शनिवार, 31 अगस्त 2013

समाज की बलि चढ़ती बेटियां


समाज की बलि चढ़ती बेटियां

'साहब !मैं तो अपनी बेटी को घर ले आता लेकिन यही सोचकर नहीं लाया कि समाज में मेरी हंसी उड़ेगी और उसका ही यह परिणाम हुआ कि आज मुझे बेटी की लाश को ले जाना पड़ रहा है .'' केवल राकेश ही नहीं बल्कि अधिकांश वे मामले दहेज़ हत्या के हैं उनमे यही स्थिति है दहेज़ के दानव पहले लड़की को प्रताड़ित करते हैं उसे अपने मायके से कुछ लाने को विवश करते हैं और ऐसे मे बहुत सी बार जब नाकामी की स्थिति आती है तब या तो लड़की की हत्या कर दी जाती है या वह स्वयं अपने को ससुराल व् मायके दोनों तरफ से बेसहारा समझ आत्महत्या कर लेती है .
   सवाल ये है कि ऐसी स्थिति का सबसे बड़ा दोषी किसे ठहराया जाये ? ससुराल वालों को या मायके वालों को ....जहाँ एक तरफ मायके वालों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होती है वहां ससुराल वालों को ऐसी चिंता क्यूं नहीं होती ?
   इस पर यदि हम साफ तौर पर ध्यान दें तो यहाँ ऐसी स्थिति का एक मात्र दोषी हमारा समाज है जो ''जिसकी लाठी उसकी भैंस '' का ही अनुसरण करता है और चूंकि लड़की वाले की स्थिति कमजोर मानी जाती है तो उसे ही दोषी ठहराने से बाज नहीं आता और दहेज़ हत्या करने के बाद भी उन्ही दोषियों की चौखट पर किसी और लड़की का रिश्ता लेकर पहुँच जाता है क्योंकि लड़कियां तो ''सीधी गाय'' हैं चाहे जिस खूंटे से बांध दो .
       मुहं सीकर ,खून के आंसू पीकर ससुराल वालों की इच्छा पूरी करती रहें तो ठीक ,यदि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा दें तो यह समाज ही उसे कुलता करार देने से बाज नहीं आता .पति यदि अपनी पत्नी से दोस्तों को शराब देने को कहे और वह दे दे तो घर में रह ले और नहीं दे तो घर से बाहर खड़ी करने में देर नहीं लगाता  .पति की माँ बहनों से सामंजस्य बैठाने की जिम्मेदारी पत्नी की ,बैठाले तो ठीक चैन की वंशी बजा ले और नहीं बिठा पाए तो ताने ,चाटे सभी कुछ मिल सकते हैं उपहार में और परिणाम वही ढाक के तीन पात  रोज मर-मर के जी या एक बार में मर .
    ये स्थिति तो तथाकथित आज के आधुनिक समाज की है किन्तु भारत में अभी भी ऐसे समाज हैं जहाँ बाल विवाह की प्रथा है और जिसमे यदि दुर्भाग्यवश वह बाल विधवा हो जाये तो इसी समाज में बहिष्कृत की जिंदगी गुजारती है ,सती प्रथा तो लार्ड विलियम बैंटिक के प्रयासों से समाप्त हो गयी किन्तु स्थिति नारी की  उसके बाद भी कोई बेहतर हुई हो ,कहा नहीं जा सकता .आज भी किसी स्त्री के पति के मरने पर उसका जेठ स्वयं शादी शुदा बच्चों का बाप होने पर भी उसे ''रुपया '' दे घरवाली बनाकर रख सकता है .ऐसी स्थिति पर न तो उसकी पत्नी ऐतराज कर सकती है और न ही भारतीय कानून ,जो की एक जीवित पत्नी के रहते हुए दूसरी पत्नी को मान्यता नहीं देता किन्तु यह समाज मान्यता देता है ऐसे रिश्ते को .
     इस समाज में कहीं  से लेकर कहीं तक नारी के लिए साँस लेने के काबिल फिजा नहीं है क्योंकि यदि कहीं भी कोई नारी सफलता की ओर बढती है या चरम पर पहुँचती है तो ये ही कहा जाता है कि सामाजिक मान्यताओं व् बाधाओं को दरकिनार कर उसने यह सफलता हासिल की .क्यूं समाज में आज भी सही सोच नहीं है ?क्यूं सही का साथ देने का माद्दा नहीं है ?सभी कहते हैं आज सोच बदल रही है कहाँ बदल रही है ?जरा वे एक ही उदाहरण सामने दे दे जिसमे समाज के सहयोग से किसी लड़की की जिंदगी बची हो या उसने समाज के सहयोग से सफलता हासिल की हो .ये समाज ही है जहाँ तेजाब कांड पीड़ित लड़कियों के घर जाने मात्र से ये अपने कदम मात्र इस डर से रोक लेता हो कि कहीं अपराधियों की नज़र में हम न आ जाएँ ,कहीं उनके अगले शिकार हम न बन जाएँ और इस बात पर समाज अपने कदम न रोकता हो न शर्म महसूस करता हो कि अपराधियों की गिरफ़्तारी पर थाने जाकर प्रदर्शन द्वारा उन्हें छुडवाने की कोशिश की जाये .
 इस समाज का ऐसा ही रूप देखकर कन्या भ्रूण हत्या को जायज़ ही ठहराया जा सकता है क्योंकि -
   ''क्या करेगी जन्म ले बेटी यहाँ ,
        साँस लेने के काबिल फिजा नहीं .
    इस अँधेरे को जो दूर कर सके ,
       ऐसा एक भी रोशन दिया नहीं .''
          शालिनी कौशिक
                    [एडवोकेट ]

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

माफ़ न करना अपनी माँ को ,आना गर्भ में कभी नहीं .


Mother_and_daughter : mother and baby hands at homeMother_and_daughter : Mother and baby Stock PhotoMother_and_daughter : Sketch of little girl having fun with her beautiful mother. Vector illustration Stock Photo

बेटी मेरी तेरी दुश्मन ,तेरी माँ है कभी नहीं ,
तुझको खो दूँ ऐसी इच्छा ,मेरी न है कभी नहीं .
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नौ महीने कोख में रखा ,सपने देखे रोज़ नए ,
तुझको लेकर मेरे मन में ,भेद नहीं है कभी नहीं .
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माँ बनने पर पूर्ण शख्सियत ,होती है हर नारी की ,
बेटे या बेटी को लेकर ,पैदा प्रश्न है कभी नहीं .
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माँ के मन की कोमलता ही ,बेटी से उसको जोड़े ,
नन्ही-नन्ही अठखेली से ,मुहं मोड़ा है कभी नहीं .
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सबकी नफरत झेल के बेटी ,लड़ने को तैयार हूँ,
पर सब खो देने का साहस ,मुझमे न है कभी नहीं .
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कुल का दीप जलाने को ,बेटा ही सबकी चाहत ,
बड़े-बुज़ुर्गों  की आँखों का ,तू तारा है कभी नहीं .
.......................................................................
बेटे का ब्याह रचाने को ,बहु चाहिए सबको ही ,
बेटी होने पर ब्याहने का ,इनमे साहस है कभी नहीं .
............................................................................
अपने जीवन ,घर की खातिर ,पाप कर रही आज यही ,
माफ़ न करना अपनी माँ को ,आना गर्भ में कभी नहीं .
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रो-रोकर माँ कहे ''शालिनी ''वसुंधरा भी सदा दुखी ,
बेटी के आंसू बहने से ,माँ रोक सकी है कभी नहीं .
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     शालिनी कौशिक 
            [कौशल ]

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें


Krishana Wallpaper


''श्री कृष्ण-जन्माष्टमी ''एक ऐसा पर्व जो सारे भारतवर्ष में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है .अभी कुछ वर्षों से ये दो  दिन मनाया जाने लगा है .पंडितों ने इसे ''स्मार्त '' और ''वैष्णव ''में बाँट दिया है.अर्थात स्मार्त से तात्पर्य गृहस्थ जानो द्वारा और वैष्णवों से तात्पर्य कंठी माला धारण करने वाले साधू संतों द्वारा .

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''जो गृहस्थ जीवन  बिताते  हैं वे स्मार्त होते हैं अर्थात जो व्यक्ति जनेऊ धारण करते हैं गायत्री की उपासना करते हैं और वेद पुराण  ,धर्म शास्त्र ,समृत्ति को मानने वाले पञ्च वेदोंपासक हैं सभी स्मार्त हैं.
वैष्णव वे लोग होते हैं जिन लोगों ने वैष्णव गुरु से तप्त मुद्रा द्वारा अपनी भुजा  पर शंख चक्र अंकित करवाएं हैं या किसी धर्माचार्य से  विधिपूर्वक दीक्षा लेकर कंठी और तुलसी की माला धारण की हुई है .वे ही वैष्णव कहला सकते हैं अर्थात वैष्णव को सीधे शब्दों में कहें तो गृहस्थ से दूर रहने वाले लोग.

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सामान्य जन इसे मथुरा  और गोकुल में बाँट देते हैं अर्थात एक दिन मथुरा में कृष्ण के पैदा होने की ख़ुशी में मनाई  जाती  है और एक दिन गोकुल में कृष्ण के आगमन की ख़ुशी में मनाई जाती है.वैसे बहुत से स्थानों पर यह पर्व कई दिन चलता है और कृष्ण की छठी मनाकर ही इसे सम्पन्न किया जाता है.
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बचपन से ही इस पर्व से हमारी बहुत सी यादें जुडी हैं हमें कहीं कृष्ण जी बना दिया जाता तो एक समय तक तो हम इस लालच में खड़े रहते कि सभी आकर हमारी जय बोल  रहे हैं और हमारे चरण छू रहे हैं  किन्तु जब हम खड़े खड़े थक जाते तो एक समय आने पर   हम झांकियां देखने को अपना स्थान त्याग भाग जाते और जगह जगह कृष्ण  जन्माष्टमी की झांकियों का आनंद लेते .


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भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी बुधवार को रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि  के समय वृष के चंद्रमा में हुआ था .आज देखा जाये तो कृष्ण के अनुयायी बहुत बड़ी संख्या में हैं .राम व् कृष्ण दोनों भगवान विष्णु के अवतार हैं और दोनों की लीलाएं अद्भुत हैं किन्तु एक मत यह भी प्रचलित है कि जहाँ राम की लीला थम जाती है कृष्ण लीला वहीँ से आरम्भ होती है राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो कृष्ण चंचल नटखट हैं और हर वह कार्य करने वाले हैं जिसे असंभव समझा  जाये.पूतना का वध जरा से बालक द्वारा ,कालिया नाग का मर्दन नन्हे से बालक द्वारा ऐसे कई कार्य हैं जो श्री कृष्ण ने किये और जिनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता.
    कल पूरे भारत वर्ष में हर्षोल्लास से कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जायेगा और यही वह अखंड आनंद है जिससे हमारा मन ओत-प्रोत हो उठता  है.
आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें
              शालिनी कौशिक
                        [ कौशल ]

सोमवार, 26 अगस्त 2013

पैदा हुए ही गला क्यूं दबा नहीं दिया .


 

न कुछ कहने की इज़ाज़त ,
न कुछ बनने की इज़ाज़त ,
न साँस लेने की इज़ाज़त ,
न आगे बढ़ने की इज़ाज़त .
      न आपसे दो बात मन की बढ़के कह सकूं ,
      न माफिक अपने फैसला खुद कोई ले सकूं ,
      जो आपको लगे सही बस वो ही मैं करूँ ,
      न उसको किसी हाल में मैं नहीं कह सकूं .

अपनी ही बात को रखा सबसे सदा ऊपर ,
हालत का मेरी दोष मढ़ा मेरे ही सिर पर ,
माना न कहा मेरा ,औरों से दबाया ,
फिर उनकी बात रखकर मारी मुझे ठोकर .
        बनते हैं वक्त के हमकदम ज़माने के लिए ,
        दूसरों की असलियत पे होंठ सी लिए ,
        देना था जहाँ साथ मेरा भविष्य के लिए ,
        पैरों में मेरे बेड़ियाँ डाल खड़े हो लिए .

बेटी को माना बोझ तो फिर जन्म क्यूं दिया ,
बेटी का भविष्य यहाँ चौपट क्यूं कर दिया ,
न देना था उसको अगर सुनहरा भविष्य ,
पैदा हुए ही गला क्यूं दबा नहीं दिया .
        बेटी तो पौध है खुले आँगन में ही चले ,
        सांसे उसे बढ़ने को उस हवा में ही मिलें ,
        रखोगे बंद कमरे में दुनिया से छिपाकर ,
        घुट जाएगी वैसे ही जैसे पौध न खिले .

    शालिनी कौशिक
     [WOMAN ABOUT MAN]


शनिवार, 24 अगस्त 2013

मात्र खंडपीठ की मांग पश्चिमी यूपी से न्याय नहीं

मात्र खंडपीठ की मांग पश्चिमी यूपी से न्याय नहीं

            
                                                                            



                           
 पश्चिमी यू.पी.उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है .चीनी उद्योग ,सूती वस्त्र उद्योग ,वनस्पति घी उद्योग ,चमड़ा उद्योग आदि आदि में अपनी पूरी धाक रखते हुए कृषि क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करता है .इसके साथ ही अपराध के क्षेत्र में भी यह विश्व में अपना दबदबा रखता है .यहाँ का जिला मुजफ्फरनगर तो बीबीसी पर भी अपराध के क्षेत्र में ऊँचा नाम किये है और जिला गाजियाबाद के नाम से तो अभी हाल ही में एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है .यही नहीं अपराधों की राजधानी होते हुए भी यह क्षेत्र धन सम्पदा ,भूमि सम्पदा से इतना भरपूर है कि बड़े बड़े औद्योगिक घराने यहाँ अपने उद्योग स्थापित करने को उत्सुक रहते हैं और इसी क्रम में बरेली मंडल के शान्ह्जहापुर में अनिल अम्बानी ग्रुप के रिलायंस पावर ग्रुप की रोज़ा  विद्युत परियोजना में २८ दिसंबर २००९ से उत्पादन शुरू हो गया है .सरकारी नौकरी में लगे अधिकारी भले ही न्याय विभाग से हों या शिक्षा विभाग से या प्रशासनिक विभाग से ''ऊपर की कमाई'' के लिए इसी क्षेत्र में आने को लालायित रहते हैं .इतना सब होने के बावजूद यह क्षेत्र पिछड़े हुए क्षेत्रों में आता है क्योंकि जो स्थिति भारतवर्ष की अंग्रेजों ने की थी वही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी उत्तर प्रदेश ने व् हमारे भारतवर्ष ने की है .
     ''सोने की चिड़िया''अगर कभी विस्तृत अर्थों में भारत था तो सूक्ष्म अर्थों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश आज भी है .यहाँ से लेने को तो सभी लालायित रहते हैं किन्तु देने के नाम पर ठेंगा दिखाना एक चलन सा बन गया है .आज पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दम पर फल-फूल रहा है .छात्रों को राज्य सेवा ,शिक्षा में कहीं भी आने के लिए परीक्षा देनी हो तो अपने पैसे व् समय अपव्यय करने के लिए तैयार रहो और चलो इलाहाबाद या लखनऊ .समझौते की गुंजाईश न हो ,मरने मिटने को ,भूखे मरने को तैयार हैं तो चलिए इलाहाबाद ,जहाँ पहले तो बागपत से ६४० किलोमीटर ,मेरठ से ६०७ किलोमीटर ,बिजनोर से ६९२ किलोमीटर ,मुजफ्फरनगर से ६६० किलोमीटर ,सहारनपुर से ७५० किलोमीटर ,गाजियाबाद से ६३० किलोमीटर ,गौतमबुद्ध नगर से ६५० किलोमीटर ,बुलंदशहर से ५६० किलोमीटर की यात्रा कर के धक्के खाकर ,पैसे लुटाकर ,समय बर्बाद कर पहुँचो फिर वहां होटलों में ठहरों ,अपने स्वास्थ्य से लापरवाही बरत नापसंदगी का खाना खाओ ,गंदगी में समय बिताओ और फिर न्याय मिले न मिले ,परीक्षा पास हो या न हो उल्टे पाँव उसी तरह घर लौट आओ .ऐसे में १९७९ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के आन्दोलन कारियों में से आगरा के एक अधिवक्ता अनिल प्रकाश रावत जी द्वारा विधि मंत्रालय से यह जानकारी मांगी जाने पर -''कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव विचाराधीन है ?''पर केन्द्रीय विधि मंत्रालय के अनुसचिव के.सी.थांग कहते हैं -''जसवंत सिंह आयोग ने १९८५ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने की सिफारिश की थी .इसी दौरान उत्तराखंड बनने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले उत्तराखंड के अधिकार क्षेत्र में चले गए वहीँ नैनीताल में एक हाईकोर्ट की स्थापना हो गयी है .इस मामले में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय मागी गयी थी .इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश  ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की किसी शाखा की स्थापना का कोई औचित्य नहीं पाया है .''
     सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट से दूरी घट गयी है ?क्या नैनीताल हाईकोर्ट इधर के मामलों में दखल दे उनमे न्याय प्रदान कर रही है ?और अगर हाईकोर्ट के माननीय  मुख्य न्यायाधीश को इधर खंडपीठ की स्थापना का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है तो क्यों?क्या घर से जाने पर यदि किसी को घर बंद करना पड़ता है तो क्या उसके लिए कोई सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी.में तो ये हाल है कि जब भी किसी का घर बंद हो चाहे एक दिन को ही हो चोरी हो जाती है .और क्या अपने क्षेत्र से इलाहाबाद तक के सफ़र के लिए किसी विशेष सुविधा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी. में तो आर.पी.ऍफ़.वाले ही यात्रियों को ट्रेन से धकेल देते हैं .राजेश्वर व् सरोज की घटना अभी एक दिन पूर्व की ही है जिसमे सरोज की जान ही चली गयी .क्या इलाहाबाद में वादकारियों के ठहराने व् खाने के लिए कोई व्यवस्था की गयी है ?जबकि वहां तो रिक्शा वाले ही होटल वालों से कमीशन खाते हैं और यात्रियों को स्वयं वहीँ ले जाते हैं .और क्या मुक़दमे लड़ने के लिए वादकारियों को वाद व्यय दिया जाता है या उनके लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम किया जाता है ?जबकि हाल तो ये है कि दीवानी के मुक़दमे आदमी को दिवालिया कर देते हैं और फौजदारी में आदमी कभी कभी अपने परिजनों व् अपनी जान से भी हाथ धो डालता है .पश्चिमी यू.पी .की जनता को इतनी दूरी के न्याय के मामले में या तो अन्याय के आगे सिर झुकाना पड़ता है या फिर घर बार  लुटाकर न्याय की राह पर आगे बढ़ना होता है .
     न्याय हो या शिक्षा का क्षेत्र दोनों में ही यदि हाईकोर्ट व् सरकार अपनी सही भूमिका निभाएं तो बहुत हद तक जन कल्याण भी कर सकती है और न्याय भी .आम आदमी जो कि कानून की प्रक्रिया के कारण ही बहुत सी बार अन्याय  सहकर घर बैठ जाता है और दूरी को देख छात्र परीक्षा देने से पीछे हट जाता है ,दोनों ही आगे बढ़ेंगे यदि हाईकोर्ट ,शिक्षा प्रशासन ,सरकार सही ढंग से कार्य करें .यह हमारा देश है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है फिर हमें ही क्यों परेशानी उठानी पड़ती है ?यदि वेस्ट यू.पी.में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित की जाती है तब निश्चित रूप से मुक़दमे बढ़ेंगे और इनसे होने वाली आय से जो सरकारी खर्च में इस स्थापना के फलस्वरूप बढ़ोतरी हुई होगी वह तो पूरी होगी ही सरकार की आय में भी बढ़ोतरी होगी और जनता में सरकार के प्रति विश्वास भी बढेगा जो सरकार के स्थायित्व के लिए व् भविष्य में कार्य करने के लिए बहुत आवश्यक है .   शिक्षा परीक्षा की जो प्रतियोगिताएं इलाहाबाद ,लखनऊ में आयोजित की जाती हैं उससे वहां पर छात्रों व् उनके परिजनों की बहुत भीड़ बढती है जिसके लिए प्रशासन को बहुत सतर्कता से कार्य करना होता है उसे यदि  जिले या मंडलों के कॉलेज में बाँट दिया जाये तो सरकार पर इतने इंतजाम का बोझ नहीं पड़ेगा और प्रतिभागियों को भी सुविधा रहेगी .वे आसानी से सुबह को अपने घर से जाकर शाम तक घर पर लौट सकेंगे और इस तरह न उन्हें अपने घर की चिंता होगी और न प्रशासन को व्यवस्था की . किन्तु पूर्व का अर्थात इलाहाबाद व् लखनऊ का राजनीतिक प्रभाव इतना ज्यादा है कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जायेगा जिससे पश्चिम की जनता वहां से कटे और उनकी आमदनी पर प्रभाव पड़े भले ही इधर की जनता लुटती पिटती रहे .इसलिए कोई भी प्रयास जो इस दिशा में किया जाता है वह सफल नहीं होता .चाहे केन्द्रीय रेल बजट हो या उत्तर प्रदेश सरकार का बजट हो इधर के लिए ऐसे ही काम किये जाते हैं जो ''ऊंट के मुहं में जीरा'' ही साबित होते हैं .रेल बजट में दिल्ली-सहारनपुर वाया शामली रूट के दोहरीकरण के नाम पर सर्वे का लॉलीपाप ही दिया गया .उत्तर प्रदेश सरकार के बजट में २५९ सेतुओं के निर्माण का प्रावधान है जिसमे से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मात्र 9 सेतु ही हैं .
    आज स्थिति ये है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ठगा जा रहा है और ये यहाँ की जनता को ही अब सोचना होगा कि उसे मात्र कुछ भाग लेना है या अपना पूरा अधिकार .कृषि ,उद्योग ,धन आदि सभी संपदाओं से भरपूर इस क्षेत्र को अब छोटे मोटे इन तुच्छ प्रलोभनों का मोह त्यागना होगा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए ही आगे बढ़ना होगा क्योंकि इसके बगैर यहाँ की जनता का कल्याण नहीं होगा और हर मामले में पूर्व को पश्चिम के सिर पर ही बैठाया जाता रहेगा .इसलिए अब तो यहाँ की जनता को यही कहना होगा -
       ''बहकावों में न आयेंगे ,
           अपनी सरकार बनायेंगे .
       तुम ना समझोगे औचित्य ,
            हम ना तुमको समझायेंगे .
        हम जनता हैं ,हम ताकत हैं ,
           अब तुमको भी दिखलायेंगे .

         छोटी मोटी मांगे न कर ,
          अब राज्य इसे बनवाएँगे .''
  

  शालिनी कौशिक
        [कौशल]

     

रविवार, 18 अगस्त 2013

राष्ट्रपति डाक्टर शंकर दयाल शर्मा जी के जन्मदिन पर हम सभी भारतवासियों की ओर से शत शत नमन


Shankar Dayal Sharma 36.jpg
विकिपीडिया से साभार 
 आज जन्मदिन है देश के  नौवें राष्ट्रपति  डाक्टर शंकर दयाल शर्मा जी का और वे सदैव मेरे लिए श्रद्धा के पात्र रहेंगे क्योंकि उनके बारे में जो सबसे महत्वपूर्ण है वह ये कि मुझे अच्छी तरह से याद है कि देश के प्रथम नागरिक के पद से जब उनकी सेवानिवृति का अवसर आया तो उनके चेहरे पर तनिक भी विषाद  नहीं था बल्कि थी हमेशा की तरह मुस्कान। आज उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर मैं आपके और अपने लिए विकिपीडिया से कुछ जानकारी जुटा  लायी हूँ और चाहती हूँ कि आप भी मेरी तरह इन महान शख्सियत को ऐसे समय में याद करें और नमन करें जब स्वयं को देश पर थोपने वाले नेताओं की केंद्र में भीड़ बढती जा रही है। तो लीजिये आप भी जानिए हमारे देश को गौरवान्वित  और स्वयं किसी भी घमंड से दूर रहने वाले सीधे सरल इन्सान शंकर दयाल शर्मा जी के बारे में -

शंकरदयाल शर्मा

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
शंकरदयाल शर्मा

कार्य काल
२५ जुलाई १९९२ – २५ जुलाई १९९7
उप राष्ट्रपति  कोच्चेरी रामण नारायणन
पूर्ववर्तीरामस्वामी वेंकटरमण
उत्तरावर्तीकोच्चेरी रामण नारायणन

जन्म१९ अगस्त १९१८
भोपालमध्यप्रदेशभारत
मृत्यु२६ दिसंबर १९९९
नई दिल्लीभारत
राजनैतिक पार्टीभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
जीवनसंगीविमला शर्मा
धर्महिन्दू
शंकरदयाल शर्मा (१९ अगस्त १९१८- २६ दिसंबर १९९९भारत के नवें राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल २५ जुलाई १९९२ से २५ जुलाई १९९७ तक रहा।राष्ट्रपति बनने से पूर्व आप भारत के आठवे उपराष्ट्रपति भी थे, आप भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री (1952-1956) रहे तथा मध्यप्रदेश राज्य में कैबिनेट स्तर के मंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षा, विधि, सार्वजनिक निर्माण कार्य, उद्योग तथा वाणिज्य मंत्रालय का कामकाज संभाला था। केंद्र सरकार में वे संचार मंत्री के रूप में (1974-1977) पदभार संभाला। इस दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (1972-1974) भी रहे।

शिक्षा तथा प्रारम्भिक जीवन[संपादित करें]

डॉक्टर शर्मा ने सेंट जान्स कॉलेज आगरा, आगरा कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालयलखनऊ विश्वविद्यालय, फित्ज़विल्यम कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लिंकोन इन् तथा हारवर्ड ला स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। इन्होंनेहिन्दीअंग्रेजीसंस्कृत साहित्य में एम.ए. की डिग्री विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त की, आपने एल.एल.एम. की डिग्री भी लखनऊ विश्व विद्यालय से प्रथम स्थान के साथ प्राप्त की थी, विधि में पी.एच.डी. की डिग्री कैम्ब्रिज से प्राप्त की, आपको लखनऊ विश्विद्यालय से समाज सेवा में चक्रवर्ती स्वर्ण पदक भी प्राप्त हुआ था। इन्होंने लखनऊ विश्विद्यालय तथा कैम्ब्रिज में विधि का अध्यापन कार्य भी किया, कैम्ब्रिज में रहते समय आप टैगोर सोसायटी तथा कैम्ब्रिज मजलिस के कोषाध्यक्ष रहे, आपने लिंकोन इन से बैरिस्टर एट ला की डिग्री ली, आपको वहां पर मानद बेंचर तथा मास्टर चुना गया था, आप फित्ज़विल्यम कॉलेज के मानद फैलो रहे। कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय ने आपको मानद डॉक्टर ऑफ़ ला की डिग्री दे कर सम्मानित किया। आपका विवाह विमला शर्मा के साथ हुआ था|

राजनैतिक शुरूआत[संपादित करें]

१९४० के दशक में वे भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हो गए, इस हेतु उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ले ली, 1952 में भोपाल के मुख्यमंत्री बन गए, इस पद पर 1956 तक रहे जब भोपाल का विलय अन्य राज्यों में कर मध्यप्रदेश की रचना हुई।

सक्रिय राजनैतिक जीवन[संपादित करें]

1960 के दशक में उन्होंने इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व प्राप्त करने में सहायता दी। इंदिरा कैबिनेट में वे संचार मंत्री (1974-1977) रहे, 1971 तथा 1980 में उन्होंने भोपाल से लोक सभा की सीट जीती, इसके बाद उन्होंने कई भूष्नात्मक पदों पर कार्य किया, 1984 से वे राज्यपाल के रूप में आंध्रप्रदेश में नियुक्ति के दौरान दिल्ली में उनकी पुत्री गीतांजली तथा दामाद ललित माकन की हत्या सिख चरमपंथियों ने कर दी, 1985 से 1986 तक वे पंजाब के राज्यपाल रहे, अन्तिम राज्यपाल दायित्व उन्होंने 1986 से 1987 तक महाराष्ट्र में निभाया। इसके बाद उन्हें उप राष्ट्रपति तथा राज्य सभा के सभापति के रूप में चुन लिया गया गया इस पद पर वे १९९२ में राष्ट्रपति बनने तक रहे।
शर्मा संसदीय मानको का सख्ती से पालन करते थे ,राज्य सभा में एक मौके पर वे इसलिए रो पड़े थे कि क्योंकि राज्य सभा के सदस्यों ने एक राजनैतिक मुद्दे पर सदन को जाम कर दिया था। राष्ट्रपति चुनाव उन्होंने जार्ज स्वेल को हरा के जीता था इसमे उन्हें 66% मत मिले थे। अपने अन्तिम कार्य वर्ष में उन्होंने तीन प्रधानमंत्रियो को शपथ दिलाई।

बीमारी तथा मृत्यु[संपादित करें]

अपने जीवन के अन्तिम पाँच वर्षो में वे बीमार रहे ,९ अक्टूबर १९९९ को उन्हें दिल का दौरा पड़ने पर दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।     

राष्ट्रपति  डाक्टर शंकर दयाल शर्मा जी के जन्मदिन पर हम सभी भारतवासियों की ओर से शत शत नमन 
शालिनी कौशिक 
          [कौशल ]

शनिवार, 17 अगस्त 2013

महासंतोषी क़स्बा कांधला [शामली ]

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Kandhla
Kandhla is a city and a municipal board in Muzaffarnagar district in the Indian state of Uttar Pradesh.
महासंतोषी क़स्बा कांधला [शामली ]
हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल ,बागों की भूमि ,देश के सभी बड़े शहरों में नाम कमाने वाली प्रतिभाओं की जन्मस्थली कांधला ,ऐसा नही कि केवल इतनी सी बातों के लिए ही प्रशंसा के योग्य है और भी बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनके लिए यह क़स्बा तारीफ के योग्य है .

हमारे यहाँ एक प्रसिद्ध उक्ति है -
    ''संतोष परम सुखं .''
और यह भी कि -
 ''जब आवे संतोष धन सब धन धूरी सामान .''
और यही संतोष धन इस कस्बे के प्रत्येक नागरिक में  कूट कूट कर भरा है और एक तरफ जहाँ आज सम्पूर्ण विश्व विकास पाने को लालायित है ,इस कस्बे का विकास जैसे शब्द से कोई सरोकार ही नहीं है .यहाँ के नागरिक तो मात्र अपने बच्चों के नाम ही विकास रखकर अपने को विकास पथगामी समझ संतोष कर लेते हैं .
   बिजली आधुनिकता की होड़ में आगे बढ़ने के लिए ,विकसित होने के लिए आज प्रथम आवश्यकता का रूप ग्रहण कर चुकी है .यहाँ के नागरिकों के लिए कोई मायने नहीं रखती .यहाँ कुछ वर्ष पूर्व बिजली के लिए यहाँ के बहुसंख्यक ,क्रांतिकारी कहे जा सकने वाले इस्लाम धर्म के नागरिकों द्वारा एक आन्दोलन किया गया किन्तु कुछ उदंडता दिखाने के कारण जुलुस में शामिल लोगों को विद्युत विभाग ने   ऐसा कानूनी फेर में उलझाया कि अब बिजली चाहे आये या न आये .दो घंटे आये एक घंटे आये कोई बोलने वाला नहीं है यहाँ के लोगों में संतोष इतना ज्यादा है कि जेनरेटर व् इनवर्टर दोनों की व्यवस्था कर ली है और शेष हाथ का पंखा तो है ही .बिजली आये या न आये बिल समय से दोड़ कर जमा कराये जाते हैं  .
     दूसरी विशेषता यह कि शिक्षा के क्षेत्र में यहाँ का बहुत नाम है गंगादास जी जैसे आई.ए.एस .यहाँ से हुए हैं ,स्वामी सानंद जैसे महापुरुष कानपूर आई.आई.टी के प्रोफ़ेसर डॉ.गुरुदास जी  यहीं के हैं .प्रदेश में जब गिने चुने महिला महाविद्यालय थे तब से यहाँ १९६९ से राजकीय महिला महाविद्यालय है .लड़कों के लिए दो इंटर कॉलेज हैं लड़कियों के लिए राजकीय बालिका इंटर कॉलेज ,पर संतोष की सीमाओं में रहने वाला यह क़स्बा ,जो चल रहा है उसी पर चलता जाता है .लड़कियों के लिए इंटर कॉलेज में साइंस स्ट्रीम में पढाई की व्यवस्था थी ख़त्म हो गयी ,तो हो जाये कोई बात नहीं हमारी लड़कियां इतनी होशियार ही कहाँ हैं ..राजकीय महिला महाविद्यालय आर्ट्स स्ट्रीम में तो पूर्ण शिक्षा व्यवस्था वाला है नहीं १९९० में यहाँ एम्.ए.की व्यवस्था हुई दो विषय में गृह विज्ञान व् अर्थशास्त्र में बी.ए. में मात्र सात विषय अब जिसे पढने हो तो वह ये ही पढ़ ले नहीं तो घर बैठ ले पर देखिये संतोष कितना है यहाँ यहाँ कि लड़कियां चाहे बचपन से लेकर आज तक इन विषयों की ए.बी.सी.डी. भी नहीं जानती हों इनमे पढाई कर रही हैं और यही नहीं इसमें तो व्यवस्था पूरी है नहीं उसपर यहाँ साइंस स्ट्रीम में प्रवेश आरम्भ कर दिए गए शिक्षा की व्यवस्था नही और यहाँ के लोगों का संतोष लड़कियों का प्रवेश भी करा दिया और परिणाम लगभग लड़कियां फेल .
     और लड़के उनके लिए तो और भी बुरा हाल उनकी डिग्री के लिए यहाँ कोई व्यवस्था नही यहाँ के लोगों का कहना लड़के इतना पढ़ते ही कहाँ हैं और वैसे भी किसी को पढना होगा तो बाहर जाकर पढ़ लेगा हम अपनी जमीन इस तुच्छ कार्य हेतु नहीं देंगे भले ही पिक्चर हाल बनवा लेंगे और वैसे भी लडको को इन टोटकों की ज़रुरत नहीं उनकी शादियाँ तो वैसे भी उनके पीछे फिर कर लड़की वाला करता है ये दिक्कत तो लड़कियों के साथ है और इसलिए यहाँ लड़कियों की पढाई की व्यवस्था तो हमने कर ली है .
   तीसरी आवश्यकता सफाई ,सफाई में भगवान बसते हैं मानते सब हैं किन्तु अगर वहां के सफाई कर्मचारी किसी के घर के आगे कूड़ा डालना शुरू कर दें तो उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा क्योंकि सबको उनसे बनाये रखनी है चाहे अपने मुहं पर कपडा रखकर साँस बंदकर घर से अन्दर बाहर निकलना बढ़ना पड़े तब भी नगर पालिका द्वारा कूड़ा उठाने  का इंतजार किया जायेगा जो कि कभी दो घंटे कभी दो दिन भी हो सकता है पर कोई कुछ नहीं कहेगा और उसपर यदि ये अगर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के घर के सामने हो रहा है तो सारी जिम्मेदारी उसकी ही बन जाती है यहाँ के अन्य  लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता वे उसकी ही प्रतिक्रिया व् कार्यवाही का इंतजार करते हैं और कूड़े के पास भले ही अपना घर हो दुकान हो उसके प्रति कोई उपेक्षा नहीं रखते बल्कि उसे गले लगाते हुए वहीँ कुर्सी डालकर बैठ जाते हैं .
  यही नहीं अपने बच्चे खेलते हों जनता के आवागमन का मुख्य रास्ता हो अपनी गाड़ियाँ खड़ी रहती हो तब भी यदि बिजली का खम्बा गिरने वाला हो तो अपनी समझ से उससे बचकर निकलते  रहेंगे  नगर पालिका में जाकर कोई इसके सम्बन्ध में कुछ नहीं कहेगा .
 
 
कस्बे में इतना संतोष है कि सामने किसी का मर्डर हो जाये ,कोई छेड़खानी हो जाये ,तेजाब की घटना हो जाये तो बस माहौल ख़राब हो रहा है कहकर कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है ..
    प्रतियोगी परीक्षाओं के ज़माने में यहाँ प्रतियोगिता के फार्म तक नहीं मिलते फिर उनसे सम्बंधित किताबों के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है .विद्यार्थी परीक्षाओं को मॉडल पेपर से ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर लेते हैं .प्रतिभाशाली शख्सियतों का जमावड़ा है कांधला
      .संतोष की ऐसी मिसाल व् उपलब्धियां शायद ही विश्व में कहीं मिलेंगी .कहीं और अगर पुलिस की लापरवाही के चलते कोई घटना घटित होती है तो वहां पुलिस को जनता आड़े हाथों लेती है किन्तु यहाँ शायद ही कोई पुलिसवाला होगा जो आकर जाना चाहे कारण यहाँ पुलिस के सिपाही की भी अपने महानिदेशक से ज्यादा इज्ज़त है उनसे हाथ मिलाने को यहाँ लोग रोज नयी समितियां बनाते हैं और अच्छा पैसा खर्चकर अध्यक्ष बनते हैं ताकि जाकर उन्हें अपना परिचय एक अध्यक्ष के रूप में दे सकें भले ही सम्बंधित पुलिसवाला निलंबन की प्रक्रिया के अधीन हो .पड़ोस में कोई क़त्ल हो जाये तो पुलिस भले ही बहुत देर से आई हो उसे आदरपूर्वक अपने घर में बैठकर चाय समोसे खिलाते हैं ताकि पुलिसवाले पर भी यहाँ का संतोष असर कर जाये और वह हादसे को अपनी लापरवाही मान दुखी न हो बल्कि इसे ईश्वर की मर्जी मान कभी आगे बढ़ने का यत्न ही न करे .
आसपास के कस्बे कैराना ,शामली प्रगति में इससे कोसों आगे निकल गए हैं कैराना न्याय व्यवस्था में जिला जज के स्तर तक पहुँच चुका है तो शामली जिला ही बन चुका है और कांधला आज तक तहसील भी नहीं बना पर इसका कोई अफ़सोस ही नहीं यहाँ के नागरिकों को इसके लिए यहाँ कभी कोई आन्दोलन भी नहीं हुआ
     यहाँ केवल जनता में एक चाह है और वह है किसी भी तरह यहाँ की नगरपालिका में घुसने की.जैसे कहा जाता है कि ''मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक '' वैसे ही कान्धले वालों की दौड़ नगरपालिका तक .बस किसी भी तरह यहाँ नगरपालिका के चेयरमेन या सभासद बन जाओ और खूब धन कमाओ .नाम की कोई इच्छा यहाँ किसी को नहीं है और प्रशासन से इन्हें इतनी आज़ादी कि क्या कहने .सभासदों को नल लगाने को मिले तो लगा दिए गए सड़कों पर दस दस कदम पर भले ही वहां सभी घरों में टंकी हों ,पहले से नल लगे हों यहाँ तक कि सभासद में इतना संतोष कि सड़क पर जगह न मिली तो जनता के लिए अपने घर के दरवाजे खोल दिए नल अपने घर में लगा लिए जनता वहीँ से पानी ले ले .
    राजमार्गों पर ज्यादा ट्रेफिक के मार्गों पर लगने वाले सोलर लाईट के खम्बे घरों से भरे इलाके में लगवाकर यहाँ के नागरिकों को संतोष का पुरुस्कार यहाँ की  नगरपालिका ने दिया है जबकि इन जगहों पर साधारण ट्यूब भी अच्छी रौशनी देती है और जनता ने भी इस संतोष पुरुस्कार का जवाब अपने संतोष से दिया है कुछ न कहकर ,रात में अपने सोने के लिए पर्दों का इस्तेमाल कर क्योंकि यहाँ पावर को कानून से भी ऊँचा दर्जा प्राप्त है और उसके हर कार्य को स्वीकार जाता है .
    संतोष के मामले में कांधला क़स्बा गिनीज़ बुक में नाम दर्ज करने योग्य है किन्तु उसमे इतना संतोष  है कि क्या कहने .वह इसके लिए भी नहीं कहता .
                शालिनी कौशिक
                         [कौशल ]

बुधवार, 14 अगस्त 2013

कुर्बान तुझ पे खून की ,हर बूँद शान से।

Independence Day Picture
फरमा रहा है फख्र से ,ये मुल्क शान से ,
कुर्बान तुझ पे खून की ,हर बूँद शान से।
..................................................

फराखी छाये देश में ,फरेब न पले ,
कटवा दिए शहीदों ने यूँ शीश शान से .
..................................................

 देने को साँस लेने के ,काबिल वो फिजायें ,
कुर्बानी की राहों पे चले ,मस्त शान से .
..................................................

आज़ादी रही माशूका जिन शूरवीरों की ,
साफ़े की जगह बाँध चले कफ़न शान से .
.....................................................................

कुर्बानी दे वतन को जो आज़ाद कर गए ,
शाकिर है शहादत की हर  नस्ल  शान से .
.................................................................
इस मुल्क का गुरूर है वीरों की शहादत ,
फहरा रही पताका यूँ आज शान से .
...............................................................

मकरूज़ ये हिन्दोस्तां शहीदों तुम्हारा ,
नवायेगा सदा ही सिर सरदर शान से .
.........................................................................
पैगाम आज दे रही कुर्बानियां इनकी ,
घुसने न देना फिर कभी सियार  शान से .
..................................................................
करते हैं अदब दिल से अगर हम शहीदों का ,
छोड़ेंगे बखुशी सब मतभेद शान से .
.........................................................
इस मुल्क की हिफाज़त दुश्मन से कर सकें ,
सलाम मादरे-वतन कहें आप  शान से .
.....................................................
मुक़द्दस इस मुहीम पर कुर्बान ''शालिनी'' ,
ऐसे ही सिर उठाएगा ये मुल्क शान से .

शालिनी कौशिक 
[कौशल]

[शब्दार्थ-सरदर-सब मिलकर एक साथ ]




My India My Pride



शनिवार, 10 अगस्त 2013

शाहरुख़-सलमान के क़दमों के निशान मिटाके देख .

Shahrukh Khan in Shahrukh photos of Shahrukh Khan pictures movie film cinema indian films hindi filmSalman Khan in Salman photos of Salman pictures movie film cinema indian films hindi film
[शाहरुख़-सलमान के क़दमों के निशान मिटाके देख .]
''तुझसे बद्जन न हो कल तेरा ही लहू ,
     अपने बच्चों को ऐसा निवाला न दे .''
सुलेमान आदिल की ये पंक्तियाँ दिमाग पर छा गयी जब ''मुसलमान शाहरुख़ ,सलमान न रखें बच्चों के नाम ''कहकर कारी शफिकुर्रह्मान ने मेरठ की शाही ईदगाह पर ईद  की नमाज़ का माहौल बदल  दिया .
 
जहाँ एक तरफ वे ईद पर इन अभिनेताओं की फिल्मों का रिलीज़ होना और इन्हें देखना हमारे संस्कारों से जोड़ रहे हैं वहीँ खुद की ज़बान ,जिसे ऐसे मुक़द्दस मौके पर  केवल खुदा के पैगाम से जुडी बाते करनी चाहियें और दूसरों को भी इसी दिशा में प्रेरित करना चाहिए ,तक को वे कोई सही दिशा नहीं दे पा रहे हैं  .इदुल-फितर की नमाज़ में क्या ऐसे सन्देश को खुदा से जोड़कर देखा जा सकता है ?क्या ये बन्दे खुदा के बन्दे नहीं हैं ?क्या हम इनके काम को गलत कह सकते हैं ?क्या इनका हमारे देश समाज के लिए कोई योगदान नहीं है ?
हरबंस सिंह ''निर्मल ''ने कहा है -
''पिलाकर गिरना नहीं कोई मुश्किल ,
            गिरे को उठाये वो कोई नहीं है .
ज़माने ने हमको दिए जख्म इतने ,
             जो मरहम लगाये वो कोई नहीं है .''
अक्षरशः खरी उतरती हैं हमारे फ़िल्मी कलाकारों व् इन जैसा पेशा या व्यवसाय अपनाने  वालों पर .फिल्मे न केवल हमारे मनोरंजन का जरिया हैं अपितु हमें देश सेवा ,समाज सेवा ,मानव सेवा के लिए प्रेरित करने का भी नायाब तौहफा  हैं हमारे फिल्मकारों द्वारा.किताबें पढना हर किसी के लिए संभव नहीं होता किन्तु अभिनय प्रतिभा के दम पर ये हमारी सांस्कृतिक परम्परा ,हमारे इतिहास ,हमारी वर्तमान उपलब्धियों ,समस्याओं को हमारे सामने लाते हैं और हमें भली-भांति अवगत करते हैं .इन सबसे और इन सबका ही प्रभाव है कि लोग धार्मिक परम्पराओं व् रीति रिवाजों से गहराई तक जुड़ते हैं .हर साल देश के कोने कोने में होने वाली और दूरदर्शन पर प्रसारित रामायण को इन कलाकारों ने वो जीवन्तता दी है कि राम आज जन जन के आदर्श हैं प्रिय हैं और अरुण गोविल व् दीपिका चिखलिया आज राम सीता की तरह पूजे जाते हैं .नाचने गाने वाले कह इनका अपमान करने की पुरानी परंपरा रही है .रालोद मुखिया अजित सिंह ने भी कभी अमिताभ बच्चन जी को नाचने गाने वाले कह अपमानित करने का प्रयास किया था और आज वे अमिताभ जी ही एक किवंदती बन चुके हैं अजित सिंह जी खुद देख लें कि गुजरात में पर्यटन के प्रसार के लिए अमिताभ बच्चन एक देवदूत का दर्जा पाए हुए हैं और ये तो केवल एक उदाहरण है इन नायकों के देश हित में योगदान का ,अभी हाल में ही शाहरुख़ खान की चक दे इंडिया चर्चा में है  क्योंकि वह प्रेरणा बनी है भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम की जिसने अभी विश्व चैम्पियनशिप में कांस्य जीता है ,यही नहीं ये हमारे फिल्मकार ही हैं जिनकी प्रेरणा से हजारों युवाओं ने सेना में भर्ती होकर देश सेवा के कीर्तिमान स्थापित किये हैं .ये हमारे नायक ही हैं जो इस सन्देश का प्रसार करते हैं -
''जिस चोले को पहन शिवाजी खेले अपनी जान पे ,
जिसे पहन झाँसी की रानी मिट गयी अपनी आन पे ,
आज उसी को पहन के निकला ,पहन के निकला 
हम मस्तों का टोला -मेरा रंग दे बसंती चोला .''
और यही नहीं कोई भी धर्म का पुरोधा ,गुरु इस तरह नाचने गाने वालों का भी अपमान नहीं कर सकता क्योंकि ये पेशा जो पहले तवायफें करती थी वे राज सभाओं में सम्मानित की जाती थी और अपनी प्रतिभा के दम पर वे जन जन का मनोरंजन करती थी और आज भी जो इस पेशे को अपनाये हैं वे किसी मजबूरी वश ही ऐसा कर रही हैं किन्तु औरों की मजबूरी को दूर ही कर रही हैं उनके लिए भी तो ये फिल्मे ही कहती हैं -
''इससे आगे की अब दास्ताँ मुझसे सुन सुनके तेरी नज़र डबडबा जाएगी ,
बात अब तक जो तेरे दिल में ही थी मेरा दावा है होठों पे आ जाएगी ,
तू मसीहा मुहब्बत के मारों का है ,
हम तेरा नाम सुनके चले आये हैं ,
तू दवा दे हमें या तू दे दे ज़हर ,
......दे दुआएं तुझे उम्र भर के लिए .''
इसलिए अपमानित करना है तो उस भावना को करो जो इनके काम को गलत नज़रों से देख अपनी गलत इच्छाओं की पूर्ति चाहती है .अपमानित करना है तो उन लोगों को करो जो इन्हें गलत काम में धकेलते हैं और एक औरत को रंडी बनाकर इस्तेमाल करते हैं .
    नाम नहीं रखने हैं तो ऐसे लोगों के नामों पर मत रखो जो किसी की मेहनत को लज्जित करते हैं ,नाम नहीं रखने हैं तो ऐसे नामों पर मत रखो जो किसी की मेहनत का तिरस्कार करते हैं ,नाम नहीं रखने हैं तो ऐसे लोगों के नामों पर मत रखो जो अपराध की दलदल में गहराई तक धंसे हैं पेशेवर अपराधी हैं। 
   .शाहरुख़ सलमान ऐसे नाम हैं  जिन्हें हम महापुरुष की संज्ञा भले न दे सकते हों किन्तु महानायक अवश्य कह सकते हैं .ये वे कलाकार हैं जिन्होंने दुःख में किसी अपने का साथ न होने पर हमारा साथ निभाया है ,जिन्होंने न जाने कितने रोतों को हँसाया है और कितनों का जीवन जीने के लायक बनाया है न केवल फिल्मो के माध्यम से अपितु जनता के बीच स्वयं उपस्थित होकर भी इन्होने लोगों की मदद की है .हम क्या इतने गिर गए हैं कि इनसे केवल लेते लेते ही रहें इन्हें धन्यवाद् के प्रशंसा के दो शब्द भी न दे सकें .
    और धार्मिक मंच इस बात की इज़ाज़त नहीं देता कि मामूली प्रचार पाने के लिए स्वयं लोगों को जिस समय धर्म की अमूल्य शिक्षा ,जिससे वे अंजान हैं ,न देकर इन व्यर्थ की बातों को कहा जाये ,ये तो वाही बात हुई कि जैसे ''सावन  के अंधे को हरा ही हरा दिखाई देता है ''वैसे ही फिल्मों की चकाचौंध का अपना अंधापन ऐसे मंच पर फैला दिया जाये .
 जनप्रियता का कुछ नहीं बिगाड़ सकती और इसलिए ये कहते हैं -
''घर गिराने को जो फतह समझ बैठा है ,
उससे कहना मेरा मयार गिराके देख .
मुझको तारीख का एक खेल समझने वाला ,
मेरे क़दमों के निशाँ मिटाके देख .''

              शालिनी कौशिक 
                         [कौशल ]


शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

क्या ऐसे ही होती है ईद मुबारक ?

 क्या ऐसे ही होती है ईद मुबारक ?
पहले  कुछ समाचार दैनिक जागरण से साभार 

रोजे का असल मकसद स्वार्थ से मुक्ति है

The real motive is fast and free from selfishness
रमजान रहमतों का माह है। हजरत अबू हुरैरा ने पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से हदीस उद्धृत की है। जिसका भावार्थ यह है कि उन्होंने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना है कि जब रमजान शुरू होता है तो जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बांध दिया जाता है। (पुस्तक सही बुखारी पृष्ठ 255) जन्नत के द... और पढ़ें »

फितरा निकाले बिन अधूरा है रोजा

Fitra is extracted bin incomplete Rosa
रमजान खत्म होने में कुछ समय बाकी है, रोजेदारों के घरों में ईद की तैयारी शुरू हो चुकी है। रोजेदारों में ईद आने की खुशियां हैं और रमजान खत्म होने की मायूसी। बचे समय में रोजेदार दान-पुण्य और अल्लाह की इबादत में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। मस्जिदों में नमाजियों की संख्या बढ़ रही है। हर कोई कुरान शरीफ का पा... और पढ़ें »

ईद-उल-फित्र: मानवता का त्योहार

Eid - ul - Fitr: Festival of Humanity
मानवता का संदेश देने वाला ईद-उल-फित्र का त्योहार सभी को समान समझने और गरीबों को खुशियां देने के लिए हमें प्रेरित करता है.. ईद-उल-फित्र बहुत-सी खुशियों का संग्रह है। मान्यता के अनुसार, रमजान के पवित्र माह में जो लोग अपने सद्व्यवहार और नेकी-भलाई की राह पर चलते हुए रोजा के दौर... और पढ़ें »
Updated on: Thu, 08 Aug 2013 12:14 PM (IST)
  
         

ईद: खुदा से मोहब्बत के इजहार का जरिया

eid: means of expression of love for God
ईद उल-अजहा सचाई पर कुर्बान होने की नीयत करने और खुदा से मोहब्बत के इजहार का जरिया है। इस मौके पर लोग खुदा से अपने लगाव और सचाई की लगन का खुलकर एलान करते हैं। यह त्यौहार बंदों को हर आजमाइश पर खरा उतरने की प्रेरणा देता है। जामिया मिलिया इस्लामिया के इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रोफेसर जुनैद हारिस कहते हैं, ईद उल-अजहा क... और पढ़ें »
इस सबके साथ साथ रमजान इस्लाम धर्म का इबादत का पवित्र माह जहाँ तक मैं जानती हूँ ,रमजान माह में सभी रोजेदारों को ख़ुदा में ध्यान लगाने की शिक्षा दी जाती है .पूरा एक महीना सभी रोजेदार सुबह से शाम तक न कुछ खाते हैं न पीते  है शाम को भी स्वयं कुछ खाने से  पहले  मस्जिदों में गरीबों के  लिए भोजन भेजते  हैं .इन दिनों इनके यहाँ शादी ब्याह जैसे  आयोजन नहीं होते और ये भी है कि यदि  ईद एक दिन पहले हो गयी तो बाद में वह एक रोज़ा रखना होता  है .
     किन्तु आज ये आस्था कुछ डगमगा रही है और इसका साफ असर आज की परिस्थितयों में दिखाई दे रहा है और वह है इस समुदाय का भौतिकवाद की ओर इस कदर आकर्षित होना कि भौतिकवाद आस्था से ऊपर स्थान बनाता लगता है .रमजान के आरम्भ होते ही बाज़ारों में इस कदर चहल पहल दिखाई देती है कि मन करता है कि अपना एक महीने का सामान पहले ही खरीदकर रख लिया जाये और यह चहलपहल विशेषकर चप्पलों -जूतों की दुकान पर व् श्रृंगार के सामान की दुकान पर ही मुख्यतया होती है .जानकारी की तो पता चलता है कि चप्पलों के प्रति इनका प्रेम कुछ ज्यादा ही होता है और अपने हाथ में पैसे आयें या कोई भी आयोजन हो चाहे अपने पास चप्पलों से भरी अलमारी हो पर सभी को जयललिता और मायावती जी की तरह नयी चप्पल ज़रूर खरीदनी हैं .इसके साथ ही पर्स हर लड़की को चाहे वह एक दो साल की ही क्यों न हो उसके हाथों में पर्स ज़रूर लटकाना है ,लिपस्टिक ,बिंदी छोड़ी ,चुटीले सब नया देखने से ही लगता है कि शायद बहुत व्यर्थ की कमाई लिए फिर रही हैं जबकि वह सारी कमाई गाढ़ी मेहनत की होती है और ये सब सामान चार दिन की चांदनी से ज्यादा कुछ नहीं होता  क्या मेहनत का पैसा इस तरह खर्च करना लुटाना नहीं कहा जायेगा ?

क्या इस तरह के कार्य ही इनके त्यौहार का उल्लास प्रकट करते हैं ?क्या इनके धर्म गुरुओं का कर्तव्य नहीं बनता कि वे इन्हें सही राह दिखाएँ और पैसा जो ये साल भर की मेहनत से कमाते हैं उसका सदुपयोग बता जीवन संवारने की दिशा में इनके कदम बढ़ाएं ?ये तो अधिकांशतया अनपढ़ ही हैं जो ऐसे कार्यों में आगे बढ़ रहे हैं और इस तरह से त्यौहार की ख़ुशी मनाने की सोच रहे हैं लेकिन इनके धर्मगुरु तो शिक्षित हैं समझदार हैं और अपने इस समुदाय पर प्रभावी असर भी रखते हैं .वे चाहे तो इनमे ज्ञान का उजाला भर इन्हें सही दिशा दे सकते हैं .वे इन्हें बता सकते हैं कि ये दिखावटी श्रंगारिक वस्तुएं महज दिखावे और दुकानदारों की कमाई का जरिया भर हैं जिसके द्वारा ये तुम सबके अन्धानुकरण की प्रवर्ति देखकर १ के ४ कमा रहे हैं और तुम इसके फेर में पड़कर मेहनत की कमाई को उस दिखावे पर लुटा रहे हो जिसका त्यौहार के उल्लास से कोई लेना देना नहीं है .वास्तव में इदुल-फितर का वास्तविक उद्देश्य जन जन के उल्लास व् भाईचारे से है और इसके लिए किसी दिखावे की या फिर घर फूंक तमाशे की कभी ज़रुरत नहीं पड़ती .
World immersed in holy Ramzan fervour
Photo
 ईद तो वही है जो एक बालक के चेहरे पर मुस्कान ला दे एक बुझते हुए चिराग में रौशनी जला दे भाई को भाई के गले मिला दे .और ईद वही है जो नजीर अकबराबादी ने अपनी प्रस्तुत ग़ज़ल में कही है  [दैनिक जागरण से साभार ]
ईद उल फ़ितर
है आबिदों को त'अत-ओ-तजरीद की ख़ुशी
और ज़ाहिदों को ज़ुहद की तमहीद की ख़ुशी
रिंद आशिक़ों को है कई उम्मीद की ख़ुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी
ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी
-नज़ीर अकबराबादी  


-शालिनी कौशिक  
     [कौशल ]

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारी...