शनिवार, 31 मई 2014

मेक-अप से बिगाड़ करती महिलाएं


 

कवि शायर कह कह कर मर गए-
''इस सादगी पे कौन न मर जाये ए-खुदा,''
''न कजरे की धार,न मोतियों के हार,
न कोई किया सिंगार फिर भी कितनी सुन्दर हो,तुम कितनी सुन्दर हो.''
पर क्या करें आज की महिलाओं  के दिमाग का जो बाहरी सुन्दरता  को ही सबसे ज्यादा महत्व देता रहा है और अपने शरीर का नुकसान तो करता ही है साथ ही घर का बजट  भी बिगाड़ता है.लन्दन में किये गए एक सर्वे के मुताबिक ''एक महिला अपने पूरे जीवन में औसतन एक लाख पौंड यानी तकरीबन ७२ लाख रूपए का मेकअप बिल का भुगतान कर देती है  .इसके मुताबिक १६ से ६५ वर्ष तक की उम्र की महिला ४० पौंड यानी लगभग तीन हज़ार रूपए प्रति सप्ताह अपने मेकअप पर खर्च करती हैं .दो हज़ार से अधिक महिलाओं के सर्वे में आधी महिलाओं का कहना था कि'' बिना मेकअप के उनके बॉय  फ्रैंड उन्हें पसंद ही नहीं करते हैं .''
''दो तिहाई का कहना है कि उनके मेकअप किट की कीमत ४० हज़ार रूपए है .''
''ब्रिटेन की महिलाओं के सर्वे में ५६ प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि १५०० से २००० रूपए का मस्कारा खरीदने में ज्यादा नहीं सोचती हैं .''
ये तो चंद आंकड़े हैं जो इस तरह के सर्वे प्रस्तुत करते हैं लेकिन एक भेडचाल  तो हम   आये दिन अपने आस पास ही देखते रहते हैं वो ये कि महिलाएं इन्सान बन कर नहीं बल्कि प्रोडक्ट  बन कर ज्यादा रहती हैं .और बात बात में महंगाई का रोना रोने वाली ये महिलाएं कितना ही महंगा उत्पाद हो खरीदने से झिझकती नही हैं .और जहाँ तक आज की युवतियों की कहें कि उन्हें बॉय फ्रैंड कि वजह से मेकअप करना  पड़ता  है तो ये भी उनकी भूल ही कही जाएगी .वे नहीं जानती सादगी की कीमत-
''इस सादगी पे कौन मर  जाये ए खुदा .''
और फिर ये तो इन मेकअप की मारी महिलाओं को सोचना  ही होगा कि आज जितनी बीमारियाँ  महिलाओं में फ़ैल रही हैं उसका एक बड़ा कारण इनके मेकअप के सामान हैं .और एक शेर यदि वे ध्यान दें तो शायद इस और कुछ प्रमुखता कम हो सकती है.राम प्रकाश राकेश कहते हैं-
गागर छलका करती सागर नहीं छलकते देखे,
नकली कांच झलकता अक्स  हीरे नहीं झलकते देखे,
कांटे सदा चुभन ही देते,अक्स  फूल महकते देखे.
तो फिर क्या सोचना फूल बनने की चाह में वे कांटे क्यों बनी जा रही हैं .कुछ सोचें और इन्सान बने प्रोडक्ट नहीं.
शालिनी कौशिक 
     [कौशल ]

बुधवार, 28 मई 2014

पराया घर गन्दा कहने से अपना घर स्वच्छ नहीं हो जाता

उमा भारती का कांग्रेस पर वारSonia Gandhi (cropped).jpg

Uma Bharti Defends Smriti Irani, Asks, 'What is Sonia Gandhi's Qualification'? 



नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इस बार शासन सत्ता संभाली किन्तु जहाँ सत्ता है वहां विवाद भी हैं और विवाद आरम्भ हो गए .मानव संसाधन विकास मंत्रालय का प्रभार स्मृति ईरानी को सौंपा जाना इस विवाद का जन्मदाता है .विपक्षी दल कॉंग्रेस के अजय माकन कहते  है कि शिक्षा मंत्री ग्रेजुएट तक नहीं है तो भाजपा बिफर पड़ती है और सबसे ज्यादा बिफरती हैं उमा भारती जिन्हें हर बात के लिए सोनिया गांधी को घेरना होता है किन्तु हर बार की तरह इस बार भी वे सोनिया गांधी से मात खायेंगी क्योंकि सोनिया गांधी ऐसे विवादास्पद और कुतुर्क करने वाले मुद्दों को कभी भी तरजीह नहीं देती और 'एक चुप सौ को हरावे '' की नीति पर ही चलती हैं किन्तु उमा भारती को तो ये जानना ही होगा भले ही सोनिया जवाब दें या न दें कि वे यूपीए की चेयरपर्सन रही हैं न कि केंद्र सरकार के किसी विभाग की मंत्री और आज तक इस तरह के गठबंधनों के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं की गयी है यदि की जाती तब की बात अलग होती और तब शायद एक बार फिर उमा भारती को गंजे होने की धमकी देकर सोनिया गांधी को रोकना होता और सोनिया जी द्वारा उनके बालों को बचाने के लिए ये पद भी छोड़ने का एक बहाना मिल जाता प्रधानमंत्री पद को छोड़ने की तरह ..
       आज सभी जानते हैं कि एक स्कूल का प्रबंधक तो अनपढ़ भी हो सकता है किन्तु स्कूल में पढ़ाने वाले के लिए अच्छी शिक्षा या यूँ कहें कि उच्च शिक्षा ग्रहण करना ज़रूरी है और ऐसे में स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद दिया जाना विवाद तो पैदा करेगा ही साथ ही उनकी धोखाधड़ी की नियत भी .२००९ के चुनाव में वे स्वयं को शपथ लेकर बी.ए.बताती हैं और २०१४ में शपथ लेकर बी.कॉम.हालाँकि यहाँ मुद्दा केवल ये है कि वे उच्च शिक्षित नहीं हैं और उन्हें शिक्षा मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद देना भाजपा की मजबूरी क्यूँ बन गयी ?जबकि हमारे देश में आज उच्च शिक्षा के लिए उपयुक्त माहौल है और भाजपा में मुरली मनोहर जोशी जी जैसे  काबिल व् हर पद के योग्य नेता बगैर पोर्टफोलियो के मौजूद हैं तब स्मृति ईरानी जैसे कम शिक्षित को शिक्षा मंत्री क्यूँ बनाया गया ?अगर उन्हें कोई और विभाग दिया जाता तो संभव था कि कोई विवाद न होता किन्तु शिक्षा विभाग में मंत्री ही कम शिक्षित -यह तो विवाद का विषय सारी जनता में है इसके लिए सोनिया गांधी की शिक्षा पर ही क्यूँ सवाल उठाती हैं उमा भारती ?सारी जनता की ही शिक्षा को विवादों के घेरे में क्यूँ नहीं ले आती हैं उमा भारती ?
       यूँ बात बात में सोनिया गांधी जी को घसीटकर वे अपने गलत कार्यों को और कुतर्कों को सही साबित नहीं कर सकते क्योंकि राहुल सोनिया का विरोध व् अपमान उन्हें सत्ता दिला सकता है ,स्मृति को मंत्री पद दिला सकता है किन्तु जनता के मन में उठते सवाल को नहीं दबा सकता ,योग्यता को नकारकर अयोग्यता को सिर पर चढाने की इज़ाज़त नहीं दे सकता .ये तो उन्हें समझना ही होगा कि पराये घर को गन्दा कहने से अपना घर साफ नहीं हो जाता बल्कि उसके लिए अपना घर ही साफ़ करना पड़ता है .अब यहाँ तो स्मृति ईरानी की कम शिक्षा की बात को दबाने के लिए सोनिया गांधी की शिक्षा की बात उठाना तो क़तील 'शिफ़ाई 'के शब्दों में उमा भारती के मन की व्यथा को कुछ यूँ व्यक्त कर रहा है -
 ''यूँ तसल्ली दे रहा हूँ मैं दिल-बीमार को ,
  जिस तरह थामे कोई गिरती दीवार को .''

शालिनी कौशिक 
  [कौशल ]
      

मंगलवार, 27 मई 2014

बीवी -डिबली की लौ -एक लघु कथा




      औरत के नाम में संपत्ति लेने पर स्टाम्प शुल्क में कमी हो जाती है दामोदर ने ये सोचा और झोपडी में रह रही अपनी बीवी को गाड़ी में बैठाकर रजिस्ट्री कार्यालय ले गया और बीवी के नाम में नई कोठी का बैनामा ले लिया .
         दामोदर की नई कोठी में आज पार्टी थी .इसी शहर के ही नहीं बड़े-बड़े शहरों के बड़े-बड़े लोग इस भव्य शानदार पार्टी में मौजूद थे .शराब कॉफी सब चल रही थी तभी एक बोला ,''भई! ये कोठी तो दामोदर ने बीवी के नाम पर ली थी उसे नहीं बुलाया ?''...अरे ! उसके ऐसे भाग्य कहाँ जो दामोदर जैसे आत्ममुग्ध चतुर चालाक शिकारी के साथ रह सके,वह तो डिबली  की लौ है और इसलिए झोपडी में ही जलती है ''......रवि के ऐसा कहते ही सारे दोस्त ठहाका लगाकर हंस पड़े और दामोदर हाथ बांधे उनकी बात सुन मुस्कुराता रहा .

शालिनी कौशिक
 [कौशल ]

रविवार, 25 मई 2014

युगपुरुष पंडित जवाहरलाल नेहरू को शत-शत नमन


''सिमटे तो ऐसे सिमटे तुम 
           बंधे पाँखुरी में गुलाब की ,
  बिखरे तो ऐसे बिखरे तुम 
          खेत खेत की फसल हो गए .''
        मशहूर कवि भारत भूषण जी की ये पंक्तियाँ देश के प्रथम प्रधानमंत्री और उससे भी पहले देश के ह्रदय पर विराजने वाले ,देश के माथे पर मुकुट की भांति शोभायमान पंडित जवाहर लाल नेहरू जी को समर्पित हैं और दो पंक्तियों में ही नेहरू जी के व्यक्तित्व का व्यापक विश्लेषण हम जैसी आने वाली पीढ़ियों के समक्ष प्रस्तुत किया है जिससे हम आज के मिथ्यावादी स्वार्थ में डूबी हुई राजनेताओं की पंक्ति से उन्हें पृथक कर देश के एक ऐसे रत्न को जान सकें जिन्होंने देश और देश की जनता से मात्र ये आशा की थी कि-
''अगर मेरे बाद कुछ लोग मेरे बारे में सोचें तो मैं चाहूंगा कि वे कहें -वह एक ऐसा आदर्श था जो अपने पूरे दिल और दिमाग से हिन्दुस्तानियों से मुहब्बत करता था और हिंदुस्तानी भी उसकी कमियों को भूलकर उसको बेहद अज़हद मुहब्बत करते थे .''
      २७ मई १९६४ को देश को असहनीय दुःख देते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू स्वर्ग सिधार गए .देश असहनीय दुःख में डूब गया .पुर्तगाल को छोड़कर विश्व का कोई राष्ट ऐसा नहीं था जहाँ पंडित जी की मृत्यु पर शोक प्रगट न किया गया हो .संसार के समस्त राष्ट्राध्यक्षों ने श्रीमती गांधी तथा राष्ट्रपति को संवेदना सन्देश भेजे .विश्व के राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने उनकी शव यात्रा में भाग लिया और उनके अंतिम दर्शन करके पुष्पांजलि समर्पित की. विश्व उन्हें खोने के कारण व्याकुल था किन्तु उनसे बहुत पहले व्याकुल थे पंडित जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रति अपने कर्तव्यों और वादों को पूर्ण करने के लिए .उनकी दिनचर्या जो कुछ दिनों से परिवर्तित हो गयी थी उससे ही लगने लगा था कि उन्हें अपने जीवन का अंत कुछ अनुभव होने लगा था 
इसी कारण से उन्होंने और भी अधिक कार्य करना आरम्भ कर दिया था .पिछले एक वर्ष से उन्होंने अपनी मेज पर ,अपने हाथ से ,पैड पर अमेरिकी कवि रॉबर्ट फ्रास्ट की निम्नलिखित कविता लिख रखी थी .यह पैड उनकी मेज पर एक साल से रखा रहता था जिस पर वे काम करते थे .इन पंक्तियों से उन्हें प्रेरणा मिलती थी .पंक्तियों का अनुवाद इस प्रकार है -
    ''जंगल प्यारे हैं ,घनेरे और अँधेरे !
     लेकिन मैंने वायदे किये थे ,जो पूरे करने हैं .
     और अभी मीलों दूर का ,सफर करना है .
     दूर जाना है ,सोने से पहले ,दूर मीलों दूर .''
एक भावुक और एक पत्नीनिष्ठ की भांति श्री नेहरू ने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कमला नेहरू की भस्म जिनका देहावसान १९३६ में हुआ था ,एक मंजूषा [डिबिया ]में युगों से संजों कर रखी थी और दूसरी में मातृभक्त पुत्र ने अपनी माँ स्वरुप रानी की .उनकी अंतिम स्मृति पंडित जी के साथ साथ गंगा में विसर्जित की गयी,प्रयागराज के संगम पर यह भी अपूर्व संगम था.
 स्वर्गीय नेहरू को भारत कितना प्रिय था और वे भारतवासियों से कितना स्नेह करते थे ,यह उनकी लिखी हुई अद्वित्य एवं आदर्श वसीयत से स्पष्ट हो जाता है .श्री नेहरू ने अपनी वसीयत में गंगा को भारत की सभ्यता और संस्कृति का प्रतिक बताया है .वे जब तक जीवित रहे ,उन्होंने प्रत्येक क्षण भारत की सेवा और उन्नति के अथक प्रयासों में ही व्यतीत किया .मृत्यु के बाद भी वे इसकी मिटटी के कण-कण में मिल जाना चाहते थे .उनकी इच्छा थी कि उनके शरीर की रख भी व्यर्थ न जाये ,उसका भी भारत के खेतों में खाद रूप में उपयोग हो और उसी का अंग बन जाये .१२ जून १९६४ को पंडित नेहरू की भस्म उनकी अंतिम इच्छानुसार उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक खेतों ,खलिहानों ,पहाड़ियों और घाटियों पर बिखेर दी गयी और वह भारत के कण कण का अभिन्न अंग बन गयी .यह कार्य भारतीय वायु सेना को सौंपा गया था .भस्म बिखेरने के लिए २० स्थान निश्चित किये गए थे .इन स्थानों पर विमानों और हेलीकॉप्टरों द्वारा प्रधानमंत्री का पवित्र भस्म बिखेर दिया गया .उनकी भस्म को कश्मीर से पहलगाम ले जाने वाले वायुयान में श्रीमती इंदिरा गांधी थी और अहमदनगर के किले के पास बिखेरने वाले विमान में श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित .
जवाहरलाल नेहरू
[[विकिपीडिया से साभार] ----------
जवाहर लाल नेहरू का जन्म इलाहाबाद में एक धनाढ्य वकील मोतीलाल नेहरू के घर हुआ था। उनकी माँ का नाम स्वरूप रानी नेहरू था। वह मोतीलाल नेहरू के इकलौते पुत्र थे। इनके अलावा मोती लाल नेहरू को तीन पुत्रियां थीं। नेहरू कश्मीरी वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे।
जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया के कुछ बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से, और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेजलंदन से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। इंग्लैंडमें उन्होंने सात साल व्यतीत किए जिसमें वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया।
जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए।
नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया।
1926 से 1928 तक, जवाहर लाल ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में सेवा की। 1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया। उस सत्र में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया, जबकि मोतीलाल नेहरू और अन्य नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही प्रभुत्व सम्पन्न राज्य का दर्जा पाने की मांग का समर्थन किया। मुद्दे को हल करने के लिए, गांधी ने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि ब्रिटेन को भारत के राज्य का दर्जा देने के लिए दो साल का समय दिया जाएगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक राष्ट्रीय संघर्ष शुरू करेगी। नेहरू और बोस ने मांग की कि इस समय को कम कर के एक साल कर दिया जाए। ब्रिटिश सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।
दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें 'पूर्ण स्वराज्य' की मांग की गई। 26 जनवरी, 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन खासा सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.
जब ब्रिटिश सरकार ने भारत अधिनियम 1935 प्रख्यापित किया तब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। नेहरू चुनाव के बाहर रहे लेकिन ज़ोरों के साथ पार्टी के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। कांग्रेस ने लगभग हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केन्द्रीय असेंबली में सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की।
नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936 और 1937 में चुने गए थे। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्वपूर्ण भागीदारी की।[विकिपीडिया से साभार] 
पंडित नेहरू पर अंग्रेजीदां होने का आरोप लगाया जाता है जबकि अंगेज तो स्वयं उनसे परेशान थे इसीलिए कलकत्ते में राजद्रोहात्मक भाषण देने के अपराध में इन्हें दो वर्ष की जेल यात्रा मिली और सन १९३९ में द्वित्य विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने पर जब भारतीयों को सलाह के बिना ही अंग्रेजों ने भारतवर्ष को युद्ध के लिए सम्मिलित राष्ट्र घोषित कर दिया तब पंडित नेहरू ने सरकार की इस नीति की कटु आलोचना की और समस्त देश में इसके विरुद्ध आंदोलन प्रारम्भ हो गया .जनता ने जवाहर के स्वर में स्वर मिलाया फलस्वरूप अंग्रेजों ने इन्हें पुनः राजद्रोह के अपराध में चार वर्ष के लिए कारावास का दंड दे दिया .भीषण हाहाकार के पश्चात १५ जून १९४५ को पंडित नेहरू को छोड़ दिया गया यह उनकी नवी जेल यात्रा थी और यह वह व्यक्तित्व था जिस पर आज अंग्रेजीदां होने का आरोप लगाने वाले यह भूल जाते हैं कि यह हमारे धर्मग्रंथों में ही कहा गयाहै कि अच्छी शिक्षा कहीं से भी मिले ग्रहण कर लेनी चाहिए और नेहरू जी को अंग्रेजों का रहन एक ढंग पसंद आता था और उन्होंने उसे ही अपनाया था न कि अंग्रेजों को और यह उनकी स्वतंत्रता संग्राम में अपने जीवन की सभी सुख सुविधाओं को दी गयी आहुतियों से स्पष्ट हो ही जाता है .
                   श्री नेहरू के निधन से राष्ट्र को जो क्षति हुई है उसकी पूर्ति युगों तक भी न हो सकेगी .मानव कल्याण के लिए यदा कदा उत्पन्न होने वाले ये महामानव केवल और केवल जनता की सेवा करने ही आये थे .वे सफल साहित्यकार थे ,दूरदर्शी थी ,कूटनीतिज्ञ थे ,तत्वदर्शी साधक थे ,मर्मज्ञ राष्टचिंतक थे ,युगपुरुष दासता के मुक्ति दाता थे और थे युग निर्माता ,युग सृष्टा .उनके जीवन के प्रमुख साथी थे अभय और साहस .वे चाहते तो सफल बैरिस्टर बनकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बन सकते थे ,वे चाहते तो संसार के प्रसिद्द लेखक हो सकते थे भारत एक खोज इन्ही की पुस्तक ''दी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया '' पर आधारित है और जेल से लिखे गए इनके ''पुत्री के नाम पिता के पात्र '' भी विश्वविख्यात पुस्तक हैं .वे चाहते तो धनी  पिता के उत्तराधिकारी के रूप में आनंद भवन में विलास और विनोद कर सकते थे ,वे चाहते तो तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से सझौता करके उच्च पद प्राप्त कर सकते थे परन्तु उन्होंने सब सुख सुविधाओं को एक तरफ कर दिया और जनता की सेवा को ही अपना जीवन धर्म बनाया आज उनका निवास स्थान आनंद भवन सरकरी भवन है और जनता के लिए खुला है .निरन्तर तीस वर्षों तक वे ब्रिटिश शासन से जूझते रहे ,जेलों में अनंत यातनाएं सही अपनी आँखों के आगे अपने घर और वैभव को बर्बाद होते हुए देखा किन्तु अपने पुनीत पथ का परित्याग नहीं किया तभी तो देश का बच्चा बच्चा भी ''जवाहर लाल की जय''बोलने लगा था .उन्हें ''दासता  के मुक्ति दाता ''आधुनिक भारत के निर्माता ''कहा गया नेहरू जी ने अपने १७ वर्ष के प्रधानमंत्रित्व काल में अपनी शक्ति और सामर्थ्य से भी अधिक भारत की सर्वांगीण उन्नति के लिए कार्य किया इतिहास इसे कभी नहीं भुला सकता .नेहरू कहा करते थे -
  ''मुझे इसकी कतई चिंता नहीं है कि मेरे बाद दूसरे लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे .मेरे लिए तो बस इतना ही काफी है कि मैंने अपने को ,अपनी ताकत और क्षमता को भारत की सेवा में खपा दिया .''
      और नेहरू जी के चले जाने के ५० वर्ष बाद भी हम आज भी उन्हें उनके कार्यों और समर्पित देश व् जनसेवा के कारण अपने बीच महसूस करते हैं और कवि भारत भूषण जी की उपरोक्त कविता की निम्न पक्तियों को दोहराते हुए उन्हें शत-शत नमन करते हैं -
  ''जब जब गेंहू धान पकेंगें 
      तुम किसान की हंसी बनोगे ,
तीरथ तीरथ लहर लहर पर 
    किरणों से जय हिन्द लिखोगे .''
....................................
शालिनी कौशिक 
    [कौशल ]

शनिवार, 24 मई 2014

ये प्रेम जगा है .

 
ज़रुरत पड़ी तो चले आये मिलने
न फ़ुरसत थी पहले
न चाहत थी जानें
हैं किस हाल में मेरे अपने वहां पर
खिसकने लगी जब से पैरों की धरती
उडी सिर के ऊपर से सारी छतें ही
हड़पकर हकों को ये दूजे के बैठे
झपटने लगे इनसे भी अब कोई
किया जो इन्होने वो मिलने लगा है
तो अपनों की खातिर ये प्रेम जगा है .
........................................
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 18 मई 2014

लाभ के पद पर बोले मोदी सरकार


    ''लाभ का पद '' हमेशा से एक विवाद का विषय रहा है .इस पदावली की संविधान में या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१ में कोई परिभाषा नहीं दी गयी है .न्यायिक निर्णयों से ही लाभ के पद के अर्थ को समझा जा सकता है .देवरस बनाम केशव ए.आई.आर.१९५८ बम्बई ३१७ में कहा गया है कि ''लाभ के पद से तात्पर्य ऐसे पद से है जिससे लाभ मिल सकता हो या जिससे व्यक्ति युक्तियुक्त रूप से लाभ प्राप्त करने की आशा कर सकता है .''

       और इस सीमा में ये विशेष रूप से सरकारी नौकरी करने वाले कर्मचारी को ही लेकर आते हैं क्योंकि लाभ के पद में लाभ तत्व ही पर्याप्त नहीं मानते हैं वरन इसके लिए यह भी आवश्यक मानते हैं कि वह लाभ का पद भारत सरकार के या राज्य सरकार के अधीन हो .कोई लाभ का पद सरकार के अधीन है या नहीं इसके निर्धारण की निम्नलिखित कसौटियां हैं -

 [१]-क्या सरकार को नियुक्ति का अधिकार है ?

 [२]-क्या पद धारक को उसके पद से हटाने या पदमुक्त करने का सरकार को अधिकार है ?

 [३]-क्या पद धारक को सरकार वेतन देती है ?

 [४]-पद धारक के कार्य क्या हैं और क्या वह उन कार्यों को सरकार के लिए करता है ?

 [५]-क्या सरकार उसके कार्यों के तरीके पर नियंत्रण रखती है ?

        और यह समस्त कसौटियां हमारे कानून बनाने वाले के नजरिये से मात्र एक सरकारी सेवक ही पूर्ण करता है .उसकी नियुक्ति सरकार करती है ,सरकार को ही उसे पद से हटाने या पदमुक्त करने का अधिकार है ,वही उसे वेतन देती है ,वह सरकार के लिए ही कार्य करता है और सरकार उसके कार्यों पर नियंत्रण रखती है किन्तु अब्दुल सकूर बनाम रिसाल चन्द्र ए.आई.आर.१९५८ एस.सी.५२ में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है कि ''यह आवश्यक नहीं है कि उक्त सभी तत्व एक साथ मौजूद हों यह भी आवश्यक नहीं है कि वेतन धनराशि सदैव सरकारी खजाने से ही दी जाये .''

     और इस बात को मद्देनज़र रखते हैं तो हमारे सांसद और विधायक भी इस श्रेणी में आ जाते हैं जिनको सरकार द्वारा अब विभिन्न भत्तों व् सुविधाओं के साथ मासिक वेतन भी दिया जाता है .

Cost to Country of a MP 

Salary of MLA

Salaries of MLA are decided by the states. There is wide variation in MLA salaries across state assemblies. Other than salary, MLAs also get similar facilities like MPs – daily allowance, constituency allowance, office expenses allowance, provisions for accommodation, travel etc. As is the case with salaries, these too vary across states.

lucknow The Uttar Pradesh government has announced a raise in the salary and perks of legislators, Assembly speaker, Council chairman and ministers.

"The government has decided to hike the salary and perks of members in both the Houses to 
Rs. 50,000 per month from existing Rs. 30,000," Chief Minister Mayawati announced in the Legislative Assembly and Legislative Council on Monday.

Till now, an MLA or MLC was getting 
Rs. 3,000 as monthly salary, Rs. 15,000 constituency allowance, Rs.6,000 medical allowance and Rs. 6,000 as secretary allowance.

"Now the members will get monthly salary of 
Rs. 8,000, besides 22,000 as constituency allowance, Rs.10,000 medical allowance and Rs. 10,000 secretary allowance," she said. ]

इस सबके बावजूद इन्हें यदि कहीं सांसद या विधायक रहते हुए चुनाव लड़ना हो तो लड़ने की इज़ाज़त है ,इन्हें चुनाव लड़ने से पहले अपनी मौजूदा सीट से इस्तीफा नहीं देना होता ,इन्हें यदि कोई सीट छोड़नी भी हो तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१ के अनुसार चुनाव परिणाम घोषणा के १० या १४ दिन में छोड़नी होती है जबकि एक सरकारी सेवक को यदि कहीं चुनाव लड़ना हो तो उसे नामांकन पत्र भरने से पूर्व ही अपनी नौकरी छोड़नी होती है जबकि मात्र एक छोटी सी तनख्वाह के उसे अन्य ऐसा कुछ नहीं मिलता जो लाभ के पद जैसी ऐश्वर्यपूर्ण परिभाषा  में सम्मिलित किया जा सके .
       गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री पद के लिए सांसद का चुनाव लड़ा और दो-दो जगह से लड़ा और इस कानून का फायदा उठाते हुए उन्होंने अभी तक भी गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया .साफ है प्रधानमंत्री बनने तक वे गुजरात के मुख्यमंत्री रहेंगें और उसके नाते वहां के विधायक व् मुख्यमंत्री होने के नाते प्राप्त सभी वेतन ,भत्तों व् सुविधाओं के हक़दार -क्या ये लाभ के पद में नहीं आता और नहीं आता तो क्यूँ नहीं आता ? एक सरकारी सेवक को तो ऐसा कुछ भी नहीं मिलता जो इन्हें मिलता है .
      भाजपा के उत्तर प्रदेश में ४७ विधायकों में से १२ विधायक विधायक रहते हुए भी सांसद का चुनाव लड़े और जीत गए अब वे विधायक के वेतन भत्ते व् सुविधाएँ तब छोडेंगें जब सांसद के वेतन भत्ते व् सुविधाएँ लेने लगेंगें क्यूँ इस स्थिति को लाभ के पद में नहीं सम्मिलित नहीं किया जाता जबकि वे भी वेतन  पाते हैं ? क्यूँ उनके कार्य को सरकार के लिए काम नहीं माना जाता जबकि जिस जनता के लिए वे काम करते हैं वह लोकतंत्र की परिभाषा के अनुसार -''जनता की ,जनता के लिए .जनता के द्वारा सरकार है .''वास्तविक सरकार है ?क्यूँ फिर सरकारी सेवक को ही नौकरी छोड़नी पड़ती है ?जबकि चुनाव जीतना या न जीतना भविष्य के गर्भ में होता है और ऐसा  न हो पाने पर उसे नौकरी भी खोने का डर होने के कारणवह लोकतंत्र में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ भागीदारी नहीं निभा पाता जबकि भारतीय संविधान उसे विभिन्न तरह की स्वतंत्रताएं देता है किन्तु जिस तरह से वह अपनी भागीदारी द्वारा लोकतंत्र में अपने दायित्व का सही रूप में निर्वहन कर सकता है उससे ही उसे इस तरह से रोक दिया गया है .उसे भी तो चुनावों में भागीदारी का अवसर दिया जा सकता है भले ही हमारे सांसदों की तरह निर्बाधित रूप से न दी जाये किन्तु चुनाव के समय अवैतनिक अवकाश पर रखकर उसे चुनाव बाद की स्थिति के लिए निश्चिन्त रखकर चुनाव में भागीदारी का अवसर दिया जा सकता है बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे सांसदों व् विधायकों को वेतन ,आदि सुविधाएँ जारी रखते हुए सीट न छोड़ते हुए चुनाव लड़ने का मौका दिया जाता है .
        आज तक की सरकारों ने आम जनता से अपने को ऊपर रखते हुए जिस संविधान को अपने हित में ढाला है आशा है पहली बार पूर्ण बहुमत पाने वाली भाजपा की मोदी सरकार ऐसा नहीं करेगी और लाभ के पद की नयी परिभाषा गढ़ते हुए आम जनता के लोकतंत्र के इस पर्व में भागीदारी का पथ प्रशस्त करेगी .

शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]


शनिवार, 17 मई 2014

दहेज़ :इकलौती पुत्री की आग की सेज


 दहेज़ :इकलौती पुत्री की आग की सेज
 एक ऐसा जीवन जिसमे निरंतर कंटीले पथ पर चलना और वो भी नंगे पैर सोचिये कितना कठिन होगा पर बेटी ऐसे ही जीवन के साथ इस धरती पर आती है .बहुत कम ही माँ-बाप के मुख ऐसे होते होंगे जो ''बेटी पैदा हुई है ,या लक्ष्मी घर आई है ''सुनकर खिल उठते हों .
                 'पैदा हुई है बेटी खबर माँ-बाप ने सुनी ,
                उम्मीदों का बवंडर उसी पल में थम गया .''

बचपन से लेकर बड़े हों तक बेटी को अपना घर शायद ही कभी अपना लगता हो क्योंकि बात बात में उसे ''पराया धन ''व् ''दूसरे  घर जाएगी तो क्या ऐसे लच्छन [लक्षण ]लेकर जाएगी ''जैसी उक्तियों से संबोधित कर उसके उत्साह को ठंडा कर दिया जाता है .ऐसा नहीं है कि उसे माँ-बाप के घर में खुशियाँ नहीं मिलती ,मिलती हैं ,बहुत मिलती हैं किन्तु ''पराया धन '' या ''माँ-बाप पर बौझ '' ऐसे कटाक्ष हैं जो उसके कोमल मन को तार तार कर देते  हैं .ऐसे में जिंदगी गुज़ारते गुज़ारते जब एक बेटी और विशेष रूप से इकलौती बेटी का ससुराल में पदार्पण होता है तब उसके जीवन में और अधिकांशतया  इकलौती पुत्री के जीवन में उस दौर की शुरुआत होती है जिसे हम अग्नि-परीक्षा कह सकते हैं .
               एक तो पहले ही बेटे के परिवार वाले बेटे पर जन्म से लेकर उसके विवाह तक पर किया गया खर्च बेटी वाले से वसूलना चाहते हैं उस पर यदि बेटी इकलौती हो तब तो उनकी यही सोच हो जाती है कि वे अपना पेट तक काटकर उन्हें दे दें .इकलौती बेटी को बहू बनाने  वाले एक परिवार के  सामने जब बेटी के पिता के पास किसी ज़मीन के ६ लाख रूपए आये तो उनके लालची मन को पहले तो ये हुआ कि ये  अपनी बेटी को स्वयं देगा और जब उन्होंने कुछ समय देखा कि बेटी को उसमे से कुछ नहीं दिया तो कुछ समय में ही उन्होंने अपनी बहू को परेशान करना शुरू कर दिया.हद तो यह कि बहू के लिए अपने बेटे से कहा ''कि इसे एक बच्चा गोद में व् एक पेट में डालकर इसके बाप के घर भेज दे .''उनके मन कि यदि कहूं तो यही थी कि बेटी का होना इतना बड़ा अपराध था जो उसके मायके वालों ने किया था कि अब बेटी की शादी के बाद वे पिता ,माँ व् भाई बस बेटी के ससुराल की ख़ुशी ही देख सकते थे और वह भी अपना सर्वस्व अर्पण करके.
     एक मामले में सात सात भाइयों की अकेली बहन को दहेज़ की मांग के कारण बेटे के पास न भेजकर सास ने  अपनी ही सेवा में रखा जबकि सास की  ऐसी कोई स्थिति  नहीं थी कि उसे सेवा करवाने की आवश्यकता हो.ऐसा नहीं कि इकलौती बेटी के साथ अन्याय केवल इसी हद तक सीमित रहता हो बेटे वालों की भूख बार बार शांत करने के बावजूद बेटी के विवाह में १२ लाख रूपए जेवर और विवाह के बाद बेटी की ख़ुशी के लिए फ्लैट देने के बावजूद इकलौती बेटी को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझा जाता है और उच्च शिक्षित होते हुए भी उसके माँ-बाप ससुराल वालों के आगे लाचार से फिरते हैं और उन्हें बेटी के साथ दरिंदगी का पूरा अवसर देते हैं और ये दरिंदगी इतनी हद तक भी बढ़ जाती है कि या तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है या वह स्वयं ही मौत को गले लगा लेती है क्योंकि एक गुनाह तो उसके माँ-बाप का है कि उन्होंने बेटी पैदा की और दूसरा गुनाह जो कि सबसे बड़ा है कि वह ही वह बेटी है.
                 इस तरह माँ-बाप के घर नाजुक कली से फूल बनकर पली-बढ़ी इकलौती बेटी जिसे इकलौती होने के कारण अतुलनीय स्नेह प्राप्त होता है ससुराल में आकर घोर यातना को सहना पड़ता है .हमारा दहेज़ कानून दहेज़ के लेन-देन को अपराध घोषित करता है किन्तु न तो वह दहेज़ का लेना रोक सकता है न ही देना क्योंकि हमारी सामाजिक परम्पराएँ हमारे कानूनों पर आज भी हावी हैं .स्वयं की बेटी को दहेज़ की बलिवेदी पर चढाने वाले माँ-बाप भी अपने बेटे के विवाह में दहेज़ के लिए झोले लटकाए घूमते हैं .जिस तरह दहेज़ के भूखे भेड़िये निंदा के पात्र हैं उसी तरह सामाजिक बहिष्कार के भागी हैं दहेज़ के दानी जो इनके मुहं पर दहेज़ का खून लगाते हैं और अपनी बेटी के लिए आग की सेज सजाते हैं .
                शालिनी कौशिक
                    [कौशल]

               
     

शुक्रवार, 16 मई 2014

कांग्रेस व् भाजपा से देश को मुक्ति .



१६ वीं लोकसभा चुनावों के परिणाम सामने आ गए. चारों तरफ भगवा ही भगवा छा गया.भारतीय जनता पार्टी में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी ,इतनी बड़ी जीत की आशा भाजपा को सपनों में भी नहीं थी फिर आम जनता में भी इस बात को लेकर चर्चा थी कि सुषमा स्वराज या लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भी इस सफलता की आशा नहीं की जा सकती थी .वास्तव में इस जीत के एकमात्र हक़दार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं जिन्होंने अपने अकेले दम पर पार्टी के घोषणापत्र से लेकर प्रचार-प्रसार का जिम्मा संभाला और जनता में अपने को लेकर यह विश्वास उत्पन्न किया कि वास्तव में अब ''अच्छे दिन आने वाले हैं ''और इस तरह मोदी ने अपने नाम की लहर से अपनी इतनी बड़ी पार्टी को जो अब तक नहीं मिला था वह दिलाया ''अपने दम पर बहुमत ''इसलिए लाख कोई इस जीत का सेहरा भाजपा के माथे पर बाँधे किन्तु वास्तविकता यह है कि मात्र कांग्रेस का ही इन चुनावों में खात्मा नहीं हुआ है वरन इन चुनावों में देश की दूसरी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी भाजपा का भी खात्मा हो गया है जिसको अब केवल मोदी की पार्टी के रूप में ही आगे पहचान मिलने वाली है क्योंकि जिसमे बगैर मोदी की इच्छा के अब पत्ता तक नहीं हिलने वाला है और अन्य किसी को इसमें कोई भूमिका नहीं मिलने वाली है और अपनी यह मंशा मोदी चुनावों में टिकट बाँटने तक में ज़ाहिर कर चुके हैं जिसमे उनके निर्णय के आगे किसी को मुंह खोलने तक की इज़ाज़त तक नहीं थी ,किसी की नाराज़गी की उनके लिए कोई कीमत नहीं थी .अपनी पार्टी को ही इस तरह एक तरफ रखकर मोदी ने आम जनता को वास्तव में दिखा दिया है कि ''अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है .''और देश को जिस तरह के मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता थी वह मोदी के रूप में जनता के सामने स्वयं उपस्थित हो गया है .यह इस देश के लिए शुभ शगुन है क्योंकि भारतवर्ष वह देश है जहाँ जनता को अनुशासन में रखने के लिए एक तानाशाह की सख्त ज़रुरत है क्योंकि जनतंत्र में वह अनुशासन सिर पर से हट जाता है इसलिए इस देश का सत्यानाश यहाँ की जनता द्वारा ही जनतंत्र होने के कारण इसके मूल अर्थ मूर्खों के शासन होने के कारण किया गया है इसलिए उसी जनता ने अपनी गलती को स्वीकारते हुए स्वयं एक तानाशाह के हाथों में दे दिया है .ऐसे थोड़े ही भारतीय जनता को त्याग की महान मूर्ति कहा जाता है .इतने महान त्याग के लिए भारतीय जनता को नमन व् नरेंद्र मोदी को  एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य का प्रथम तानाशाह चुने जाने के लिए हार्दिक शुभकामनायें  

    शालिनी कौशिक
   [कौशल ]

न भाई ! शादी न लड्डू

  ''शादी करके फंस गया यार ,     अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उ...