सोमवार, 22 अप्रैल 2013

जिम्मेदारी से न भाग-जाग जनता जाग

 
दिल्ली के गांधीनगर में पांच वर्षीय गुडिया के साथ हुए दुष्कर्म ने एक बार फिर वहां की जनता को झकझोरा और जनता जुट गयी फिर से प्रदर्शनों की होड़ में .पुलिस ने एफ.आई.आर.दर्ज नहीं की ,२०००/-रूपए दे चुप बैठने को कहा और लगी पुलिस पर हमला करने -परिणाम एक और लड़की दुर्घटना की शिकार -ए.सी.पी. ने लड़की के ऐसा चांटा मारा कि उसके कान से खून बहने लगा .
        बुरी लगती है सरकार की प्रशासनिक विफलता ,घाव करती है पुलिस की निर्दयता किन्तु क्या हर घटना का जिम्मेदार सरकार को ,पुलिस को कानून को ठहराना उचित है ?क्या हम ऐसे अपराधों के घटित होने में अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं देखते ?
       १५ फरवरी सन १९९७कांधला   जिला मुजफ्फरनगर में एक दुकान में डाक्टरी कर रहे एक डाक्टर का सामान दुकान मालिक द्वारा नहर में डाल दिया गया ,सुबह जब वह अपने क्लिनिक में पहुंचा तो वहां कोई सामान न देख वह मामला समझ मार-पीट पर उतारू हो गया .दोनों तरफ से लोग जुटे और जुट गयी एक भीड़ जो तमाशबीन कही जाती है .वे डाक्टर को कुल्हाड़ी से ,लाठी से पीटते मारते रहे और जनता ये सब होते देखती रही .क्यों नहीं रोका किसी ने वह अपराध घटित होने से ?जबकि भीड़ अगर हस्तक्षेप करती तो एक निर्दोष की जान बच सकती थी और एक बाप व् उसके दो बेटे अपराधी बनने से बच सकते थे .

     २ अप्रैल २०१३ परीक्षा ड्यूटी से वापस लौटती चार शिक्षिका बहनों पर तेजाबी हमला किया गया .एक बहन ने एक आरोपी को पकड़ा भी किन्तु वह अकेली उसे रोक नहीं सकती थी वह छूटकर फरार हो गया और वे बहने खुद ही रिक्शा कर अस्पताल गयी जबकि यह वह समय था जब परीक्षा छूटने के कारण सड़क पर अच्छी खासी भीड़ भाड़ थी .क्यों नहीं मदद की किसी ने उन बहनों की ?जबकि अगर जनता आगे आती तो आरोपी इतनी भीड़ में से भाग नहीं सकते थे और जनता उन्हें वहीँ पकड़कर पीट पीटकर अधमरा कर पुलिस के हवाले कर सकती थी .
   क्यों हम हर अपराध का दोष सरकार ,पुलिस व कानून पर थोपने लगते हैं ? हम ही तो हैं जो हर जगह हैं ,हर अपराध होते देखते हैं और अनदेखा करते हैं ,हम ही तो हैं जो एक चोर के पकडे जाने पर उसे पीटने पर तुल जाते हैं ,फिर क्यों बसों में ,सडको पर हुई छेड़खानी पर चुप रहते हैं ? क्यों नहीं तोड़ते अपराधियों के हौसले ? जबकि हम जनता हैं ,हम सब कर सकते हैं ,जनता जब अपनी पर आ जाये तो देश आज़ाद कराती है,जनता जब अपनी ताकत आजमाए तो कठोर कानून पारित कराती है .जनता में वह ताकत है जो बड़े से बड़े निज़ाम को पलटकर रख देती है फिर क्या अपराध और क्या अपराधी? हम अगर चाहें तो ऐसी घटनाओं को नज़रन्दाज न करते हुए जागरूकता से काम लें किसी छेड़खानी को कम से कम अब तो हल्के में न लें और समाज में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए औरों को तो गलत काम से रोकें ही अपनों के द्वारा किये जाने वाले ऐसे कुत्सित प्रयासों को हतोत्साहित करें .बच्चे जो ऐसी घटनाओं का विरोध करने में अक्षम हैं उनके प्रति सर्वप्रथम उनके अभिभावकों का ही यह कर्तव्य है कि वे बच्चों को अनजानों के प्रति सतर्क करें और समझाएं कि वे किसी भी अनजानी जगह या अनजाने व्यक्ति की ओर आकर्षित न हों . .वे अपने बच्चों को वह समझ दें कि बच्चे अपने मन की हर बात उनसे कर सकें .हर दुःख दर्द उनसे बाँट सकें  न कि उनसे ही सहमे रहें क्योंकि कोई भी घटना एक बार में ही नहीं हो जाती. अगर बच्चे को माँ बाप से ऐसी समझ मिली होगी तो अपराध तैयारी नहीं तो कम से कम उसके प्रयास के समय पर अवश्य रोक दिया जायेगा .
     सरकार की, पुलिस की ,कानून की जिम्मेदारी बनती है .ये अगर चुस्त-दुरुस्त हों ,कड़े हों तो ऐसे अपराध करने से पहले अपराधी सौ बार सोचेगा किन्तु यदि जनता ही ऐसे मामलों में आक्रामक हो,जागरूक हो तो अपराधी ऐसे अपराध करने की एक बार तो क्या हज़ार बार भी नहीं सोचेगा .हमें जागने की की ज़रुरत है और अपनी जिम्मेदारी समझने की .कवि श्रेष्ठ दुष्यंत कुमार ने भी कहा है -
  ''हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए ,
     इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए ,
        सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,
             मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए .''

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

नारी का ये भी रूप -लघु कथा

नारी का ये भी रूप -लघु कथा 
Selfish : Golden word on woodSelfish : Studio shot of a beautiful young woman holding up a sign reading 'MINE ONLY'Selfish : greed money retro beautiful woman office vintage accountant
 दृश्य -१ 
''.....मम्मी -मम्मी  जल्दी करो  ब्रेकफास्ट देने में ,मेरे स्कूल की बस आने वाली है ,कहीं आज फिर से न छूट जाये .''   बेटा ! फ्रिज में ब्रैड रखी है और दूध भी ,तुम इतनी बड़ी हो कि खुद ले सकती हो ,मुझे बार बार परेशान मत किया करो ,आज मेरे क्लब में पार्टी है और मैंने फेसमास्क लगा रखा है इसलिए यहाँ से हिल भी नहीं सकती'',   अनीता ने अपनी दस वर्षीय बेटी हिना  को झिड़कते हुए कहा .

दृश्य-दो
''.......अनीता आज हमें अभी तो डाक्टर के यहाँ जाना है इसलिए अभी कुछ मत बनाना ,दिन के लिए खिचड़ी भिगो देना बस यही बन जाएगी ,...''भाड़ में जाये खाना ''मेरा तो आज व्रत  है आप अपना खुद देखना ,दूसरे शहर से आई जिठानी पर भड़कते हुए अनीता ने अपनी पड़ोसन को आवाज लगाई और अपने बच्चों को बुलाकर खाने खिलने को कहकर अपना पर्स लटकाकर बाहर चली गयी .


 दृश्य-तीन
''....बेटी रोज तो मैं घर का काम किसी तरह कर लेती हूँ पर आजकल जरा हाथ पैर काम नहीं करते, कुछ दिन घर का काम तो कर ले जब मेरी तबियत ठीक हो जाएगी तो मैं फिर से कर लूंगी .......आप को मैं खाली दिखती हूँ ,भैया के यहाँ आपका गुजारा नहीं था इसलिए ही मैंने आपको यहाँ ये सोचकर रख लिया कि चलो घर में कोई अपना रहेगा इससे घर की सुरक्षा भी हो जाएगी और घर का काम भी सही तरह से हो जायेगा .......पिता जी की पेंशन के पैसे तो आपको मिलते ही हैं एक कामवाली रख लेते हैं आधे आधे पैसे दे दिया करेंगे .क्यूं ठीक है न ?अपनी ७० वर्षीय माँ से पूछते हुए अनीता ने अपने सिर से काम का बोझ उतारते हुए कहा .


दृश्य-४
बड़े जेठ का निधन ......बड़ी जिठानी की पहले ही मृत्यु .....और दोनों बड़ी जिठानियों का वहां कोई दखल नहीं .....एकाएक अनीता का चेहरा दमक उठा .....चलो सांत्वना दे ही आऊं और दुखी परिवार को सहानभूति के जरिये अपने से जोड़ लूंगी इस तरह दूसरे जेठ का जो मकान हमने कब्जाया हुआ है उस में हमारा पक्ष और भी मजबूत हो जायेगा .सोचकर परिवार सहित वहां पहुंची अनीता बड़े जेठ के बच्चों की सबसे बड़ी हमदर्द बन गयी और सारा काम अपने हाथों में ले लिया .......अरे भाई ....शाम हो रही है .....चाय का टाइम हो रहा है....कोई चाय पिला सकता है क्या ?पत्नी के वहां होते हुए भी अनीता के पति ने सभी लोगों से प्रश्न किया किन्तु ये क्या अनीता उठ खड़ी हुई और चाय बनाने चली कि तभी उसकी सबसे छोटी बेटी हिना एकदम बोल उठी .....''आप बनाओगी चाय ''''हाँ'' '''और ये कहकर उसके मुहं पर जोर का थप्पड़ मारकर कुटिल हंसी मुहं पर लिए अनीता चाय बनाने चल दी .


 शालिनी कौशिक
   [कौशल]



गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

औरत की नज़र में हर मर्द है बेकार .


  Thai Massage
फरमाबरदार बनूँ औलाद या शौहर वफादार ,
औरत की नज़र में हर मर्द है बेकार .

करता अदा हर फ़र्ज़ हूँ मक़बूलियत  के साथ ,
माँ की करूँ सेवा टहल ,बेगम को दे पगार .


मनसबी रखी रहे बाहर मेरे घर से ,
चौखट पे कदम रखते ही इनकी करो मनुहार .


फैयाज़ी मेरे खून में ,फरहत है फैमिली ,
फरमाइशें पूरी करूँ ,ये फिर भी हैं बेजार .

हमको नवाज़ी ख़ुदा ने मकसूम शख्सियत ,
नादानी करें औरतें ,देती हमें दुत्कार .


माँ का करूँ तो बीवी को बर्दाश्त नहीं है ,
मिलती हैं लानतें अगर बेगम से करूँ प्यार .

बन्दर बना हूँ ''शालिनी ''इन बिल्लियों के बीच ,
फ़रजानगी फंसने में नहीं ,यूँ होता हूँ फरार .




     शालिनी कौशिक
           [WOMAN ABOUT MAN]
 

शब्दार्थ :फरमाबरदार -आज्ञाकारी ,बेजार-नाराज ,मक़बूलियत -कबूल किये जाने का भाव ,मनुहार-खुशामद,मनसबी-औह्देदारी ,फरहत-ख़ुशी ,फैयाजी-उदारता मकसूम -बंटा हुआ .फर्ज़ंगी -बुद्धिमानी .

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

कौन मजबूत? कौन कमजोर ?

 
इम्तिहान
एक दौर
चलता है जीवन भर !
सफलता
पाता है कोई
कभी थम जाये सफ़र !
कमजोर
का साथ
देना सीखा,
ज़रुरत
 मदद की
उसे ही रहती .
सदा साथ
नर का
देती रही ,
साया बन
संग उसके
खड़ी है रही ,

परीक्षा की घडी
आये पुरुष की
नारी बन सहायक
सफलता दिलाती ,
मगर नारी
चले मंजिल की ओर
पीछे उसके दूर दूर तक
वीराना रहे ,
और अकेली
वह इम्तिहान में
सफलता पाती !
फिर कौन मजबूत?
कौन कमजोर ?
दुनिया क्यों समझ न पाती ?




    शालिनी कौशिक 

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

दादा साहेब फाल्के और भारत रत्न :राजनीतिक हस्तक्षेप बंद हो .


'' कुछ  छंद उन्हें अर्पित मेरे जिनके पाँव में छाले हैं ,
 जो घोर अराजकता में भी मानवता के रखवाले हैं .''
 

''प्राण के लिए प्रणव से प्रोटोकॉल तोड़ने की अपील  ''समाचार केवल अभिनेता मनोज कुमार की मार्मिक अपील ही नहीं है अपितु एक तमाचा है हमारे लोकतंत्र पर ,जहाँ ''जनता की ,जनता के द्वारा,जनता के लिए सरकार शासन करती है .जहाँ जनता की ही अनदेखी है ,जनता के ही साथ अन्याय है .हिरण्यगर्भा ,रत्नों की खान हमारा देश रत्नों का सम्मान करना जानता ही नहीं है .प्राण जैसे अभिनेता को जीते जी दादा साहेब फाल्के घोषित कर दिया गया किन्तु ये बहुत देर से किया गया है

प्राण साहब को यह अवार्ड मिलने में देरी हुई'

Bollywood congratulates Pran on Phalke award, feels honour too late
Updated on: Sat, 13 Apr 2013 04:16 PM (IST)
         
मुंबई। बॉलीवुड में गुजरे जमाने के दमदार विलेन प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की घोषणा का पूरे बॉलीवुड ने स्वागत किया है। हालांकि कुछ ने यह भी कहा है कि यह सम्मान उन्हें काफी देर से मिल रहा है। ऋषि कपूर ने उन्हें इस सम्मान को मिलने पर खुशी ... और पढ़ें » 
और क्या ये न्याय है कि पहले एक रत्न स्वरुप शख्सियत को बदतर स्थिति में पहुंचा दिया जाये और फिर जब वह अपने कार्यों के सम्मान की ख़ुशी महसूस करने की स्थिति में ही न रहे तब उसे ये सम्मान दे अपने उत्तरदायित्व की इति श्री कर ली जाये ?
   प्राण से पूर्व राजकपूर जी को भी जब ये पुरुस्कार दिया गया तब भी उन्हें ये पुरुस्कार देने राष्ट्रपति महोदय को मंच से नीचे आना पड़ा था ,बस इतनी ही राहत थी कि वे स्वयं वहां पुरुस्कार लेने पहुँच गए थे .
  एक देश जहाँ अपनी सरकार है वहां इस तरह की लापरवाही आम जानता के ही साथ की जाती है तो सवाल तो उठने लाज़मी हैं और ऐसे में यही कहा जायेगा कि यहाँ भेदभाव की राजनीति है .
  देश का सबसे बड़ा नागरिक पुरुस्कार जितनी तत्परता से ''नेहरु गाँधी परिवार ''को दिया जाता है वैसी शीघ्रता कहीं और दृष्टिगोचर नहीं होती .भारतीय राजनीति में इस परिवार से जितने भी प्रधानमंत्री हुए सभी को यह सम्मान दे दिया गया है अगर यह सम्मान सभी प्रधानमंत्री प्राप्त कर चुके होते तो कोई बात नहीं थी किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि बहुत से प्रधानमंत्री इसकी चयन समिति के बनाये मानक शायद पूरे नहीं करते या फिर वे इनकी ''गुड बुक ''में नहीं हैं .
   भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी एक ओर जहाँ देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक हैं   और अपने कार्यकाल की उपलब्धियों -पोखरण परमाणु परीक्षण ,कारगिल युद्ध में विजय ,इस्राइल से सम्बन्ध बढ़ाने आदि के कारण इस पुरुस्कार के सर्वश्रेष्ठ पात्रों में हैं .यही नहीं किसानों की आवाज को देश के सिंघासन से जोड़ने वाले चौधरी चरण सिंह जी की भी इस पुरुस्कार के लिए दावेदारी को ख़ारिज करना भी किसी हुक्मरान के वश में नहीं है ऐसे ही बहुत से ऐसे नाम हैं जिनके नामों पर न तो आज तक विचार किया गया न ही उन्हें ये पुरुस्कार देने में असमर्थता का कोई कारण ही बताया गया .
दादा साहेब फाल्के अवार्ड सूची       भारत रत्न अवार्ड सूची   
भारत रत्न व् दादा साहेब फाल्के ,ये दोनों ही सम्मान हमारे यहाँ राजनीतिक इच्छा शक्ति के अधीन हैं और इसका खामियाजा हमारे बहुत से इन पुरुस्कारों के योग्य पात्रों को भुगतना पड़ता है अभी हाल ही में पूर्व न्यायाधीश मारकंडे काटजू ने उर्दू में एक शायर के रूप में किवंदिती बन चुके ग़ालिब का नाम इस पुरुस्कार के लिए प्रस्तावित किया है ऐसे ही हम कह सकते हैं कि अटल जी ,इंद्र कुमार गुजराल जी ,चरण सिंह जी ,और भी  जाने कितने नाम इस पुरुस्कार के पात्रों के रूप में हमें दिखते हैं किन्तु हमारे इन सत्ताधारियों को नहीं दिखते जिन्होंने २००८ के बाद से रविशंकर जी को देने के बाद से इस पर रोक सी ही लगा रखी है .अभी हुए कुछ हंगामे के बाद खिलाडियों के लिए भी इसमें स्थान किया गया नहीं तो विश्व में भारत का नाम रोशन करने वाले इन उदीयमान सितारों के लिए इसमें कोई स्थान नहीं रखा गया था फिर नेताओं के लिए ही क्यों रखा गया जबकि इनसे तो देश का नाम तक किसी को पता नहीं चलता .इसका प्रमाण यह है कि जब जोर्ज बुश से भारत के पी.एम्.का नाम पूछा गया तो उन्हें अटल जी का नाम पता ही नहीं था फिर इन्हें यहाँ स्थान क्यों दिया गया और इन पुरुस्कारों का कौन पात्र है कौननहीं इसके लिए  देश से सुझाव आमंत्रित किये जाने चाहिए न कि राजनीतिक इच्छा शक्ति के आगे सिर झुकाना चाहिए .
राजनीतिक इच्छाशक्ति के अधीन होने के कारण ही जो योग्यता सत्ताधारी दल की पसंद होती है वह पुरुस्कार प्राप्त कर लेती है और अन्य अंधेरों में ही भटकती रह जाती हैं .वे तो यही कहती होंगी-
''डिग्री ,मेहनत और योग्यता रखी रही बेकार गयी ,
उनकी हर तिकड़म रंग लायी ,हम शराफत मार गयी .''
जब प्राण जी भारतीय फिल्मो के शुरूआती दौर से जुड़े हुए हैं तो २००४ से उनके नाम पर विचार करते रहने के बावजूद २ ० १ ३ में ये घोषणा शायद उनकी तबियत को देखते हुए ही की गयी है ताकि एक भलाई के काम को अपने खाते में जोड़कर वाहवाही हासिल की जाये बस खैर ये है कि उनके जीवित रहते हुए ये मौजूदा सरकार ने बहती गंगा में हाथ धो लिए किन्तु क्या यह सरकार आगे अपनी कार्यप्रणाली  में सुधार लाएगी और उनके लिए प्रोटोकॉल तोड़ने की अपील करने वाले मनोज कुमार जी के लिए इस पुरुस्कार हेतु समय से विचार करेगी .मनोज जी तो मात्र एक उदाहरण  हैं हमारी फिल्म इंडस्ट्री ऐसे हीरों से भरी पड़ी है .राजेश खन्ना अब हमारे बीच में नहीं हैं वास्तव में वे नाना बन गए किन्तु इस फिल्म पुरस्कार के योग्य अभी बनने के लिए उन्हें और उम्र चाहिए थी किन्तु नहीं मिली ,कोई बात नहीं मृत्योपरांत अपने मकसद हल करने के लिए इस पुरस्कार की भी व्यवस्था है भले ही कलाकार को वास्तविक सम्मान मिले न मिले ,अमिताभ बच्चन फिल्म जगत में एक विराट व्यक्तित्व रखते हैं किन्तु कब इस पुरस्कार के योग्य होंगे ,पता नहीं और भी बहुत से नाम हैं किन्तु राजनीतिक हस्तक्षेप किसे इसके योग्य बनाएगा नहीं पता .
   ऐसे ही भारत रत्न में विषमता है यूँ तो गाँधी नेहरु परिवार का इस देश के लिए किया गया त्याग उन्हें यहाँ के नागरिकों के मन में सम्मानजनक स्थान दिलाता है किन्तु यह किसी पुरुस्कार की कसौटी नहीं होता और इस परिवार को इस पुरुस्कार में शत-प्रतिशत स्थान मिला हुआ है और दुखद बात तो यह है कि चयन समिति इनके आभा मंडल से इस कदर बंधी है कि जवाहर जी के साथी रहे सरदार पटेल को उनके धेवते राजीव गाँधी के साथ इस पुरस्कार के योग्य माना गया जबकि अपने देश सेवा के लिए किया गए कार्यों के लिए वे जवाहर जी से भी पूर्व उन्हें पाने की योग्यता रखते थे ऐसे ही देश के लिए अपना जीवन अर्पण करने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को तो इनसे भी बाद में यद् किया गया १९९२ में और योग्यता की अनदेखी कोई बर्दाश्त कर लेता है कोई नहीं और ऐसा ही यहाँ हुआ और नेताजी के  परिजनों ने ये पुरस्कार लौटा दिया .राजनीतिक मह्तावाकंक्षा यदि इसी तरह योग्यता को अंधेरों में धकेलती रही तो या तो यह देश जनता के आक्रोश का शिकार होगा या फिर योग्यता के गुम होने का ,इसलिए अब समय आ गया है कि इस व्यवस्था में परिवर्तन किया जाये और ऐसे पुरुस्कारों को राजनीति से दूर किया जाये और जनता के निर्णय के करीब.सत्यपाल [सत्यम ]जी के शब्दों में -
   ''अंजाम बदल जायेगा गर तुम आगाज़ बदल दो ,
     जो दर्द नहीं सुनता ऐसा हर राज बदल दो .''
         शालिनी कौशिक
                   [कौशल ]






शनिवार, 13 अप्रैल 2013

रिश्तों पर कलंक :पुरुष का पलड़ा यहाँ भी भारी

 रिश्तों पर कलंक :पुरुष का पलड़ा यहाँ भी भारी

 ''रिश्तों की ज़माने ने क्या रीत बनायी है ,
   दुश्मन है मेरी जां का लेकिन मेरा भाई है .''
पुरुष :हमेशा से यही तो शब्द है जो समाज में छाया है ,देश में छाया है और अधिक क्या कहूं पूरे संसार पर छाया है .बड़े बड़े दावे,प्रतिदावे ,गर्वोक्ति पुरुष के द्वारा की जाती है स्वयं को विश्व निर्माता और नारी को उसमे दोयम दर्ज दिया जाता है .और पुरुष के इस दावे को हाल ही की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं ने पूर्णतया साबित भी कर दिया है .हर जगह हर काम में स्वयं की श्रेष्ठता का गान गाने वाला पुरुष अपने बारे में बिलकुल सही कहता है और सही है ''हर जगह अव्वल है ''.
      २ अप्रैल २०१२ की शाम को कांधला [शामली ]में चार शिक्षिका बहनों पर तेजाबी हमला सुर्ख़ियों में था .हर ओर से इस मामले के खुलासे की मांग की जा रही थी जहाँ परिजन किसी रंजिश से इंकार कर रहे थे वहीँ पुलिस और आम जनता सभी के दिमाग में यह चल रहा था कि आखिर ऐसे ही कोई लड़कियों पर तेजाब क्यों फैंकेगा और आखिर खुलासा हो गया और ऐसा खुलासा जिसने न केवल कांधला कस्बे को शर्मसार किया बल्कि रिश्तों के नाम पर जिस सुरक्षा की एक नौ बेटियों की माँ  ख्वाब संजोये थी उस सुरक्षा को भी अपने नापाक इरादों से खाक कर डाला-
 ''हमने जिस मंजिल पे खोया एतबारे दोस्ती ,
    उसमे अक्सर लोग जाने पहचाने लगे .
हालत में कुछ ऐसा तगय्युर भी न था ,
    लेकिन वह हुआ जिसका तसव्वुर भी न था .''

   शिक्षिकाओं का बहनोई ही इस घटना का सूत्रधार निकला और जो कि स्वयं भी कांधला कस्बे का निवासी है .स्थानीय निवासी और रिश्ते में जीजा होकर बाबर ने जिस घृणित कृत्य को अंजाम दिया है उससे यह स्पष्ट है कि पुरुष कहीं भी नारी से स्वयं को पीछे नहीं देख सकता और अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है और यह बात स्वयं स्वीकारी है शामली जिले के एस. पी .अब्दुल हमीद जी ने ,जिन्होंने मामले का खुलासा करते हुए कहा -''बाबर ने अपनी साली ईशा को हतोत्साहित करने के लिए ही साथी जावेद के साथ मिलकर तेजाब फैंकने की योजना बनायीं थी .''
      दूसरा मामला जो अभी हाल में काफी निंदा का विषय रहा और जिसमे बाप-बेटे के रिश्ते ही दांव पर लग गए उसका सूत्रधार भी पुरुष ही है .अरबपति बसपा नेता दीपक भरद्वाज की हत्या जो कि उनके छोटे बेटे नितेश भरद्वाज ने ही करायी ,उसी बेटे ने जिसके लिए बड़े बड़े यज्ञ हवन किये जाते हैं ,मन्नतें मांगी जाती हैं ,जश्न मनाये जाते हैं ,पितृ ऋण से मुक्ति की संकल्पना की जाती है वही बेटा ,सृष्टि नियंता पुरुष ही ऐसी घटना को जब अंजाम देता है तब आकाश में बैठे देवी देवता भी मानव की किस्मत को सराहते होंगे और कहते होंगे-
    ''सब लुट गए अरमान मेरी जान में आके,
लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बनाके ,
मिलते ही मुझे जिंदगी बीमार हो गयी ,
चरागरों की हर दवा बेकार हो गयी ,
जीने की तमन्ना जगी शमशान में आके .''

  यही नहीं भारतीय पुरुष आज सारे विश्व में अपने रिश्ते निभाने की काबिलियत के झंडे गाड रहे हैं .मध्य इटली के लोहा गाँव में ३९ वर्षीय कुमार राज ने पत्नी फ्रांसेस्का दी ग्रेजिया और १९ वर्षीय बेटी मार्टिना की चाकू से गोदकर हत्या कर दी और ऐसा तब जबकि यह शादी उसने वहां की नागरिकता पाने को २००८ में समझौते के तहत की थी .
    पर ऐसा नहीं है कि सिर्फ पुरुष ही इतने वीर हों ,वीरांगनाएँ भी हैं हरियां के पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया की बेटी सोनिया ऐसी ही बहादुर नारी हैं जिनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा अपने पिता सहित परिवार के ८ सदस्यों को जहर देकर मौत के घाट उतारने की वीरगाथा उन्होंने लिखी है किन्तु हाय अफ़सोस नारी ये काम भी अकेले न कर सकी और यहाँ भी पुरुष से पिछड़ गयी क्योंकि इस काम में उसने अपने पति संजीव का सहयोग लिया और उसके साथ मिलकर इस पुण्य कृत्य को अंजाम दिया .बेटी ने बाप व् परिवार के साथ जो भी किया यह हमेशा चर्चा का विषय रहेगा किन्तु सबसे ज्यादा प्रशंसा इसी बात की होगी कि नारी के मुकाबले रिश्ते निभाने में भी पुरुष का पलड़ा भारी है ,भले ही जीजा साली का रिश्ता हो ,बाप बेटे का रिश्ता हो पति पत्नी का रिश्ता हो या बाप बेटी का .इसलिए कहना होगा कि पुरुष की जय जयकार और शायद इसलिए नौशाद जी भी कह गए हैं -
   ''ऐतबार अब किसी पर होता नहीं ,
रात भर कोई बस्ती में सोता नहीं ,
काम रहजन का तो रहजनी है मगर ,
अब मुहाफिज का भी कोई भरोसा नहीं ,
उसको मिलता अगर रंगे इंसानियत ,
हाथ मेरे लहू से भिगोता नहीं .''
   शालिनी कौशिक
     [कौशल]




मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

नरेन्द्र से नारीन्द्र तक

नरेन्द्र से नारीन्द्र  तक
     
''गाँधी का यह देश नहीं ,बस हत्यारों की मंडी है ,
राजनीति की चौपड़ में ,हर कर्ण यहाँ पाखंडी है .''
चन्द्र सेन जैन की यह अभिव्यक्ति की तो समस्त राष्ट्र के नेताओं के लिए गई है किन्तु क्या किया जाये उस पाखंड का जो गाँधी के गुजरात के मुख्यमंत्री में ही दिखाई दे रहा हो .सोशल वेबसाईट  व् माडिया के जरिये वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने अनुरूप वातावरण बनाने में लगे हैं .जिस तरह बढ़ा चढ़ा कर उनके भाषणों की,गुजरात के विकास की तारीफ की जाती है ऐसा कुछ न तो उन्हें दूरदर्शन पर देखते सुनते लगता है [जबकि दूर के ढोल तो सुहावने कहे जाते हैं ]और न ही गुजरात के विकास के सम्बन्ध में अन्य गैर राजनीतिज्ञों के बयान सुनकर लगता है .जब तक लालू प्रसाद यादव रेलवे के मंत्री रहे ऐसे ही महिमा मंडन तब रेलवे की सफलता के होते थे ममता जी के आने पर ही सारी पोल खुली .
        महिलाओं को लेकर मोदी जी की जागरूकता काबिले तारीफ है .अच्छा लगता है कि उन्होंने महिलाओं की ताकत को पहचाना किन्तु महिलाएं उनके इर्द-गिर्द खड़े होते वक्त  शायद यही भूल गयी कि उन्हें दिख रहा शख्स बिल्कुल वैसे ही है जैसे ''डॉन ''फिल्म में अमिताभ -
''तुमने जो देखा है ,सोचा है समझा है ,जाना है ,मैं वो नहीं .....''
  हालाँकि कितने ही यहाँ इस पंक्ति पर आपति करेंगे क्योंकि जनता में उनके इतने प्रशंसक हो  न हो किन्तु यहाँ बहुत हैं किन्तु मेरा तो किसी अज्ञात शायर की इन पंक्तियों वाला ही हाल है -
   ''मैं कभी हक़ बयानी से डरती नहीं ,
  आइये और मेरा सर कलम कीजिये .
  सिर्फ दुनिया के गम से न होगा भला ,
  ए सवा आखिरत का भी गम कीजिये .''
वर्तमान पर नज़र रखते हुए मैं व्यक्ति के भूत को नज़रंदाज़ नहीं करती क्योंकि मेरा खुद का अनुभव है कि परिस्थितियां विपरीत होने पर या व्यक्ति का मतलब होने पर व्यक्ति भले ही परिवर्तित दिखाई दे किन्तु जब परिस्थितियां उसके माफिक हों या उसका मतलब ह्ल हो जाये तो पुरानी शक्ल दिखाई दे जाती है .हर कोई वाल्मीकि नहीं होता ऐसे तो बिरले लोग ही होते हैं और जो कि मोदी जी नहीं हैं .
   आज मोदी कहते हैं कि ''निर्णय में महिलाओं की भागीदारी से बदलेगी महिलाओं की तकदीर ''और उनके इर्द-गिर्द बैठी फिक्की की समझदार महिलाएं ताली बजाती हैं और गर्व से भर जाती हैं जरा एक बार किसी पारिवारिक समारोह में  यदि वे विवाहित हैं तो पति के बगैर जाकर देख लें ,अपनी स्थिति का पता चल जायेगा और तब सोचें यशोदा बेन के बारे में,
   “I will not say anything against my husband. He is very powerful. This job is all I have to survive. I am afraid of the consequences” (Photo: SHOME BASU)
 जिनसे शादी कर मोदी उन्हें गाँव में ही छोड़ आये और स्वयं  को  भगत  सिंह  की श्रेणी में रखते हुए कहते हैं कि देश सेवा के लिए ऐसा किया जबकि भगत सिंह ने तो शादी से इंकार करते हुए यह कहा था कि मेरी शादी तो हो चुकी है देश भक्ति से ,मोदी ऐसा करते तो आदर्श होते फिर चाहे यशोदा बेन भगत सिंह की होने वाली पत्नी का पथ अपनाती या कुछ और.एक भारतीय नारी की तरह वे उन्हें कुछ नहीं कहती पर उनके मन का दुःख एक नारी होकर क्या वे नहीं समझ सकती ?
     गुजरात के माथे पर लगा कुपोषण का कलंक धोने को भी मोदी जी को महिलाओं का ही सहारा मिला और तब बहुत तेज़ से चमका होगा महिलाओं का मुख जब मोदी जी कहते हैं कि ''गुजरात में कुपोषण नहीं है ये तो महिलाओं को पतले रहने की आदत है जिसके कारण वे डाइटिंग करती हैं ''.
    आज प्रधानमंत्री बनने के लिए मोदी जी महिलाओं को लुभाने पर आ गए हैं .आधी आबादी की ताकत वे जानते हैं क्योंकि राजनीतिक ,कूटनीतिक दिमाग वे रखते हैं किन्तु नारी की ताकत को भली भांति नहीं जानते तभी ऐसी अनुचित बाते पूर्व में कह गए और कमल है उन महिलाओं का जो उनके आगे ऐसे में भी झुक गयी जबकि अगर भारतीय नारी की वे ताकत को जाने तो उन्हें सही रूप में माँ को जानना होगा जिसका वे केवल गुणगान करते हैं पूजा नहीं करते क्योंकि अगर वे ऐसा करते तो ये भी जानते जो यहाँ कहा गया है और जो कि एक नारी की चुनौती है उन्हें -
 ''घर गिराने ही को जो फतह समझ बैठा है ,
उससे कहना मेरा मैयार गिराके देख .
मुझको तारीख का एक खेल समझने वाला ,
मेरे क़दमों के निशा मिटाके देख .''

      और रही महिलाओं के लिए बड़े जोर-शोर से गुजरात में ५०% आरक्षण की  कोशिश का श्रेय लेकर वहां की महिला राज्यपाल पर कटाक्ष करना तो ये तो उच्चतम न्यायालय  भी सही नहीं मानता कि आरक्षण ५०% से ऊपर हो तो राज्यपाल वहां पर आरक्षण की स्थिति को देखकर ही ऐसा कर रही होंगी या हो सकती है कोई राजनीतिक मजबूरी किन्तु मोदी जी की तो कोई मजबूरी नहीं होगी फिर वे क्यों वे अपनी पार्टी में महिलाओं को आरक्षण नहीं दे देते उनपर तो कोई रोक नहीं है .क्यों वे अपनी पार्टी की प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य महिला उम्मीदवार श्रीमती सुषमा स्वराज जी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित नहीं  करते जबकि स्वयं महिलाओं की भागीदारी को महत्व दे रहे हैं .और ये तो इनके हाथ में है यहाँ तो किसी की रोक नहीं है .
   मोदी जी का बात बात में गुजरात गान तो उनके वहां से हटने पर खुल ही जायेगा अब जब वे यहाँ आने के स्वप्न सजा ही रहे हैं तो यहाँ बताएं कि यहाँ क्या करेंगे क्योंकि केंद्र का विकास मात्र मंदिर निर्माण या गुजरात निर्माण से नहीं होता इसमें समग्र राज्यों को लेक्लर चलना होता है और इसमें सामूहिक प्रयास किये जाते हैं और वे भी सबके विश्वास पर और सभी को जोड़कर .उन्हें अब पुरुषोत्तम दास की ये पंक्तियाँ ध्यान में रखनी ही चाहियें -
    ''तुम दिवस में ,स्वप्न में ,उन्मुक्त हो नभ में उड़े हो ,
    अब धरा पर लौटकर आधार की बातें करो .''
         शालिनी कौशिक
        [कौशल]





रविवार, 7 अप्रैल 2013

चले डूबने कॉंग्रेसी

सत्ता वह मद है जिसके नशे में नेता का बहकना लाज़मी है .यह नशा जब चढ़ता है तो बड़े से बड़े विपक्षी धुरंधर भी फ़ना कर दिए जाते हैं किन्तु जब उतरता है तो नेता व्यथित हो जाते हैं और अनाप-शनाप बकने की स्थिति में आ जाते हैं .आज कॉग्रेसी नेताओं की यही स्थिति होती जा रही है .२००४ से अब तक जो नशा इन्हें मदोन्मत्त किये था वह फ़िलहाल विरोधियों के सियासी तीरों के समक्ष नष्ट होता दिखाई दे रहा है और जैसा कि सभी जानते है कि -
  ''विनाश काले विपरीत बुद्धि ''
तो इसका साफ असर दिखाई दे रहा है .मनीष तिवारी जी जो वर्तमान में केन्द्रीय सूचना व् प्रसारण मंत्री हैं और राशिद अल्वी जी जो कॉंग्रेस प्रवक्ता हैं दोनों ही कॉंग्रेस हाईकमान की शैली से विपरीत दिशा में जाते नज़र आ रहे हैं .सोनिया गाँधी जी ने २ ० ० ७ में मोदी जी को ''मौत का सौदागर '' कहा और इस गलत नीति का दुष्प्रभाव उन्हें जनता ने तभी वहां के चुनाव में हार के रूप में दिया क्योंकि गलत नीति यहाँ कभी भी मानी नहीं की जा सकती और शायद इसी कारण सोनिया जी ने भी आगे अपने को इस तरह के गलत व्यक्तिगत कटाक्ष से दूर रखा और राहुल गाँधी जी भी इस नीति पर चलते नज़र आते हैं क्योंकि वे भी अपनी बातें कहते हैं विरोधी नेताओं के नाम ले उनका अपमान करते नज़र नहीं आते .किन्तु मनीष तिवारी और राशिद अल्वी इस नीति के खिलाफ जा रहे हैं .
Congress compares Narendra Modi with Yamraj
Narendra Modi
 ये सत्य है कि २००२ के गोधरा दंगों को लेकर मोदी जी की भूमिका संदेह के घेरे में है किन्तु जब तक अपने पास पुख्ता सबूत न हों और पुख्ता सबूत हों किन्तु  उन्हें सार्वजानिक रूप से प्रस्तुत करने की हिम्मत न हो तो बार बार उन्हें अपमानित करने के लिए उन दंगों का जिक्र किया जाना कॉंग्रेस  के स्थिति ''खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे ''वाली ही कर रही है क्योंकि ऐसे में ऐसे आक्षेपों का दौर कभी थमने वाला नहीं है और विपक्षियों के  पास भी बहुत से ऐसे मामले हैं जिन्हें लेकर वे बबाल मचा सकते हैं भले ही सबूतों और हिम्मत के नाम पर वे बिल्कुल खाली हाथ हो .
  और दूसरे राशिद अल्वी जी का मोदी जी को ''यमराज''कहा जाना यमराज जी को भी सर पीटने को विवश करता है क्योंकि यमराज जी मृत्यु के देवता हैं और गलतियाँ उन जैसे देवता के खाते में नहीं होती हाँ उनके कुछ दूत ज़रूर गलतियाँ करते हैं और किसी की जगह किसी और को अर्थात जिसकी मृत्यु है उसकी जगह किसी और को ले जाने की गलतियाँ उनके दूत कर सकते हैं वे नहीं.   और यह श्रेणी  यहाँ किसी भी नेता को नहीं मिल सकती क्योंकि इन्सान तो गलतियों व् अपराधों का पुलिंदा होता है और उनके खाते में गलती का कोई स्थान नहीं होता और वे यहाँ किसी विशेष प्राणी जो बहुत ऊँचा दर्ज रखता है उसकी मृत्यु के लिए ही आते हैं जब उसका समय पूरा हो जाता है .

Cong ridicules Modi, says he is Yamraj on Buffalo


New Delhi: "If Rahul was hinting at Modi (during interaction with industry leaders), it would not be a horse but a bull," Congress spokesperson Rashid Alvi told reporters while comparing Modi to Yamraj (the harbinger of death in Hindu mythology who ... 
   

     अब इस तरह की टिपण्णी कर तो वे स्वयं ही अपनी सरकार का अंत स्वीकार कर रहे हैं हाँ एक बात ज़रूर है कि वे स्वयं के लिए यहाँ भी विशेष दर्जा रख रहे हैं क्योंकि वे यमराज का जिक्र कर रहे हैं उनके दूत का नहीं और ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि जब मौत समक्ष दिखाई देती है तो मुहं से केवल जैसे सच ही निकलता है और मरता आदमी जैसे कभी झूठ नहीं बोलता ऐसे ही इन माननीय महोदय की ये बात और हरकतें इन्हें निराशा के भंवर में घिरा हुआ ही दिखा रही हैं और इनके यही तेवर दिखा रही हैं कि
    ''हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे .''

           शालिनी कौशिक
              [कौशल ]


गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

आ गयी मोदी को वोट देने की सुनहरी घड़ी

आ गयी मोदी को वोट देने की सुनहरी घड़ी
 <strong>Narendra</strong> <strong>Modi</strong> emerges stronger in Team Rajnath Bharatiya Janata Party Samajwadi Party  

सर सैय्यद अहमद खां ने कहा था -
''हिन्दू और मुसलमान भारत की दो आँख हैं .''
ये कथन मात्र कोई कथन नहीं सच्चाई से ओत -प्रोत एक भाव है .देश ने १ ९ ४ ७ में स्वतंत्रता प्राप्त की किन्तु उसके बाद से हिन्दू मुस्लिम का भारत पाक बटवारें के कारण हुए  विचारधारा में परिवर्तन ने और इसी कारण धीरे धीरे बढ़ते वैमनस्य ने आग में घी का काम किया ६ दिसम्बर १ ९ ९ २  को बाबरी मस्जिद विध्वंस ने .दोनों आँखें जब एक साथ काम करती हैं तभी मनुष्य सही काम करता है यदि दोनों आँखें विपरीत दिशा में काम करने लग जाएँ तो काम चौपट हो जाता है जैसा हमारे भारत वर्ष का फ़िलहाल हुआ है.हिन्दू मुस्लिम एकता ,जिसकी हमारे देश में मिसाल दी जाती थी ''बाँटो और राज करो ''की नीति ने तोड़ दी और रही सही कसर भारतीय जनता पार्टी के कथित हिन्दू प्रेम और समाजवादी पार्टी की मुस्लिमों पर कुर्बान होने की नीति ने खात्मे की और ही बढ़ा दी यह विनाश करने वाली गाड़ी अपनी तेज़ गति से निरंतर बढती ही जा रही थी कि एकाएक हमारे इन पार्टी के बुद्धिजीवी व् देशभक्त नेताओं में देश भक्ति जागी और ये देश को फिर से प्रेम-पथ पर लाने के लिए अपने उत्तरदायित्व निभाने के लिए तैयार हो गए .और अब यह गाड़ी अर्थात हिन्दू मुस्लिम प्रेम की गाड़ी फिर से प्रेम पथ पर चलने को तैयार है .
     भाजपा को मुसलमानों  के प्रति अपना नजरिया बदलने का सुझाव दे मुलायम सिंह जी पहले ही भाजपा की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा चुके थे और अब चित्रकूट में भाजपा के विचार मंथन में भी यह निष्कर्ष निकला कि भाजपा राज के लिए अल्पसंख्यको को माइनस नहीं किया जा सकता ऐसे में उन्हें भी भाजपा को साथ लेकर चलना चाहिए .साफ है कि अब  हिन्दू मुस्लिम वर्गों का नेतृत्व करने वाली ये पार्टियाँ ही जब एकता की ओर बढ़ रही हैं तो ये वर्ग भी तो एक ही होंगे और फिर राम मंदिर भाजपा का संकल्प है जो कि तभी पूर्ण हो सकता है जब केंद्र व् यू.पी. सरकार में समन्वय हो और इस तरह मुसलमानों को साथ लेकर जब भाजपा इस राह पर आगे बढ़ेगी तो मुलायम सिंह जी का स्वाभाविक रूप से साथ मिलेगा और यू.पी. में सपा की सरकार है इसलिए यह साथ ज़रूरी भी है .
       फिर एक बात तो सभी जानते हैं कि जब कोई खुद से प्रेम करता है तभी वह किसी और से प्रेम कर सकता है ,जब कोई खुद की परवाह करता है तभी वह दूसरों की परवाह कर सकता है ऐसे में धर्मपरायण हमारे इस देश में भाजपा व् सपा जो कि अपने देश के धर्मों से प्रेम करती हैं  उनसे ही सार्थक व् कुशल प्रशासन की उम्मीद की जा सकती है  न कि कॉंग्रेस से जिसे कि धर्मनिरपेक्षता का रोग है ,जब उसे देश के धर्मों से ही प्यार नहीं तो देश की जनता से क्या प्यार होगा जो कि बहुत बड़ी संख्या में अपने धर्म पर कुर्बान होने को तैयार बैठी है .ऐसे में हम भी अब उस परिंदे के समान हो सकेंगे जो कि कभी भी कहीं पर बैठ  सकते हैं और अपने देश में उसी तरह के धार्मिक सद्भाव की महक महसूस कर सकेंगे जिस तरह की हमारे बड़े महसूस करते थे बिलकुल इसी शेर की तरह-
''मैंने काबे से कहा कि इस घर का मालिक कौन है ,
    उसने धीरे से पूछा कि कौन इस घर का नहीं .''
  और इसलिए अब समय आ गया है कि हम उन्ही मोदी जी को ,जो हाल -फ़िलहाल में ही गुजरात में हिन्दू मुस्लिम समुदायों का  बड़ा  विश्वास और प्रेम जीतकर केंद्र की ओर हम गुलामी की ओर बढ़ रहे भारतवासियों को स्वतंत्रता की खुली हवा में साँस दिलाने के लिए केंद्र की ओर बढ़ रहे हैं हाँ वही मोदी जी जिनका  अभी 1st अप्रैल के समाचार पत्रों के अनुसार टीम राजनाथ में दबदबा दिखाई दिया है उन्ही राजनाथ जी ने उन्हें ६ वर्षों बाद अपनी टीम में शामिल किया है और गले लगाया है जिन्होंने ६ साल पहले यह कहते हुए '' कि अन्य मुख्यमंत्री भी भाजपा संसदीय बोर्ड के सदस्य नहीं हैं''संसदीय बोर्ड से बाहर कर दिया था और दिलचस्प तथ्य यह है कि मोदी अब भी मुख्यमंत्री ही हैं .,को वोट देने की ठानकर प्रधानमंत्री पद की शोभा और गरिमा में चार चाँद लगा सकते हैं और कह सकते हैं-
''तेरा जलवा ओजन हम भी देखेंगे ,
पड़ेंगे जब आपकी जुल्फों में ख़म हम भी देखेंगे ,
चलाके तीर नज़रों से मेरे दिलबर ने ये कहा ,
लगायेंगे जब ज़ख्मों पे मरहम हम भी देखेंगे .''

       शालिनी कौशिक
           [कौशल]

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,

शामली में चार बहनों पर तेजाब उड़ेला
 शामली में कांधला कस्बे में पहली  बार  हुई यह दर्दनाक घटना महिलाओं की सुरक्षा पर फिर से सवालिया निशान खड़े करती है .

 

Updated on: Tue, 02 Apr 2013 11:42 PM (IST)
कांधला (शामली) : कस्बे में सरेशाम चार बहनों समेत पांच लड़कियों पर बाइक सवार तीन युवकों ने तेजाब फेंक दिया। इस घटना में तीन बहनें गंभीर रूप से झुलस गई। तीनों को दिल्ली रेफर किया गया है। एक युवती का कांधला में व किशोरी का शामली के निजी अस्पताल में उपचार किया गया है। चारों बहनें इंटर कालेज में परीक्षा ड्यूटी देकर घर जा रही थी। किशोरी वहां से गुजरते हुए तेजाब फेंकने के दौरान चपेट में आ गई। इस घटना से इलाके में सनसनी फैल गई और पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया। 

मोहल्ला नई बस्ती निवासी मरहूम सलीम खां की एक पुत्री कमरजहां गांव जसाला के लाड्डो देवी कॉलेज में व दूसरी पुत्री आयशा कस्बे के हिंदू इंटर कालेज में ट्यूटर (शिक्षिका)है। इनकी अन्य दो बहनें ईशा व सोनम भी प्रशिक्षित शिक्षक हैं। चारों बहनों की हिंदू इंटर कॉलेज में बोर्ड की परीक्षा में ड्यूटी लगी हुई है। मंगलवार शाम को परीक्षा ड्यूटी देकर चारों बहनें घर जा रही थीं। रास्ते में कैराना रोड स्थित चार खंभा चौक के समीप पीछे से काले रंग की पल्सर बाइक सवार तीन युवकों ने चारों बहनों पर तेजाब फेंक दिया और फरार हो गए। इस दौरान वहां से गुजर रही अलीशा (11) पुत्री अकरम निवासी शेखजादगान भी तेजाब की चपेट में आ गई। तेजाब से झुलसी पांचों लड़कियों की चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग इकट्ठा हो गए। पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची और आरोपियों की तलाश की, लेकिन उनका पता नहीं चल सका। गंभीर रूप से झुलसी इशा, सोनम व कमरजहां को शामली के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां से तीनों को दिल्ली रेफर कर दिया गया। अलीशा को दूसरे निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसका उपचार चल रहा है। आयशा के कम झुलसने के कारण कांधला अस्पताल में उपचार किया गया। थानाध्यक्ष पंकज वर्मा का कहना है कि घटना की गंभीरता से कई बिंदुओं पर जांच कर रही है।
पिचकारी से फेंका तेजाब
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पांचों लड़कियों पर पिचकारी से तेजाब फेंका गया है। एक युवक बाइक चला रहा था, जबकि पीछे बैठे दोनों युवकों के हाथ में पिचकारी थी। उसी से दोनों युवकों ने एक साथ तेजाब की बौछार कर दी।
हेलमेट व रुमाल से छिपाया आरोपियों ने चेहरा
कांधला में पांच लड़कियों पर तेजाब डालने वाले आरोपियों ने चेहरा छिपाया हुआ था। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि बाइक चला रहे युवक ने हेलमेट पहने था, जबकि पीछे बैठे दोनों युवकों ने मुंह पर रुमाल बांध रखा था।
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''तेजाब फेंकने की घटना संज्ञान में है, आरोपियों को पकड़ने के लिए कांधला व शामली की दो टीमें बनाई गई हैे। दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।''
-अब्दुल हमीद, एसपी शामली। 
 

 
  स्थानीय होने के कारण यह घटना ह्रदय को व्यथित कर गयी और मन से व्यथा कुछ इन शब्दों में व्यक्त हुई -

झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,
दिखलाई हिम्मतें ही तेजाब फैंककर .

अरमान जब हवस के पूरे न हो सके ,
तडपाई  दिल्लगी से तेजाब फैंककर .

ज़ागीर है ये मेरी, मेरा ही दिल जलाये ,
ठुकराई मिल्कियत से तेजाब फैंककर .

मेरी नहीं बनेगी फिर क्यूं बने किसी की,
सिखलाई बेवफाई तेजाब फैंककर .

चेहरा है चाँद तेरा ले दाग भी उसी से ,
दिलवाई निकाई ही तेजाब फैंककर .

 देखा है प्यार मेरा अब नफरतों को देखो ,
झलकाई मर्दानगी तेजाब फैंककर .

 शैतान का दिल टूटे तो आये क़यामत ,
निपटाई हैवानगी तेजाब फैंककर .

 कायरता है पुरुष की समझे बहादुरी है ,
छलकाई बेबसी ही तेजाब फैंककर .

 औरत न चीज़ कोई डर जाएगी न ऐसे ,
घबराई जवानी पर तेजाब फैंककर .

उसकी भी हसरतें हैं ,उसमे भी दिलावरी ,
धमकाई बेसुधी ही तेजाब फैंककर .

 चट्टान की मानिंद ही है रु-ब-रु-वो तेरे ,
गरमाई ''शालिनी'' भी तेजाब फैंककर .

       शालिनी कौशिक
             [कौशल]

 शब्दार्थ  :ज़ागीर -पुरुस्कार स्वरुप राजाओं महाराजाओं द्वारा दी गयी ज़मीन ,मिल्कियत-ज़मींदारी ,निपटाई -झगडा ख़त्म करना ,निकाई-खूबसूरती




मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

हर पार्टी ही रखे करिश्माई अदा है .

 

सियासत आज की देखो ज़ब्तशुदा है ,
हर पार्टी ही रखे करिश्माई अदा है .


औलाद कहीं बेगम हैं डोर इनकी थामे ,
जम्हूरियत इन्हीं के क़दमों पे फ़िदा है .


काबिल हैं सभी इनमे ,है सबमें ही महारत ,
पर घंटी बांधने को बस एक बढ़ा है .


इल्ज़ाम  धरें माथे ये अपने मुखालिफ के ,
पर रूप उनसे इनका अब कहाँ जुदा है .


आगे न इनसे कोई ,पीछे न खड़ा कोई ,
पर वोट-बैंक इनका अकीदत से बंधा है .

बाहर भी बैठते हैं ,भीतर भी बैठते हैं ,
मुखालफ़त का जिम्मा इनके काँधे लदा है .


जादू है ये सियासत अपनाई सब दलों ने ,
''शालिनी'' ही नहीं सबको लगती खुदा है .

            शालिनी कौशिक
                   [कौशल]

न भाई ! शादी न लड्डू

  ''शादी करके फंस गया यार ,     अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उ...