने लगे .....''दादा जी !कहिये तो आप एक बार कहिये तो मैं अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी आपकी बात को पूरी करूँगा ,कहिये तो ..''
''राजू ! ....जी दादा जी .......काम मुश्किल तो है पर मैं चाहता हूँ कि मैं ये कोठी तेरे और अपने धेवतो के नाम कर जाऊं ,तेरे लिए ये काम मुश्किल है क्योंकि इस सबका मालिक वास्तव में तू ही है ,पर मेरे वे धेवते .....उनका क्या होगा राजू .....वे तो बिल्कुल नाकारा हैं ,अगर उन्हें घर भी नहीं मिला तो कहाँ ठोकर खाते फिरेंगे फिर आज तो सब तेरे हाथ में है कल को तेरी शादी हो जायेगी तब तू अगर विवश हो गया तब क्या होगा ?''राजू सब ध्यान से सुन रहा था ...दादा जी के चुप होने पर गहरी साँस लेते हुए बोला ,दादा जी ,जैसा आप चाहते हैं वैसा ही होगा .''
और अगले दिन ही राजू ने वकील साहब को बुलाकर दादा जी के कहे मुताबिक उनकी वसीयत करा दी .अब दादा जी खुश थे और राजू को ढेरों आशीर्वाद दे रहे थे और धेवते इसका सारा श्रेय दादा जी को दे रहे थे .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

समाज टूट रहा है -मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण

समाज टूट रहा है -मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण
इंटरमीडिएट के छात्र छात्रा ने हरिद्वार में ख़ुदकुशी की, समाचार पत्र की हेडलाइंस -''बाइक से आये शादी की और जान दे दी ,''अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर स्थान और चिंता मात्र ये कि ''प्रेमी युगल ने किसके खौफ में की   मौत से ‘दोस्ती’''जबकि चिंता क्या होनी चाहिए यही न कि आज हमारा युवा कहाँ जा रहा है वह उम्र जो उसके अपना कैरियर बनाने की है उस उम्र में वह प्यार जैसे वहम में पड़ता जा रहा है जो कि विशेषज्ञों के अनुसार इस उम्र में मात्र आकर्षण होता है जो कि जीवन की कठिन परिस्थितियों को देखकर बहुत जल्दी ही छूमंतर हो जाता है किन्तु इसे न तो आज कोई समझना चाहता है और न ही समझाना और वह जिसकी इस क्षेत्र में सर्वाधिक जिम्मेदारी बनती है वह मात्र अपनी रेटिंग हाई रखने के लिए ,अख़बार की बिक्री बढ़ाने के लिए ऐसी ख़बरों को ऊपर स्थान दे रहा है और भटका रहा है हमारे युवा को जो इसे बहुत ऊंचाई पर लेकर चलते हैं .
और न केवल युवा बल्कि ये हमारा मीडिया आज जहाँ देखो प्रेमी युगल संकल्पना की स्थापना करने में लगा है जहाँ कहीं दो आदमी औरत एक साथ खबर में आये नहीं कि उन्हें प्रेमी युगल कहकर अपनी रेटिंग हाई की जाती है और अख़बार बेचे जाते हैं क्यूँ नहीं समझता यह मीडिया अपना उत्तरदायित्व कि आज समाज को सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है और वह देने में वह अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है .
सबसे पहले तो मीडिया को अपने आप ही ऐसे ख़बरों का शीर्षक परिवर्तन करते हुए इन्हें समाज के कलंक के रूप में ही दिखाना होगा क्योंकि ये फिल्मों की भाषा हो सकती है -
''न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन ''
वास्तव में इनका कोई स्थान नहीं और आज ऐसी वाहियात बातों पर रोक की आवश्यकता है क्योंकि हर काम के लिए कानून नहीं हो सकता ये समाज का उत्तरदायित्व है और समाज के सबसे महत्वपूर्ण अंग मीडिया की भूमिका इसलिए ही सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उसकी ख़बरों को जनता में वरीयता देते हुए अपनी दिनचर्या में सबसे पहले स्थान दिया जाता है .
इसके साथ ही समचारपत्रों के माध्यम से भी मीडिया को ये बात बात में प्रेमी युगल लिखना बंद करना होगा क्योंकि ऐसे लोग जो अपने भरे पूरे परिवारों को छोड़कर या ऐसी औरतें जो अपने पति बच्चों को छोड़कर भागती हैं वे पलायन वादी हैं और तिरस्कार के अधिकारी हैं न कि इस पवित्र संज्ञा के जिससे नवाज़ नवाज़ कर मीडिया इनके हौसलों को बुलंद कर रहा है और प्यार की गलत परिभाषाएं जनता के समक्ष रख रहा है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

दाता ही थैला लेके उसके ठौर आ गया है .


तब्दीली का जहाँ में अब दौर आ गया है ,
कुदरत के ख़त्म होने का दौर आ गया है .
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पहले भिखारी फिरते घर घर कटोरा लेकर ,
दाता ही थैला लेके उसके ठौर आ गया है .
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प्यासा भटकता था कभी कुएं की खोज में ,
अब कुआं उसके दर पे ले चौंर आ गया है .
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तप करते थे वनों में पाने को प्रभु भक्ति ,
खुद रब को अनासक्तों का गौर आ गया है .
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भगवन ये पूछते थे क्या मांगते हो बेटा,
बेटे के बिना मांगे मुंह में कौर आ गया है .
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दुनिया में तबाही का यूँ आ रहा है मंज़र ,
पतझड़ के समय पेड़ों पर बौर आ गया है .
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ऊँगली उठाना आसाँ मुश्किल है काम करना ,
''शालिनी ''की समझ में ये तौर आ गया है .
.......
शब्दार्थ-ठौर-ठिकाना ,चौंर-चंवर ,कौर-निवाला .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 15 दिसंबर 2013

''आप'' की मम्मी

 

 
''अरुणा ''सतीश ने कॉलिज में अरुणा को पीछे से आवाज़ लगायी ,''हाँ''अरुणा ने कहा ,क्या सोचा ,इतिहास लोगी या राजनीति शास्त्र ,नहीं अभी कुछ नहीं सोचा ,मम्मी से पूछकर बताऊंगी ,कहकर अरुणा क्लास में चली गयी .
      ''देखिये आप में से जो भी स्टूडेंट शैक्षिक भ्रमण के लिए चलना चाहते हैं वे अपना नाम मित्तल सर के पास लिखवा दें परसों तक का समय है ४ दिन बाद जाना है .''अनीता मैडम ने क्लास में सभी को बताया .
          ''अरुणा चलोगी  टूर पर ?''सतीश ने पुछा ''मम्मी से पूछूंगी ''कहकर अरुणा जब जाने लगी तो सतीश बोला -ठहरो एक मिनट ,तुमने मुझसे किसी जॉब के लिए कहा था मेरे अंकल के ऑफिस में स्टेनो टाइपिस्ट की जगह खाली है ,करोगी क्या?''अच्छा चलो मम्मी से पूछकर बताती हूँ कहकर अरुणा तेज़ी से घर के लिए निकल गयी और सतीश देखता रह गया .
      एक महीने बाद ,
         ''और अरुणा कैसी चल रही है जॉब ?रेस्टोरेंट में चाय की चुस्की लेते हुए सतीश ने अरुणा से पुछा ,''ठीक है ,पर अभी तनख्वाह काफी कम है ,अरुणा थोड़ी उदास होकर बोली ,''अच्छा अगर तुम चाहो तो मैं अपनी आंटी के स्कूल में टीचर की पोस्ट के लिए बात करके देखूं ,शायद अभी ही खाली हुई है एक सीट और तुम्हें कंप्यूटर भी तो आता है ना ?''  हाँ आता तो है ,पर पहले मैं मम्मी से पूछ लूं ''अरुणा ने चाय ख़त्म करते हुए कहा .
          जैसे ही सतीश वहाँ से चलने लगा अरुणा बोली ,''ठहरो सतीश !वो हमारी शादी का क्या रहा ,तुम्हें तो काफी जल्दी थी ना ?  अरुणा के इस सवाल पर सतीश पहले तो चुप रहा फिर कुछ सोचकर बोला -''देखो अरुणा !आप को विषय कौन सा लेना है इसके लिए पहले आप अपनी  मम्मी से पूछोगी ,फिर टूर पर जाना है या नहीं ये भी आप की मम्मी बताएंगी ,नौकरी करनी है या नहीं आप की मम्मी से पूछा जायेगा ,कौन सी नौकरी करनी है ये भी आप की मम्मी बताएंगी ,इसलिए मैंने सोचा है कि क्यूँ न आपकी मम्मी से ही शादी कर ली जाये .''सतीश ये कहकर अपना बैग उठाकर तेज़ी से निकल गया और अरुणा उसे देखती रह गयी .
       शालिनी कौशिक 
           [कौशल ]
 
 

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

अकेले कुमार विश्वास ही क्यूँ?

अकेले कुमार विश्वास ही क्यूँ?
दिल्ली विधानसभा चुनावों में जनता के जबरदस्त समर्थन पर २८ सीटें जीतने वाली ''आप'' अब लोकसभा चुनावों की तैयारी में है और काफी उत्साह में है ''आप''के कार्यकर्ता और अब इन्हें दिखाई दे रहे हैं ''राहुल गांधी ''जिनके खिलाफ इनके राष्ट्रीय प्रवक्ता मनीष सिसौदिया कह रहे हैं कि ''कुमार विश्वास को राहुल गांधी के सामने चुनाव लड़ाया जाये .''उन्होंने कहा कि ''राहुल गांधी ही क्या कुमार को वे हिन्दू ह्रदय सम्राट के सामने भी चुनाव लड़ा सकते हैं ''हिन्दू ह्रदय सम्राट से उनका इशारा भाजपा के पी.एम्.पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तरफ था .

AAP hints at Kumar Vishwas-Rahul Gandhi clash in LS polls

इतनी बढ़चढ़कर बातें करने वाली ''आप ''की जिम्मेदारी लेने की क्षमता का आकलन करने के लिए तो हम पिछले कुछ दिनों के समाचार पत्र देख सकते हैं -
१- दिल्ली में सरकार बनाने को लेकर गतिरोध बरक़रार -कॉंग्रेस आप को बिना शर्त समर्थन देने को तैयार -लेकिन अरविन्द केजरीवाल बोले -हम सरकार बनाने की दौड़ में नहीं -''अमर उजाला ११ दिसंबर २०१३
२-दिल्ली में कोई सरकार बनाने को तैयार नहीं -भाजपा और आप विपक्ष की भूमिका निभाने के पक्षधर -दैनिक जागरण १० दिसंबर २०१३
३-सरकार बनाने को राजी नहीं भाजपा -आप -दिल्ली बढ़ी राष्ट्रपति शासन और नए चुनाव की ओर-अमर उजाला १० दिसंबर २०१३ .
बड़े बड़े वादे कर राजनीति के अखाड़े में उतरना आसान है किन्तु जिम्मेदारी निभाना मुश्किल ,ये बात ''आप'' ने साबित भी कर दी है और महंगाई ,भ्रष्टाचार को लेकर अपना झंडा बुलंद करने वाली ये पार्टी अगर हिम्मत रखती है तो दबंगई ,दारु ,शराब ,नोट बाटने वाली ,बूथ कैप्चरिंग करने वाली शक्तियों के खिलाफ खड़ी होकर दिखाए क्योंकि सत्ता में आने के लिए जिन ताकतों द्वारा पहले राह रोकी जाती है वह ये हैं और इनकी ही वजह से सभ्य ,सुशिक्षित ,ईमानदार लोग राजनीति से किनारा कर लेते हैं अगर ऐसी शक्तियों को ये अपने जनसमर्थन के बल पर राजनीति से दूर कर सकें तो सच्चे ह्रदय से जनहित कर पायेंगें ,इस तरह कभी राहुल गांधी कभी नरेंद्र मोदी जैसे उम्मीदवारों के सामने खड़ा होने की घोषणा मात्र सस्ते प्रचार का माध्यम ही है और कुछ नहीं .
और अंत में ,कुमार विश्वास भी ये जान लें कि हर जगह की जनता इस तरह की अहसान फरामोश नहीं होती जैसी दिल्ली की जनता शीला दीक्षित जी के साथ रही .जनता अपने यहाँ काम करने वाले उम्मीदवार को पहचानती है और राहुल गांधी को भले ही अनाप-शनाप बकवास करने वाले कुछ ही कहकर अपने दिमाग की धार भले ही पैनी कर लें किन्तु अमेठी की जनता अपने ईमानदार ,कर्मठ व् योग्य उम्मीदवार के साथ कभी अहसान फरामोशी नहीं करेगी भले ही ''आप'' उनके सामने ''अकेले कुमार विश्वास ही क्यूँ'' अपने सारे उम्मीदवारों को भी मिलाकर खड़ा कर ले .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

उम्मीदवारी के कुछ कर्त्तव्य भी होते हैं जनाब .

उम्मीदवारी के कुछ कर्त्तव्य भी होते हैं जनाब .
''गांधी का यह देश नहीं ,बस हत्यारों की मंडी है ,
राजनीति की चौपड़ में ,हर कर्ण यहाँ पाखंडी है .''
उपरोक्त पंक्तियाँ अक्षरशः खरी उतरती हैं इस वक़्त सर्वाधिक प्रचारित ,कथित हिन्दू ह्रदय सम्राट ,देश को माँ-माँ कहकर सबके दिलों पर छाने की कोशिश करने वाले गांधी के ही गुजरात के बेटे और गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में हैट्रिक लगाने का पुरुस्कार भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्राप्त करने वाले शख्स नरेंद्र मोदी जी पर ,जिन्हें लगता है कि इस उम्मीदवारी से उन्हें मात्र अधिकार मिलें हैं विरोधियों पर कटाक्ष करने के और वह भी अभद्रता की हद पर करने वाले कटाक्ष और मुख़ालिफ़ों के बयानों में से कोई न कोई बात पकड़कर उसकी खाल निकालने का .
हमारी भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने कहा था कि कर्त्तव्य के संसार में ही अधिकारों की महत्ता है और यह सभी जानते भी हैं कि अधिकार और कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलु हैं तो ऐसे में मोदी जी १३ दिसंबर को अपना कर्त्तव्य कैसे भूल गए जो कि इस उम्मीदवारी से उन्हें मिला है गुजरात के मुख्यमंत्री होने के कारण नहीं .१५ अगस्त को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की बराबरी करने के लिए जो शख्स नकली लाल किले पर चढ़कर भाषण दे सकता है वह १३ दिसंबर को अपना कर्त्तव्य पूर्ण करने हेतु नकली संसद बनाकर शहीदों को श्रद्धांजलि देना कैसे भूल गया ?
संसद पर हमले की १२ वीं बरसी पर जहाँ देश शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि दे रहा था वहीँ नरेंद्र मोदी जी राजस्थान में वसुंधरा राजे जी के शपथ ग्रहण समारोह की शोभा बढ़ाते हुए आनंद मग्न हो रहे थे .क्या यही है नरेंद्र मोदी जी का अपने देश की दुःख की घडी में साथ देने का तरीका जो कि एक फ़िल्मी गाने में देवानंद जी का था -
''गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ ,
मैं खुद को उस मक़ाम पे लाता चला गया .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

केजरीवाल आगे बढ़ो :हम तुम्हारे साथ हैं .

केजरीवाल आगे बढ़ो :हम तुम्हारे साथ हैं .
ArvindKejriwal2.jpg 
;;आप'' को दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली भारी सफलता ,आप ने किसी भी पार्टी को समर्थन देने या किसी भी पार्टी से समर्थन लेने से इंकार किया ,आप ने अपनी सफलता का जश्न मनाया ,आदि रोज ऐसी ख़बरों से दूरदर्शन ,समाचार पत्र ,विभिन्न वेबसाइट भरे पड़े हैं किन्तु यदि खाली है तो वह है जनता की महत्वकांक्षाओं का आकाश और उसके भरे जाने की कोई सम्भावना नज़र भी नहीं आ रही क्योंकि आप पार्टी अपनी इस सफलता से अपना दिमाग ख़राब करे बैठी है और ये सोचे बैठी है कि यदि हमने इस बार के आधे अधूरे समर्थन के लिए अपनी नाराज़गी जाहिर करते हुए सरकार नहीं बनायीं तो जनता हमारे त्याग बलिदान से प्रभावित होकर हमें अगले चुनाव में पूर्ण बहुमत प्रदान करेगी ,शायद ये कहावत वे भूल गए हैं या जानते ही नहीं कि -
''आधी को छोड़ पूरी को ध्यावे ,
आधी मिले न पूरी पावे ''

और फिर जनता ने उन्हें काम करने के लिए वोट दिया है और वे वही करने से हिचक रहे हैं या न करने के बहाने बना रहे हैं .जब कॉंग्रेस उन्हें बिना शर्त समर्थन दे रही है और वे स्वयं भी दुसरे दलों के अच्छे नेताओं को अपनी पार्टी में आमंत्रित कर रहे हैं [जैसे अन्य में रहकर भ्रष्ट इनकी पार्टी में आकर ईमानदार हो जायेंगे ]और यदि वे ऐसा सोचते हैं कॉंग्रेस का बिना शर्त समर्थन स्वीकार करें और उन्हें अपने से जोड़कर जनता की उन आकांक्षाओं की पूर्ति कर दिखाएँ जिसके लिए जनता ने उन्हें अपने सभी स्वार्थों को दरकिनार कर वोट दी है क्योंकि वैसे भी अभी तक जो भी हो रहा है उससे पार्टियों का ही सुख दुःख जाहिर होता है जनता का सुख दुःख तो तब जाहिर होगा जब आप उनकी आकांक्षाओं पर खरे उतरने का प्रयास करते दिखायी देंगे .वैसे भी ऐसा समर्थन लेकर उन पर क्या फर्क पड़ने वाला है जो बिना शर्त है क्योंकि यदि ये बाद में कोई शर्त लगाकर इन्हें झुकाने का प्रयास करेंगे तो आप इनकी शर्त को जनता के समक्ष रखकर इनकी रही सही ८ सीटें भी छीन सकते है और रही इनकी पार्टी की ईमानदार छवि पर इस गठजोड़ का प्रभाव तो सभी जानते हैं -
''चन्दन विष व्याप्त नहीं ,लिपटे रहे भुजंग ,''
तो केजरीवाल जी आगे बढ़ें और सरकार बनाकर देश नहीं अभी उसकी राजधानी से ही भ्रष्टाचार व् महंगाई को दूर भगाकर दिखाएँ .हम सभी की ओर से अग्रिम शुभकामनायें .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

त्रिशंकु विधानसभा नहीं दिल्ली की जनता

त्रिशंकु विधानसभा नहीं दिल्ली की जनता
दिल्ली विधानसभा चुनाव २०१३ के जो परिणाम आये हैं वे न केवल कॉंग्रेस के लिए बल्कि स्वयं वहाँ की जनता के लिए भी निराशाजनक हैं .कॉंग्रेस के लिए तो मात्र इतनी ही निराशा है कि वह वहाँ की सत्ता से बेदखल हो रही है किन्तु जनता के लिए बहुत ज्यादा क्योंकि जिन दलों को उसने कॉंग्रेस के मुकाबले वरीयता दी है उनमे यह हिम्मत ही नही कि वे सरकार बनायें ,ये हिम्मत भी कॉंग्रेस में ही है .कॉंग्रेस के ही पी.वी.नरसिंह राव ने ५ वर्ष तक १९९१ से १९९६ तक अल्पमत सरकार चलाकर दिखाई थी और विपक्ष देखता रह गया था और इस बार की भी यु.पी.ए.सरकार के लिए भाजपा के ही मुख़्तार अब्बास नकवी कहते हैं कि ''ये सरकार तो आरम्भ से ही अस्थिर रही है .''और कितनी बड़ी असफलता कही जायेगी विपक्ष की जिसकी भाजपा सिरमौर बनी फिरती है कि वह इसे गिरा नहीं पायी केवल अपने अनर्गल प्रलाप से ही अपने और बहुत से विपक्षियों के मन को खुश करती रही जबकि वह विपक्ष की भूमिका भी सफलतापूर्वक नहीं निभा पायी जिसका मुख्य कर्त्तव्य था कि वह देश को उसकी नापसंदगी की सरकार से अतिशीघ्र मुक्ति दिलाये .
और अब भाजपा व् आप दोनों ही ऐसी स्थिति में हैं कि दिल्ली में सरकार बनायें किन्तु दोनों ही हिचक रहे हैं कारण साफ है कि वे जानते हैं कि यदि हैम ऐसी स्थिति में सरकार बनाते हैं तो हम इस कार्य को सफलतापूर्वक नहीं कर पाएंगे और हमारी यह विफलता लोकसभा चुनाव २०१४ में हमारी दावेदारी को ही खतरे में डाल देगी किन्तु जनता का हित देखने वाले ये भ्रमित हितेषी स्वयं नहीं देख रहे कि वे अपने हालिया आचरण से ये कार्य पहले ही कर चुके हैं .जनता के धन का जो इस्तेमाल चुनाव में होना था वह हो चूका है जनता अपनी पसंद जाहिर कर चुकी है और भाजपा को एकमात्र बड़ी पार्टी के रूप में चुन चुकी है साथ ही उसके बाद अपनी पसंद के रूप में आप को स्थान दे चुकी है और दोनों ही पार्टियां न तो सरकार बना रही हैं न ही किसी का समर्थन कर रही हैं इससे जनता के धन व् समय की तो हानि हो ही रही है जनता की महत्वाकांक्षाओं पर भी कुठाराघात हो रहा है इसलिए अब इनका दायित्व बनता है कि ये जनता के प्रति अपने दायित्व की पूर्ति का मार्ग तलाशें न कि दायित्व से भागने का .
किन्तु इन दोनों दलों की कार्यप्रणाली से ऐसा होता नहीं दिखता क्योंकि इनमे शासन की वह योग्यता ही नज़र नहीं आती जो कॉंग्रेस में है और इसलिए ये बस बाते ही बनाते दिखते हैं काम के नाम पर स्वयं को विपक्ष में बैठने का बहाना बनाते नज़र आते हैं और यही कारण है कि कॉंग्रेस देश में सर्वाधिक आलोचना का शिकार होकर भी बार बार सत्ता में छा जाती है और इन दलों द्वारा हमेशा अपनी सीट विपक्ष के लिए ही सुरक्षित रखी जाती है .विपक्षी दलों की इसी अयोग्यता के कारण कॉंग्रेस ऐसी बड़ी बड़ी हार होने के बावजूद बार बार सत्ता में आती है और आती रहेगी क्योंकि -
''गिरते हैं शह सवार ही मैदान-ए-जंग में ,
वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चले .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 8 दिसंबर 2013

क़ुबूल कीजिये

कहीं नेता तो कहीं योजनाएं
शिकस्त-ए-सियासत क़ुबूल कीजिये ,
मेहनत नहीं आराम अब क़ुबूल कीजिये .
अवाम से इंसाफ की करते रहे तौहीन
गुरुर छोड़ सादगी क़ुबूल कीजिये .
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इज़हार-ए-ख्यालात हैं ज़म्हूरियत में ये ,
नाराज़गी जमहूर की क़ुबूल कीजिये .
परेशां होने से होगा न कुछ हासिल
चुनौती मान दिल से क़ुबूल कीजिये .
..........................................................
फतह नसीब है वही सेवक हो वफादार ,
फरेब किया आपने क़ुबूल कीजिये .
एहसान फरामोशी ही कर रहे थे आप
फ़र्दे-ज़ुर्म मर्द बन क़ुबूल कीजिये .
..........................................................
Harsh Vardhan thanks Delhi voters for BJP's win Politics will no longer be hostage to communalism, corruption: Arvind Kejriwal
कामयाब आप हैं न भूलकर इन्हें ,
रख सामने सबक ये क़ुबूल कीजिये .
फरेफ़ता अवाम है ईमानदार की
फ़र्ज़ अब फराख दिल क़ुबूल कीजिये .
........................................................
मुखालफत में बैठकर है बोलना आसान ,
मल्लाही सल्तनत की क़ुबूल कीजिये .
उठाते रहे उँगलियाँ जिन पर तुनक-तुनक
उनकी जड़ों को काटना क़ुबूल कीजिये .
......................................................
सत्ता की खिलाफत सदा होती है हर तरफ ,
न अपनी सोच जीत को क़ुबूल कीजिये .
वादों की जिस पतंग संग आप उड़ रहे
तरफैन हवाओं का क़ुबूल कीजिये .
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लाठी खुदा की चलती है इंसाफ के लिए ,
सत्ता से बाहर आना भी क़ुबूल कीजिये .
लाठी लिए जनता खड़ी सब हुक्मरानों पर
सुकून पल को ''शालिनी ''क़ुबूल'' कीजिये .
शब्दार्थ :-शिकस्त-हार ,अवाम-जनता ,जम्हूरियत-लोकतंत्र ,फ़र्दे-जुर्म -अभियोग सूची ,मर्द-वीर साहसी ,फरेफ़ता-मोहित ,फराख दिल -उदार ह्रदय ,तर फैन -पक्ष .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

क्यूँ न अब लॉटरी सिस्टम लागू किया जाये ?

not only narendra modi, shivraj singh chouhan can also win third electioncongress, raman singh, bjpModi campaign effect in mp
सत्ता का सेमीफाइनल भाजपा के पक्ष में गया किन्तु इस सेमीफाइनल के परिणाम ने भाजपा की मुश्किलों में इज़ाफ़ा कर दिया है जहाँ इसमें जीतकर शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह ने मोदी की तरह अपने राज्य में सत्ता में रहने की हैट्रिक लगा ली है वहीँ भाजपा को प्रधानमंत्री पद के लिए किये गए निर्णय पर एक बार फिर विवश कर दिया है आखिर अब भाजपा को इस पर विचार क्यूँ नहीं करना चाहिए क्योंकि इसी एक काबिलियत के आधार पर तो मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था अब दो और उस सूची में शामिल हो गए हैं क्यूँ न अब लॉटरी सिस्टम लागू किया जाये ?
शालिनी कौशिक
[कौशल]

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

भौतिकवादी भारतीय परम्परावादी नाटक के पात्र .

भारतीय परम्पराओं के मानने वाले हैं ,ये सदियों से चली आ रही रूढ़ियों में विश्वास करते हैं और अपने को लाख परेशानी होने के बावजूद उन्हें निभाते हैं ये सब पुराने बातें हैं क्योंकि अब भारतीय तरक्की कर रहे हैं और उस तरक्की का जो असर हमारी परम्पराओं के सुन्दर स्वरुप पर पड़ रहा है वह और कहीं नहीं क्योंकि एक सच्चाई ये भी है कि अवसरवाद और स्वार्थ भी हम सबमे कूट कूटकर भरा हुआ है और हम अपने को फायदा कहाँ है बहुत जल्दी जान लेते हैं और वही करते हैं जिसमे फायदा हो .
भारत में विशेषकर हिंदुओं में हर व्यक्ति के जीवन में १६ संस्कारों को स्थान दिया गया है इसमें से और कोई संस्कार किसी का हो या न हो और लड़कियों का तो होता ही केवल एक संस्कार है वह है विवाह जो लगभग सभी का होता है तो इसमें ही मुख्य रूप से परिवर्तन हम ध्यान पूर्वक कह सकते हैं कि निरंतर अपनी सुविधा को देखते हुए लाये जा रहे हैं और ये वे परिवर्तन हैं जिन्होंने इस संस्कार का स्वरुप मूल रूप से बदलकर डाल दिया है और ये भी साफ़ है कि इस सबके पीछे हम हिंदुओं की अपनी सुविधा और स्वार्थ है .परिवर्तन अब देखिये क्या क्या हो गए हैं -
* पहले विवाह में रोज-रोज घर की औरतें कई दिनों से गीत किया करती थी आज समय के अभाव ने सब ख़त्म कर दिया है और रतजगा जो कि फिल्मों तक में प्रचलित था आज समाज से समाप्त हो चूका है नाचना गाना है पर सब कान फोडूं स्टाईल में ,एक दिन महिला संगीत का आयोजन किया जाता है और उसमे महिला तो महिला पुरुष भी भली भांति जुटे रहते हैं और ऐसा आयोजन होता है जो न केवल बहुत उत्साह दर्शाता है बल्कि पूरे मोहल्ले का चैन हराम करा जाता है और वह होता है डी.जे.आयोजन .कान फोडूं इस आयोजन ने विवाह को एक सिर फोडूं आयोजन में परिवर्तित कर दिया है .
* पहले ये था कि कंगना बांधने के बाद दूल्हा -दुल्हन बनने वाले लड़का लड़की कहीं आते जाते नहीं थे क्योंकि ये आशंका रहती थी कि कोई बुरी आत्मा उन पर असर कर जायेगी किन्तु अब तो लोगों के दिमाग बदल चुके हैं और लड़का तो लड़का लड़की भी कहीं कहीं फिरते नज़र आते हैं मुख्यतया ब्यूटी पार्लर क्योंकि कुछ भी हो पर सुन्दर तो दिखना ज़रूरी है .
*पहले लड़के के ब्याह में माँ नहीं जाती थी किन्तु समय बदला और लोगों के दिमाग भी कि आखिर माँ को इस आयोजन से क्यूँ वंचित रखा जाये जैसे वहाँ जाकर ही वह अपने लड़के की ख़ुशी में शामिल हो सकती है जबकि माँ यदि वहाँ नहीं जाती थी तो इसके पीछे एक मुख्य कारण ये था कि वह उसके पीछे कुछ अन्य रीति रिवाज़ों को यहाँ पूरा करती थी और विवाह का घर सूना रहना भी अच्छा नहीं माना जाता किन्तु अब ये भी होने लगा है .
*लड़की के ब्याह को घर की चौखट का पूजन माना जाता था किन्तु अब नहीं क्योंकि अब ये काम अधिकतर लड़की वाले लड़के वालों की इच्छा पर और स्वयं के काम भी कम करने की इच्छा पर घर से कहीं दूसरे शहर में या फिर लड़के वालों के शहर में करने लगे हैं इसलिए अब चौखट का पूजन भी समाप्त और ये भी कि फेरों के समय जो दिए जलाये जाते थे वे भी होटल या विवाह मंडप वालों द्वारा अति शीघ्र निपटान की कार्यवाही में समाप्त .*विवाह के पश्चात् विदाई होती है और उसके बाद लड़की एक दिन बाद अपने घर आती थी इसके पीछे का उद्देशय उसके नए घर के बारे में भी जानना होता था वहाँ उसकी कुशल क्षेम के बारे में जानना होता था किन्तु अब सब ख़त्म अब विवाह के बाद विदाई का नाटक फिर तभी उसके आने का नाटक और फिर उसका अपनी ससुराल जाना और वहाँ से उसकी दिन हनीमून को प्रस्थान जिसके कारण ये सब नाटकीय आयोजन .
अब कुछ नहीं रह गया है बस नाटक नाटक और सिर्फ नाटक और ये सब किसलिए वह भी धन दौलत लूटने के लिए कहाँ तो एक तरफ वैवाहिक विज्ञापन में लड़की की सुंदरता मायने रखती है और कहाँ लड़की चाहे लूली हो लंगड़ी हो बीमार हो काली हो भैंस हो सब चलती है मात्र इसलिए कि वह दौलत से घर भर देगी .
अब जिस तरह सब टूटता जा रहा है वह दिन दूर नहीं जब लड़की बारात लाएगी और लड़का ले जायेगी और इससे बढ़कर भी हो सकता है कि विवाह की रस्मे ख़त्म ही हो जाएँ और हमारे समाज में मात्र लिव इन रिलेशन ही रह जाये .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

औरत :आदमी की गुलाम मात्र

Hanging_dead : Suicide. Goth girl. Stock Photo

अभी अभी एक नए जोड़े को देखा पति चैन से जा रहा था और पत्नी घूंघट में ,भले ही दिखाई दे या न दे किन्तु उसे अब ऐसे ही चलने का अभ्यास करना होगा आखिर करे भी क्यूँ न अब वह विवाहित जो है जो कि एक सामान्य धारणा के अनुसार यह है कि अब वह धरती पर बोझ नहीं है ऐसा हमारे एक परिचित हैं उनका कहना है कि ''जब तक लड़की का ब्याह न हो जाये वह धरती पर बोझ है .''
मैंने अपने ही एक पूर्व आलेख ''विवाहित स्त्री होना :दासी होने का परिचायक नहीं '' में विवाह को दासता जैसी कुरीति से अलग बताया था किन्तु यह वह स्थिति है जिसमे विवाह संस्कार को वास्तविक रूप में होना चाहिए किन्तु ऐसा होता कहाँ है ?वास्तविक रूप में यहाँ कोई इस संस्था को रहने ही कहाँ देता है कहीं लड़के के माँ-बाप इस संस्कार का उद्देश्य मात्र लड़की वालों को लूटना -खसोटना और यदि देहाती भाषा में कहूँ तो'' मूंडना '' मान लेते हैं तो कहीं स्वयं लड़की वाले कानून के दम पर लड़के वालों को कानूनी दबाव में लेकर इसके बल पर ''कि दहेज़ में फंसाकर जेल कटवाएंगे ''उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और धन ऐंठकर ही छोड़ते हैं .कहीं लड़का ये सोचकर ''कि नारी हीन घर भूतों का डेरा ,नारी बिना कौन करेगा ढेर काम मेरा ''या ''इस लड्डू को जब जो खाये वह पछताए जो न खाये वह पछताए तो क्यूँ न खा कर पछताऊं ''किसी लड़की को ब्याहकर घर लाता है तो कहीं लड़की भी अपनी सामाजिक स्थिति को मजबूत करने के लिए,क्योंकि उसे समाज में ''बाप के ऊपर पहाड़ '' जैसी उक्तियों से नवाज़ा जाता है ,से मुक्ति पाने के लिए तो कहीं [कहने वालों और भुक्तभोगियों के अनुसार ]अपने कई स्वार्थ संजोये बहू बन आती है किन्तु जो सच्चाई हो कही वही जाती है और सच्चाई यही है कि आदमी औरत को अपनी गुलाम से बढ़कर कुछ नहीं समझता और अगर ऐसा नहीं है -
* तो क्यूँ एक जगह विवाह के समय लड़के द्वारा यह मांग कि लड़की अपने बड़े बड़े बालों को कटवाकर छोटा कर ले और एक जगह छोटे बालों वाली लड़की से अपने बाल बढाकर शादी करने की शर्त रखी जाती है ?
*क्यूँ शादी के बाद लड़की के रहन सहन ,पहनावे का बदल जाना ,मांग में सिन्दूर ,गले में मंगलसूत्र ,साडी या सूट हो किन्तु सिर ढका होना ,कहीं कहीं पूरे मुंह पर घूंघट पड़ा होना ,पैरों में बिछुए कहने को ये सब विवाहित होने की पहचान हैं ,स्त्री के सुहाग की रक्षा के लिए तो फिर पुरुष के रहन सहन पहनावे में कोई अंतर क्यूँ नहीं ?
*क्यूँ उसपर अपनी सुहागन की रक्षा का कोई दायित्व नहीं ,हाथ पैरों से तो उसकी पत्नी भी उसकी सेवा करती है तब भी उसपर इतने प्रतिबन्ध फिर सिर्फ उसके साथ को ही क्यूँ उसकी पत्नी की मजबूती माना जाता है उसे क्यूँ नहीं पहनने होते ये आभूषण आदि ?
* क्यूँ उसका विवाहित दिखना उसी तरह ज़रूरी नहीं जैसे नारी का विवाहित दिखना ज़रूरी है ?
* क्यूँ वही अगले जन्म में भी अपने पति को पाने के लिए व्रत रखे ,क्यूँ पति पर इस व्रत का दायित्व नहीं इसलिए तो नहीं क्योंकि वह धरती पर बोझ नहीं है उसका ब्याह हो या न हो वह तारणहार की भूमिका में ही है .अगर किसी नारी का पति किसी बीमारी या दुर्घटना वश मर जाये तो उसपर विधवा का ठप्पा लग जाता है और अगर किसी तरह उसका दूसरा विवाह होता है तो एक ''बेचारी ''कहकर ही किया जाता है किन्तु एक पुरुष भले ही दहेज़ के लिए स्वयं ही पत्नी की हत्या कर दे उसके लिए लड़कियों की ''कुंवारी ''लड़कियों की लाइन लगी रहती है ,यहाँ तक कि बुज़ुर्ग से बुजुर्ग पुरुषों को भी ''बेचारी तो बेचारी ''कुंवारी छोटी उम्र की लड़कियां भी सहजता से विवाह के लिए उपलब्ध हो जाती हैं भले ही उनके अपने बच्चे भी उस लड़की से बड़ी उम्र के ही क्यूँ न हों .
आज ''लिव इन रिलेशन ''को न्याय की संरक्षक सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट ही कानूनी जामा पहनाने में लगी है जबकि इसमें भी औरत की स्थिति रखैल की स्थिति से बेहतर नहीं है क्योंकि पुरुष विवाहित है या नहीं है उसकी कोई पहचान नहीं है और पहचान होने पर भी नारी की जो स्थिति है वह ''दिल के हाथों मजबूर'' की है और ऐसे में चंद्रमोहन चंद्रमोहन रहे या चाँद ,लाभ में रहता है और अनुराधा बाली फ़िज़ा बन लाश बन जाती है .
लड़कियां ही शादी के लिए खरीदी जाती हैं ,लड़कियां ही भ्रूण हत्या का शिकार बनती हैं , न कोई बड़ी उम्र की औरत शादी के लिए लड़का खरीदती है न कोई लड़का भ्रूण हत्या का शिकार होता है ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं जहाँ ये स्पष्ट होता है कि नारी को पुरुषों ने केवल अपने गुलाम का दर्जा ही दिया है इससे बढ़कर कुछ नहीं जबकि हमारे शास्त्रों में पुराणों में नारी हीन घर भूतों का डेरा ,कहा गया है ,नारी की स्थिति को ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता ''कहकर सम्मानजनक स्थान दिया गया है किन्तु पहले कभी मिलने वाला ये सम्मान आज कहीं नहीं दिखाई देता आज नारी का केवल एक उत्पाद ,एक गुलाम की तरह ही इस्तेमाल नज़र आता है .कहीं नारी का घूंघट से ढका चेहरा तो कहीं छत के कुंडे में लटकता शरीर नज़र आता है .

शालिनी कौशिक

[WOMAN ABOUT MAN]

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

एक दिल्ली तो संभलती नहीं कहते देश संभालेंगे भाजपाई

एक दिल्ली तो संभलती नहीं कहते देश संभालेंगे भाजपाई
Delhi state assembly election, 2013
India
2008 ←4 December 2013 

ALL 70 SEATS IN THE LEGISLATIVE ASSEMBLY OF DELHI
36 SEATS NEEDED FOR A MAJORITY
Opinion polls
 Sheila Dikshit (cropped).jpg ArvindKejriwal2.jpg
LEADERSheila DikshitHarsh VardhanArvind Kejriwal
PARTYCongressBJPAAP
LEADER'S SEATNew DelhiKrishna NagarNew Delhi
LAST ELECTION43 seats, 40.31%23 seats, 36.34%Not formed
CURRENT SEATS4323-
SEATS NEEDED-71336


Incumbent Chief Minister

ये है इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव की राजनीतिक स्थिति और जहाँ तक दिल्ली विधानसभा की बात है तो आज दूरदर्शन पर देखा और सुना कि भाजपा वहाँ कितनी मजबूत स्थिति में है वही भाजपा जो १९९३ में दिल्ली में विधानसभा बनने पर पहली बार में ही सत्ता संभालती है और मदन लाल खुराना के हाथों में मुख्यमंत्री की बागडोर सौंपती है और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी ओर से बिगुल बजाने वाली ये पार्टी अपना अतीत कितनी जल्दी भूल जाती है ये कोई आश्चर्य की बात नहीं ऐसा वह एक बार नहीं बार बार करती है .मध्य प्रदेश में सत्ता में आती है उमा भारती के दम पर और उनके कानूनी फेर में फंसने पर सत्ता उनसे छीनती है फिर देती नहीं अपने को ईमानदार दिखने के लिए और अब चुनावी फायदा देख उन्हें फिर जोड़ लेती है .दिल्ली में इनके मदन लाल खुराना ,हवाला में फंसे और सत्ता से बाहर हुए शायद हवाला ईमानदारी का काम था और उन्हें सत्ता में अपने को ईमानदार दिखाने पर अपने राजनीतिक भविषय पर खतरा मंडराता दिखा था इसलिए वे हट गए और उनकी जगह आ गए साहिब सिंह वर्मा फिर दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज ,५ साल का कार्यकाल भी भाजपा वहाँ टिककर नहीं कर पायी और देश को स्थिरता देने की बात करती है और इनकी सुषमा स्वराज ईमानदारी के झंडे गाड़ती फिरती हैं और शीतल पेयों को अपने छोटे से कार्यकाल में भारत के साथ भेदभाव की अनुमति देती हैं अर्थात एक ऐसी अनुमति जिससे भारत में रासायनिक तत्वों की अधिकता का विदेशी कम्पनी का फैसला सही मान लिया जाता है जबकि वही कम्पनी अमेरिका में कम मात्र रखती है और ये वही सुषमा स्वराज हैं जो सोनिया गांधी को जीतने से रोकने के लिए कभी चुनाव लड़ने को तैयार होती हैं उनके सामने तो कभी गंजी होने का फैसला करती हैं क्यूँ अपने हाथ में शक्ति होने पर नहीं देती ये सही मोड़ इन कम्पनी के गलत इरादों को नेस्तनाबूद करके और यदि नहीं कर सकती ऐसा तो क्यूँ भ्रष्टाचार के लिए मात्र कांग्रेस को दोषी ठहराती हैं जबकि इस मामले में ये भाजपा को उसके समकक्ष ही खड़ा कर देती हैं .
आज दिल्ली में चुनाव हैं और जो भी दल इसमें खड़ा है वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी कमर को कस कर दिखा रहा है जबकि अभी तो इसमें ''आप पार्टी ''ही साफ है क्योंकि उसका कोई राजनीतिक इतिहास नहीं है और ये साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि यदि उसके हाथ में भी सत्ता आएगी तो वह भी इसमें हाथ डुबोने के सिवाय कुछ नहीं करेगी क्योंकि सभी कहते हैं कि यहाँ आने का मतलब ही समुन्द्र में आना है और समुन्द्र में आकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया जाता अफ़सोस बस इतना है कि जनभावनाओं से खिलवाड़ का जो गन्दा खेल यहाँ खेला जाता है वह बर्दाश्त के बाहर है और भाजपा ने वही किया है सत्ता में रहने का अवसर उसे कम मिला है किन्तु जितना भी मिला है उतने में भी वह अपने को इस दलदल में डूबा हुआ ही दिखा पायी है और यही कहती नज़र आयी है -
''हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे .''.
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

न भाई ! शादी न लड्डू

  ''शादी करके फंस गया यार ,     अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उ...