शुक्रवार, 29 मई 2015

खादिम है तेरा खाविंद ,क्यूँ सिर चढ़े पड़ी हो .

क्यूँ खामखाह में ख़ाला,खारिश किये पड़ी हो ,
खादिम है तेरा खाविंद ,क्यूँ सिर चढ़े पड़ी हो .
ख़ातून की खातिर जो ,खामोश हर घड़ी में ,
खब्ती हो इस तरह से ,ये लट्ठ लिए पड़ी हो .
खिज़ाब लगा दिखते,खालू यूँ नौजवाँ से ,
खरखशा जवानी का ,किस्सा लिए पड़ी हो .
करते हैं खिदमतें वे ,दिन-रात लग तुम्हारी ,
फिर क्यूँ न मुस्कुराने की, जिद किये पड़ी हो .
करते खुशामदें हैं ,खुतबा पढ़ें तुम्हारी ,
खुशहाली में अपनी क्यूँ,खंजर दिए पड़ी हो .
खिलवत से दूर रहकर ,खिलक़त को बढ़के देखो ,
क्यूँ खैरियत की अपनी ,खिल्ली किये पड़ी हो .
ऐसे खाहाँ की खातिर ,रोज़े ये दुनिया रखती ,
पर खामख्याली में तुम ,खिसियाये हुए पड़ी हो .
खुद-इख़्तियार रखते ,खुसिया बरदार हैं फिर भी ,
खूबी को भूल उनकी ,खटपट किये पड़ी हो .
क्या जानती नहीं हो ,मजबूरी खुद खसम की ,
क्यूँ सारी दुख्तरों को ,सौतन किये पड़ी हो .
''शालिनी '' कहे खाला,खालू की कुछ तो सोचो ,
चढ़ते वे कैसे ऊपर ,जब बेंत ले पड़ी हो .
शालिनी कौशिक
शब्दार्थ :-खाविंद-पति ,खातून-पत्नी ,खाला-मौसी ,खालू-मौसा खारिश -खुजली ,खुसिया बरदार -सभी तरह की सेवा करके खुश रखने वाला ,खर खशा-व्यर्थ का झगडा ,खाहाँ-चाहने वाला ,खिलवत -एकांत ,खिलक़त-प्रकृति ,खामख्याली -नासमझी

रविवार, 24 मई 2015

भिक्षावृति पर सख्त कानून की ज़रुरत

Govt sleeping on Anti-begging Act
NEW DELHI: To describe one's determination to do a job, good or bad, the phrase 'come what may' is often used. It is sometimes substituted with "beg, borrow or steal".
This expression brackets begging with borrowing money and stealing also.
Surely, borrowing is not an offence but stealing is a serious crime and begging or abetting begging is ironically a minor offence.
The law enforcement agencies both in Delhi and elsewhere in the country would immediately provide information about the cases registered against thieves and how many of them were convicted.
Come begging, no case has been registered under the Bombay Prevention of Begging Act, 1959, which was adopted by Delhi about 45 years ago, in 1960.
It does not mean that our cities are free of beggars or hundreds of untraced children for years were not forced to beg by a mafia.
Even the statutory 'homes' for beggars set up in the capital are empty. Obviously, the vacancy position is not because begging has ceased in Delhi or the number of beggars has gone down, but it is for the obvious reason that there is no implementation of the Act.
"We say no more," said Supreme Court Justices Y K Sabharwal and D M Dharmadhikari recently while ...hearing a petition by one Karnika Sawhney seeking an end to trafficking in human beings, beggars and forced labour.
Beggars can't be choosers as they have little option but to accept whatever alms are given to them.
A study indicated class divide among beggars—beggars from metro towns and small towns, beggars outside restaurants and clubs and those who depend on offerings collected from around places of worship.
They have adopted a particular culture.
It was revealed that a beggar in Ayodhya was able to fund the education of his two sons —one is a lawyer and the other a doctor!
But Karnika's lawyer Indira Sawhney's concern is understandable.
She has drawn the court's attention towards the unedifying inertia among the governments in implementing the provisions of the social legislation.
As any concrete information was eluding the court, it has appointed a panel headed by social scientist Nirmal Bhatnagar, who heads the multi-dimension faculty of a management institute JIMS.
Having already completed studies on atrocities on women in India ...... Bhatnagar's panel would inspect various beggars' rehabilitation homes in Delhi which are rarely visited by social welfare officials.
She would suggest possible ways to handle the grave problem of begging in the capital with special emphasis on meaningful rehabilitation measures for future inmates.
The serious task before Bhatnagar's panel is to identify, if possible, the people who are abetting begging. Though a grave offence under the Act, yet no one has so far been arrested for violating it.

Did you know begging is a Crime in India?
Yes, and not only begging but also providing to the beggars is a crime. So on other hand if you are giving money to the beggar then it is a crime too. And this is as per our Indian Laws.
begging for drugsWhat is wrong in begging?
If you note, there are really very few who actually beg for a cause like their disability, old-age or real urgent needs [these situations come when someone is in hospital and I have been witness to it but that is a different story]. Begging has become a profession and these who beg have a whole family that are doing the same begging. Later they go to extend their family by marrying giving birth to children and then to have more to beg. You entertaining one beggar, means you let him/her make their family give birth to a few more and get them begging on roads or temples too.
Anti-Social elements
One more dimension to it is, anti-social elements. When you provide to a young beggar because of ease of getting provided they get into drugs then their wants increase then they start pick-pocketing then robbing and then even killing at a stage. It's not that these elements are only born here but, this is one source.

ऊपरलिखित पोस्ट भिक्षावृति को लेकर भारतीय स्थिति बताने को पर्याप्त हैं लेकिन सबसे ज्यादा अफ़सोस की बात ये है कि भिक्षावृति जैसी सामजिक बुराई को अपराध का खाका पहनाने में हमारी सरकारों द्वारा जितनी देर लगायी जा रही है उससे इस बुराई कि बेल को पनपने में उतना ही सहयोग मिल रहा है और आश्चर्य कि बात तो यह है कि वह जगह जहाँ सभी अपराधों के लिए दंड कि व्यवस्था है वहीँ यह अपराध[ कहने को अभी मात्र सामाजिक अपराध ] अपनी जड़ें फैला रहा है .
भारतीय दंड संहिता कि धारा ३६३ -क भीख मांगने के प्रयोजन के लिए अप्राप्तवय का व्यपहरण या विकलांगीकरण अपराध घोषित करती है और उसके लिए दस वर्ष का कारावास और जुर्माने का प्रावधान करती है किन्तु जैसा कि ऊपर एक पोस्ट में इसे कुछ परिवारों द्वारा व्यवसाय के रूप में अपनाने कि बात भी कही गयी है उसे देखते हुए इस अपराध के लिए सजा की बात तो कहीं रह ही नहीं जाती क्योंकि जो परिवार स्वयं अपने बच्चे को इस काम में लगा रहा है वह न तो व्यपहरण कर रहा है और न ही कोई जबरदस्ती क्योंकि वह इस अपराध की उन्हें आदत डाल रहा है और इसका परिणाम यह है कि आज भिखारी बढ़ रहे हैं और बसों में ,सड़कों पर,अदालतों के प्रांगण में ,मंदिरों की सीढ़ियों पर सभी जगह नज़र आ रहे हैं किन्तु सबसे ज्यादा ये खलते हैं वकीलों की सीट पर आकर जबरदस्ती भीख मांगते हुए और उच्च न्यायालय के बाहर पीछे आकर भीख मांगने के लिए जबरदस्ती करते हुए . आज नहीं कल तो सरकार को इस अपराध की बढ़ती प्रवर्ति पर अंकुश लगाने के लिए इसे अपराध घोषित करना ही होगा और इस पर रोक के लिए कोई प्रभावी कानून बनाना होगा ताकि भिखारियों की बढ़ती संख्या को रोककर जनता को कार्य की ओर उन्मुख किया जा सके और यह तभी संभव है जब यह इस देश में पूर्ण अपराध घोषित हो क्योंकि आज की जनता वह हो चुकी है जिसके भूत को भगाने के लिए कानून रुपी डंडा चलाना ही पड़ता है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 23 मई 2015

आज इस दिल को जरा अश्कों से नहलाने दो .

हरिश्चंद्र ''नाज़'' के ये शब्द आज के एक समाचार पर ध्यान जाते ही मेरे जहन में उभर आये ,शब्द कुछ यूँ थे -
''यूँ गुल खिले हैं बाग़ में ख़ारों के आस-पास ,
जैसे कि गर्दिशें हों सितारों के आस-पास .
रौनक चमन में आ गयी लेकिन न भूलना
शायद खिज़ा छुपी हो बहारों के आस-पास .''
और समाचार कुछ यूँ था -
''महंगाई पर काबू पाना सरकार की अहम उपलब्धि -जेटली ''
और महंगाई पर काबू पाना ऐसा ही गुल है जो वर्तमान सरकार जैसी खार के पास खिलने की कोशिश में है किन्तु जैसे कि खार में गुल नहीं खिलते ऐसे ही वर्तमान सरकार द्वारा महंगाई पर काबू जैसे गुल खिलाने की आशा ही व्यर्थ है और अरुण जेटली जी को महंगाई काबू में दिख रही है वह महंगाई जो इस वक्त पिछली यू.पी.ए.सरकार की अपेक्षा भी दिनों दिन तरक्की की राहों पर जा रही है .अगर हम अपनी रोज़मर्रा की चीज़ों का ही आकलन करें तो हमें साफ नज़र आता है कि महंगाई की स्थिति क्या है -अरहर की दाल जो इस सरकार से पहले हमें ७२ रूपये किलो मिल रही थी वह अब १०० रूपये किलो से ऊपर जा रही है .सब्जियां जो पहले कम भाव पर मिलती दिख जाती थी अब कोई भी कम दाम में नहीं मिलती .प्याज़ १२ रूपये किलो की जगह अब २५ रूपये किलो मिल रहा है .फलों में चीकू २० की जगह ४० के भाव में बिक रहा है .रही पेट्रोल -डीज़ल की बात तो जो फायदा इसका अपनी गाड़ी इस्तेमाल करने वालों को हुआ है वो फायदा आम जनता को नहीं क्योंकि किरायों में कहीं कोई कमी नहीं हुई है .
देखा जाये तो मोदी सरकार अभी तक अपने हर वायदे पर खोटी ही साबित हुई है क्योंकि काला धन लाने का वायदा इन्होने खुद ही तोड़ दिया ,अच्छे दिन लाने का इनका इरादा प्रकृति ने तोड़ दिया और जितने किसानों को इनके कार्यकाल के आरम्भ में ही आत्महत्या को गले लगाना पड़ गया उतना आज तक किसी सरकार के कार्यकाल में नहीं करना पड़ा विशेषकर पश्चिमी यूपी के किसानों को .हाँ इतना अवश्य है कि इस सरकार ने इस तरह की परिस्थितियां शायद पहले ही भांप ली थी और इसलिए धारा ३०९ द्वारा घोषित आत्महत्या के अपराध को अपराध की श्रेणी से अलग किये जाने की पहल कर ली थी .ऐसे में जेटली जी द्वारा महंगाई कम होने का बखान और उसका श्रेय मोदी सरकार को देना ऐसे ही कहा जायेगा जैसे ये सब एक झूठ की रात का चाँद ही हो किन्तु अभी इस स्थिति पर अफ़सोस ही किया जा सकता है और आगे आने वाली सरकार से उम्मीद .जो कि कभी भी पूरी होनी मुश्किल है क्योंकि हर सरकार बनने से पहले आम जनता की होती है और बाद में पूंजीपतियों की .इसलिए ए .बी.भारतीय के शब्दों में बस यही कहा जा सकता है -
''झूठ की रात के हर चाँद को ढल जाने दो ,
सच के सूरज को अंधेरों से निकल आने दो ,
धुल कितने ही अज़ाबों की जमीं है इस पर
आज इस दिल को ज़रा अश्कों से नहलाने दो .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 22 मई 2015

बढ़कर गले लगाती मुमताज़ मौत है .

Standing Skeleton warrior Stock Photo

दरिया-ए-जिंदगी की मंजिल मौत है ,
आगाज़-ए-जिंदगी की तकमील मौत है .
बाजीगरी इन्सां करे या कर ले बंदगी ,
मुक़र्रर वक़्त पर मौजूद मौत है .
बेवफा है जिंदगी न करना मौहब्बत ,
रफ्ता-रफ्ता ज़हर का अंजाम मौत है .
महबूबा बावफ़ा है दिल के सदा करीब ,
बढ़कर गले लगाती मुमताज़ मौत है .
महफूज़ नहीं इन्सां पहलू में जिंदगी के ,
मजरूह करे जिंदगी मरहम मौत है .
करती नहीं है मसखरी न करती तअस्सुब,
मनमौजी जिंदगी का तकब्बुर मौत है .
ताज्जुब है फिर भी इन्सां भागे है इसी से ,
तकलीफ जिंदगी है आराम मौत है .
तक़रीर नहीं सुनती न करती तकाजा ,
न पड़ती तकल्लुफ में तकदीर मौत है .
तजुर्बे ''शालिनी''के करें उससे तज़किरा ,
तख्फीफ गम में लाने की तजवीज़ मौत है .
शालिनी कौशिक

शब्दार्थ-तकमील-पूर्णता ,मुक़र्रर-निश्चित ,बावफ़ा-वफादार , तअस्सुब-पक्षपात, तज़किरा-चर्चा ,तक़रीर-भाषण ,तकब्बुर-अभिमान ,तकाजा-मांगना ,मुमताज़-विशिष्ट ,मजरूह-घायल

बुधवार, 20 मई 2015

शत-शत नमन राजीव गांधी जी को

एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी कैसे चाह रहे थे कि राजीव जी आयें और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाएँ क्योंकि ये बच्चों की समझ थी कि जो जल्दी से आकर कुर्सी पर बैठ जायेगा वही प्रधानमंत्री हो जायेगा.तब हमारे दिमाग की क्या कहें वह तो उनके व्यक्तित्व पर ही मोहित था जो एक शायर के शब्दों में यूँ था-
लताफत राजीव गाँधी,नफासत राजीव गाँधी ,
थे सिर से कदम तक एक शराफत राजीव गांधी
नज़र आते थे कितने खूबसूरत राजीव गांधी .''
राजीव जी का  जन्म २० अगस्त १९४४ को हुआ था और राजनीति से कोसों दूर रहने वाले राजीव जी अपनी माता श्रीमती इंदिरा जी के  कारण राजनीति में  आये और देश को पंचायत राज और युवा मताधिकार जैसे उपहार उन्होंने दिए .आज उनकी पुण्यतिथि केअवसर पर मैं उन्हें याद करने से स्वयं को नही रोक पाई किन्तु जानती हूँ कि राजीव जी भी राजनीति में आने के कारण बोफोर्स जैसे मुद्दे  अपने माथे पर लगाये २१ मई १९९१  को एक आत्मघाती हमले का शिकार होकर हम सभी को छोड़ गए आज भी याद है वह रात जब १०.२० मिनट पर पापा कहीं बाहर से आकर खाना खा रहे थे और  हम कैरम खेल रहे थे कि विविध भारती  का  कार्यक्रम छाया गीत बीच में  बंद हुआ और जैसे ही एक उद्घोषक ने कहा ,''अखिल भारतीय कॉंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष....''और इससे पहले कि वह कुछ बोलता कि पापा बोले कि राजीव गाँधी की हत्या हो गयी हम चीख कर पापा से क्या लड़ते क्योंकि अगले पल ही यह समाचार उद्घोषक बोल रहा था और हमारा राजनीति  से सम्बन्ध तोड़ रहा था राजीव जी के साथ हमने राजनीति में रूचि को भी खो दिया बस रह गयी उनकी यादें जो हम आज यहाँ आप सभी से शेयर  कर रहे हैं हालाँकि जानते हैं कि ब्लॉग जगत में अधिकांश उनके खिलाफ हैं किन्तु हम जिनसे आज तक  जुड़े हैं वे राजीव जी ही थे और वे ही रहेंगे.
श्रीमती मुमताज़ मिर्ज़ा के शब्दों में -
''रहबर गया ,रफ़ीक़ गया ,हमसफ़र गया ,
राजीव पूरी कौम को मग़मून कर गया .
सदियाँ भुला सकेंगी न उसके कमाल को ,
राजीव चंद सालोँ में वो काम कर गया .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

मंगलवार, 19 मई 2015

भारत में वास्तव में कानून नहीं है .

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अरुणा रामचंद्र शानबाग ,एक नर्स ,जिस पर हॉस्पिटल के एक सफाई कर्मचारी द्वारा दुष्कर्म की नीयत से बर्बर हमला किया गया जिसके कारण गला घुटने के कारण उसके मस्तिष्क को ऑक्सिजन  की आपूर्ति बंद हो गयी और उसका कार्टेक्स क्षतिग्रस्त हो गया ,ग्रीवा रज्जु में चोट के साथ ही मस्तिष्क नलिकाओं में भी चोट पहुंची और फलस्वरूप एक जिंदगी जिसे न केवल अपने लिए बल्कि इस समाज देश के लिए सेवा के नए आयाम स्थापित करने थे स्वयं सेवा कराने के लिए मुंबई के के.ई.एम्.अस्पताल के बिस्तर पर पसर गयी और ४२ साल तक वहीँ टुकर-टुकर देख कल जिसने अपनी अंतिम साँस ली .पिंकी वीरानी ,जिसने अरुणा की दर्दनाक कहानी अपनी पुस्तक में बयां की ,ने उसकी जिंदगी को संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मिले सम्मान से जीने के हक़ के अनुरूप नहीं माना .और उसके लिए ''इच्छा मृत्यु ''की मांग की ,जिसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने सिरे से ख़ारिज कर दिया .अपने १४१ पन्नों के फैसले में न्यायालय ने कहा -''देश में इच्छा मृत्यु पर कोई कानून नहीं है .जब तक संसद कानून नहीं बनाती है ,न्यायालय का फैसला पैसिव व् एक्टिव यूथनेसिया के तहत लागू रहेगा .देश में एक्टिव यूथनेसिया गैर कानूनी है लेकिन विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथनेसिया की इज़ाज़त  दी जा सकती है .भविष्य में हाईकोर्ट द्वारा तीन प्रमुख डाक्टरों की राय लेने और सरकार व् मरीज के करीबी रिश्तेदारों की राय जानने के बाद पैसिव यूथनेसिया की मंजूरी दे सकेगा .''पैसिव व् एक्टिव यूथनेसिया -यूनान में इच्छा मृत्यु [यूथनेसिया ]को [गुड डेथ]यानि अच्छी मौत कहा जाता था .यूथनेसिया मूलतः यूनानी शब्द है इसका अर्थ इयू अच्छी ,थानातोस मृत्यु से होता है .इच्छा मृत्यु वह है जब कोई मरीज अपने लिए मृत्यु खुद मांगता  है ,मर्सी किलिंग वह है जब कोई अन्य मरीज के लिए मृत्यु  की गुहार लगाता है .भारत  में इच्छा मृत्यु अवैधानिक थी क्योंकि आत्महत्या का प्रयास भारतीय दंड विधान आई.पी.सी.की धारा ३०९ के अंतर्गत अपराध है .धारा ३०९ आई.पी.सी. कहती है -''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और उस अपराध के करने के लिए कोई कार्य करेगा ,वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दण्डित किया जायेगा .''और जहाँ तक मर्सी किलिंग की बात है भारतीय दंड विधान धारा ३०४ के अंतर्गत इसे भी अपराध मानता है .धारा ३०४ कहती है -''जो कोई ऐसा आपराधिक मानव वध करेगा ,जो हत्या की कोटि में नहीं आता है ,यदि वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गयी है ,मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति ,जिससे मृत्यु होना संभाव्य है ,कारित करने के आशय से किया जाये ,तो वह आजीवन कारावास से ,या दोनों में से किसी भांति के कारावास से ,जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .अथवा यदि वह कार्य इस ज्ञान के साथ कि उससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है ,किन्तु मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति ,जिससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है ,कारित करने के आशय के बिना किया जाये ,तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''इस प्रकार भारतीय दंड विधान मर्सी किलिंग को धारा ३०४ के अंतर्गत सदोष हत्या का अपराध मानता है और इसकी मंजूरी नहीं देता है .इस प्रकार विशेष परिस्थितियों में यदि कोई मरीज मरणासन्न  है ,उसकी हालत में सुधार की कोई गुंजाईश नहीं है तो उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार पैसिव यूथनेसिया की मंजूरी दी जा सकती है जिसके अनुसरण में मरीज को सिर्फ जीवन रक्षक प्रणाली से हटाया जा सकता है जिसके हटाने से उसकी मृत्यु संभव हो सके किन्तु भारतीय कानून एक्टिव यूथनेसिया को मंजूरी नहीं देता है जिसमे मरणासन्न मरीज को मरने  में प्रत्यक्ष सहयोग दिया जाता है यानि डाक्टरों की मौजूदगी में रोगी को मारने के लिए ड्रग्स या जहरीले इंजेक्शन दिए जाते हैं .और ऐसे में यदि हम विचार करें तो आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से अलग करना एक्टिव यूथनेसिया की श्रेणी में ही आ जायेगा क्योंकि जिस व्यक्ति के मन में जीने की इच्छा ख़त्म हो रही है उसे निराशा के रोगी के रूप में मरणासन्न मरीज की श्रेणी में रखा जा सकता है और ऐसे में माना जा सकता है कि वह सही निर्णय नहीं ले सकता है और ऐसे में देश का कानून यदि ऐसे  प्रयास को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता है तो देश में एक्टिव यूथनेसिया को मंजूरी देने जैसा ही हो जायेगा .और ऐसा यहाँ हुआ .केंद्रीय सरकार विधि आयोग की सिफारिश पर व् १८ राज्यों व् ४ केंद्रशासित क्षेत्र की सहमति पर धारा ३०९ को ख़त्म करने का निर्णय ले रही है और इस तरह एक्टिव यूथनेसिया को मंजूरी दे रही है .सवाल केवल ये उठता है कि यदि इस तरह का निर्णय इस देश में लिया जा सकता है तो अरुणा शानबाग जैसी निर्दोष को इस तरह की भयावह ज़िंदगी जिए जाने को विवश क्यों होना पड़ता है मात्र इस लिए कि वह स्वयं अपनी मौत के लिए गुहार नहीं लगा सकती ऐसे में तो यही कहना सही होगा कि आज भी इस देश में निर्दोष के साथ रहम नहीं है हाँ कानून कहता ज़रूर है कि भले ही सौ अपराधी बच जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए जबकि सही ये ही है -
''ज़रदार तो ले देके बचे रहते हैं लेकिन ,
पाता है सजा वो जो खतावार नहीं है .''

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 16 मई 2015

''हिन्दू-मुस्लिम भेद-समझ-समझ का फेर ''

एक सार्वभौमिक सत्य के बारे में आप सभी जानते ही होंगें कि दूध गाय -भैंस ही देती हैं और जहाँ तक हैं इनका कोई धर्म जाति नहीं होती ,इनमे आपस में होती हो तो पता नहीं किन्तु जहाँ तक इंसान की बात है वह इस सम्बन्ध में  कम से कम मेरी जानकारी के अनुसार तो अनभिज्ञ ही कहा जायेगा .
पर आज मेरी यह जानकारी धरी की धरी रह गयी जब मैंने अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी जी को पड़ोस की ही दूसरी आंटी जी से बात करते सुना ,वे उनसे दूध के बारे में पूछ रही थी और ये  बता रही थी कि उन्हें अपने यहाँ के एक धार्मिक समारोह के लिए ज्यादा दूध की आवश्यकता है। दूसरी आंटी  के ये कहने पर कि उनका दूधवाला बहुत अच्छा दूध लाता है पर वे फटाक से बोली लाता तो हमारा दूधवाला भी बहुत बढ़िया दूध है पर वह मुसलमान है ना ,......................................................आश्चर्य से हक्की-बक्की रह गयी मैं उनकी इस बात पर कि वे दूधवाले के मजहब से दूध-दूध में भेद कर रही हैं जबकि उन्हें दूध चाहिए था जो या तो गाय देती है या भैंस ,आज तक दूध के मामले में गाय-भैंस का अंतर तो सुना था पर हिन्दू-मुसलमान का अंतर कभी नहीं, मन में विचार आया कि फिर क्या वे अपने यहाँ बनने वाले भोजन में भी हिन्दू-मुसलमान  का भेद करेंगी  जिसका ये पता नहीं कि वह हिन्दू के खेत की पैदावार है या मुसलमान के खेत की।
ये सोच-समझ का अंतर केवल इन्ही की सोच-समझ का ही नहीं है अपितु आमतौर पर देखने में मिलता है ;जैसे हिन्दू अपने यहाँ मिस्त्री का काम मुसलमान मिस्त्री से भी करा लेते हैं किन्तु मुसलमान अपने घर पर हिन्दू मिस्त्री नहीं लगाते ,जैसे मुसलमान हिन्दू की थाली में बिना भेद किये खा लेते हैं जबकि हिन्दू मुसलमान की थाली इस्तेमाल करते हिचकिचाते हैं।
हिन्दू मुसलमान का यह वैचारिक मतभेद मिटना मुश्किल है क्योंकि मुसलमान यहाँ अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं और हिन्दू इनकी जीवनचर्या को अपने सिद्धांतों के विपरीत और ये सोच का अन्धकार शिक्षा का उजाला भी दूर करने में अक्षम है और यही देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का हमारे नेताओं को मौका देता है जिसे इन नेताओं के हाथ से छीनना इन सोच-समझ की परिस्थितियों में नामुमकिन नहीं तो कठिन अवश्य है और इस मुश्किल को केवल आपसी समझ-बूझ से ही ख़त्म किया जा सकता है। जब गाय को मुसलमान के पास रहकर अपना पालन-पोषण कराने व् दूध देने में आपत्ति नहीं तो हम गाय-भैंस की वजह से हिन्दू-मुसलमान का अंतर क्यूँ कर रहे हैं और यही समझ-बूझ हमें विकसित करनी होगी जैसे कि आपने भी पढ़ा-सुना होगा ठीक ऐसे ही -
''खुदा किसी का राम किसी का ,
बाँट न इनको पाले में।
तू मस्जिद में पूजा कर ,
मैं सिज़दा करूँ शिवाले में।
जिस धारा में प्यार-मुहब्बत ,
वह धारा ही गंगा है।
और अन्यथा क्या अंतर ,
वह यहाँ गिरी या नाले मे। ''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 13 मई 2015

''सड़क दुर्घटनाएं -लाइसेंस कुशल चालक को ''

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सड़क दुर्घटनाएं  रोज सैकड़ों ज़िंदगियाँ लील रही हैं कारण खोजे जा रहे  हैं .कहीं वाहनों की अधिकता ,कहीं ट्रेफिक नियमों का पालन न किया जाना आदि कारण बताये जा रहे हैं किन्तु एक कारण जो इस मामले में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उसे कोई वरीयता नहीं दी जा रही और वह कारण है वाहन चलाने की कुशलता का न होना .आज लगभग  50% वाहन चालक ऐसे हैं जिन्हें वाहन को न तो नियमों के आधार पर मोड़ना आता है और न पार्किंग के लिए खड़ा करना फिर वाहन चलाना तो बहुत दूर की कौड़ी है .कितने ही वाहन चालक ऐसे दिखाई देते हैं जो पीछे की तरफ से आते हुए वाहन को न देखते हुए अपना वाहन बैक करना आरम्भ करते हैं और उसे उससे भिड़ा देते हैं .स्पीड के कितने ही नियम बनाये जाएँ ये उनका पालन नहीं करते ,रोज़ इनके चालान कटते हैं किन्तु ये बार बार उसी गतिविधि को अंजाम देते रहते हैं और इस सबके लिए दोषी कौन है ?दोषी है वाहन चलाने का लाइसेंस देने वाला विभाग आर.टी.ओ. ,जो हर किसी को ये लाइसेंस दे रहा है और सड़कों पर निरंतर दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ाने में सहयोग .लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए इन सड़क दुर्घटनाओं पर त्वरित कार्यवाही की आवश्यकता है और ऐसे में प्रथम दायित्व आर.टी.ओ. का बनता है कि वह लोगों को यह लाइसेंस उनकी कुशलता की भली-भांति परख करने के बाद ही दे .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 11 मई 2015

good servant but a bad master -सोशल साइट्स

जनलोकपाल का मुद्दा और जनांदोलन कोई ऐसी नयी बात नहीं थी पहले भी ऐसे बहुत से मुद्दे लेकर जनांदोलन होते रहे  और थोड़ी बहुत असहज परिस्थितियां सरकार के लिए उत्पन्न करते रहे किन्तु यह आंदोलन अन्ना और केजरीवाल की अगुआई में एक ऐसा आंदोलन बना कि सरकार की जड़ें हिला दी कारण था इसका सोशल साइट्स से भी जुड़ा होना और सोशल साइट्स के माध्यम से जनता के एक बहुत बड़े वर्ग की इसमें भागीदारी और इसी का परिणाम रहा दशकों से लटके जनलोकपाल के मुद्दे पर सरकार का सकारात्मक कदम उठाना।
रेप ,गैंगरेप रोज़ होते हैं थोड़ी चर्चा का विषय बनते हैं और फिर भुला दिए जाते हैं किन्तु १६ दिसंबर २०१२ की रात को हुआ दामिनी गैंगरेप कांड देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को हिला गया और इसका कारण भी वही था सोशल साइट्स ,सोशल साइट्स के माध्यम से रातो रात ये खबर सारे विश्व में फ़ैल गयी और इन सोशल साइट्स ने ही जगा दी संवेदना सदियों से सोयी उस दुनिया की जो रेप ,गैंगरेप की दोषी पीड़िता को ही मानते रहे सदा सर्वदा और पहली बार दुनिया उठ खड़ी हुई एक पीड़िता के साथ इस अपराध के खिलाफ उसके लिए न्याय की मांग करने को .
महंगाई ,भ्रष्टाचार ,महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचार मुद्दे पहले भी थे और ऐसी ही निन्दित अवस्था में थे जैसे अब हैं लेकिन सोशल साइट्स ने यहाँ भी अपना सशक्त योगदान दिया और उखाड़ फेंका दस साल से जमी यू,पी,ए.सरकार व् १५ साल से दिल्ली में जमी शीला दीक्षित सरकार को .
किन्तु ऐसा नहीं कि सोशल साइट्स केवल सोशल ही हों, ये सामाजिक रूप से यदि सकारात्मक कार्य कर रही हैं  तो असामाजिकता में भी पीछे नहीं हैं .फेसबुक ट्विटर ऐसी सोशल साइट्स  बन चुकी हैं जिनका इस्तेमाल न केवल समाज को जोड़ने में किया जा रहा है बल्कि समाज तोड़ने में भी ये पीछे नहीं हैं -धार्मिक उन्माद फैलाना हो तो फेसबुक ,साम्प्रदायिक दंगे करवाने हों तो ट्विटर ,लड़की को बहकाना हो तो फेसबुक ,लड़के को पागल बनाना हो तो फेसबुक ,और ये सब साबित होता है इन समाचारों से जो आये दिन हम पढ़ते हैं समाचारपत्रों में ,देखते हैं अपने आस पास -
*मंगलवार २९ जुलाई २०१४ का अमरउजाला इन सोशल साइट्स की असलियत से जुडी तीन ख़बरें प्रकाशित करता है -
१-खटीमा [ऊधमसिंह नगर ]-फेसबुक पर सहारनपुर दंगे से सम्बंधित फोटो टैग कर धार्मिक उन्माद फ़ैलाने के आरोप में पुलिस ने एक युवक को गिरफ्तार किया है .
२-सहारनपुर में दंगों के समाधान के रूप में गुजरात मॉडल की वकालत करने वाले भाजपा विधायक व् पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य सीटी रवि बाद में अपने ट्वीट पर सफाई देते नज़र आये .
३-इंदौर-२३ वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवती का फेसबुक पर फ्रेंड बने युवक ने बुलाकर धोखे से अश्लील वीडियो बनाया .
**मेरठ में भारत से जुडी गोपनीय सूचनाये हासिल करने के लिए सोशल साइट्स ने युवतियों को खास ट्रेनिंग दे रखी है यह खुलासा इंटेलिजेंस द्वारा विज्ञानं शिक्षक दीपक शर्मा से की गयी पूछताछ में हुआ है उनसे एक युवती रानी ने चैटिंग में अपना नाम रेनू रख कहा -
''साइंस से प्यार करती हूँ इसलिए आपको बनाया दोस्त .''
यही नहीं सेना के और भी जवानों को भेजी फ्रेंड रिक्वेस्ट .
यही नहीं आज हाईटेक युवाओं पर आतंकियों की नज़र है और वे इन सोशल साइट्स के माध्यम से इनसे जुड़ रहे हैं .
ये सोशल साइट्स आज हर तरह के काम कर रही हैं एक तरफ ये लोगों की मददगार भी बन रही हैं और एक तरफ चैन हराम करने वाली  भी .यूनिवर्सिटी ऑफ़ अलबामा के असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ.पाविका शेल्डन ने बताया कि शोध में शर्मीले लोग फेसबुक पर ज्यादा वक्त बिताते हैं .साथ ही एक नए शोध के मुताबिक सोशल मीडिया पर वजन घटाने के तरीके भी लोग सीख रहे हैं लन्दन के इम्पीरियल कालेज में १२ शोध का साझा नतीजा यही है कि सोशल मीडिया से मोटापा घटाने में मदद मिल रही है .साथ ही हमारी सरकार भी इस और अब सक्रियता दिखाकर जनता की मददगार बन रही है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है -

ट्विटर पर अखिलेश चौंका देंगे आपको

ट्वीट करते ही आया सीएम का जवाब
चार दिन बीत चुके थे। वह सारी भाग-दौड़ कर चुका था। यहां तक कि लाइनमैन को घूस देने को भी तैयार था। लेकिन कोई भी उसके घर की बिजली ठीक करने को तैयार नहीं था।

आखिर पांचवे दिन उसने गुस्से में उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ट्वीट किया। उसने लिखा कि 'नोएडा सेक्टर 52 में पश्चिमांचल विधुत के जेई ने मुझसे घूस मांगी है और चुनौती दी है कि जो करना है कर लो।'

आपको जानकर हैरानी होगी कि उसी दिन शाम को चार बजे मुख्यमंत्री कार्यालय से जवाब आया कि आप अपना फोन नंबर भेजें।
इस प्रकार आज ये सोशल साइट्स दोस्त व् दुश्मन दोनों रूप में हैं जिनसे न मिलते बनता है न बिछड़ते ,न निगलते बनता है न उगलते ,समझ का इस्तेमाल हो तो सही और न हो तो गलत ये विश्वास बनाती भी हैं और बिगाड़ती भी ,सम्बन्ध बनाती भी हैं और तोड़ती भी ,एक तरफ हम इनके माध्यम से विश्व से जुड़ रहे हैं किन्तु ये भी सच्चाई है कि इन्हीं के माध्यम से अपने घर ,समाज से कट रहे हैं उन्हें तोड़ रहे हैं .इसलिए इनके बारे में ,जैसे विज्ञानं के लिए कहा गया है कि -
''science is a good servant but a bad master .''
ऐसे ही इन सोशल साइट्स के लिए भी कहा जा सकता है -
''social sites are good servant but bad master .
अर्थात इन्हें यदि हम अपने ऊपर हावी न कर अपनी समझ से इस्तेमाल करते हैं तो ये सही और यदि इन्हें हावी कर इनके हिसाब से चलते हैं तो गलत .वास्तव में सोशल होना हम पर निर्भर है ,समाज चलना व् समभलना हम पर निर्भर है इन साइट्स पर नहीं ये केवल हमारे हाथ में है कि हम इनके माध्यम से समाज की मदद करते हैं या उसका चैन हराम करते हैं .

फेसबुक दीवार
पडोसी की
हर किसी की .
हिफाज़त करे
पडोसी की
हर किसी की .
राहत की साँस
पडोसी की
हर किसी की .
श्रृंगार भीतरी ,शान बाहरी,
पडोसी की
हर किसी की .
अब बन गयी
दिलों की भड़ास की ,
उत्पाद प्रचार की ,
वोट की मांग की ,
किसी के अपमान की ,
किसी के सम्मान की .
भरा जो प्यार दिल में
दिखायेगा दीवार पर ,
भरा जो मैल मन में
उतार दीवार पर ,
बेचना है मॉल जो
प्रचार दीवार पर ,
झुकानी गर्दन तेरी
लिखें हैं दीवार पर ,
पधारी कौन शख्सियत
देख लो दीवार पर .
मार्क जुकरबर्ग ने
संभाला एक मोर्चा ,
देखकर गतिविधि
बैठकर यही सोचा ,
दीवार सी ही स्थिति
मैं दूंगा अंतर्जाल पर ,
लाऊंगा नई क्रांति
फेसबुक उतारकर ,
हुआ कमाल जुट गए
करोड़ों उपयोक्ता ,
दीवार का ही काम अब
फेसबुक कर रहा ,
जो चाहे लिख लो यहाँ ,
जो चाहे फोटो डाल लो ,
क्रांति या बबाल की
लहर यहाँ उफान लो ,
करे कोई ,भरे कोई ,
नियंत्रण न कोई हद ,
जगायेगा कभी लगे
पर आज बन गया है दर्द .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

न भाई ! शादी न लड्डू

  ''शादी करके फंस गया यार ,     अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उ...