मंगलवार, 29 सितंबर 2015

इसलिए सोनिया-राहुल पर ये प्रहार किये जाते हैं .



Sunita Williams
जगमगाते अपने तारे गगन पर गैर मुल्कों के ,
तब घमंड से भारतीय सीने फुलाते हैं .
टिमटिमायें दीप यहाँ आकर विदेशों से ,
धिक्कार जैसे शब्द मुहं से निकल आते हैं .
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नौकरी करें हैं जाकर हिन्दुस्तानी और कहीं ,
तब उसे भारतीयों की काबिलियत बताते हैं .
करे सेवा बाहर से आकर गर कोई यहाँ ,
हमारी संस्कृति की विशेषता बताते हैं .
Sonia Gandhi, Rahul Gandhi and Prime Minister Manmohan Singh look at newly elected party state presidents of the Indian Youth Congress seek blessings at a convention in New Delhi. Sonia in action
राजनीति में विराजें ऊँचे पदों पे अगर ,
हिन्दवासियों के यशोगान गाये जाते हैं .
लोकप्रिय विदेशी को आगे बढ़ देख यहाँ ,
खून-खराबे और बबाल किये जाते हैं.
Demonstrators from the Samajwadi Party, a regional political party, shout slogans after they stopped a passenger train during a protest against price hikes in fuel and foreign direct investment (FDI) in retail, near Allahabad railway station September 20, 2012 (Reuters / Jitendra Prakash)
क़त्ल होता अपनों का गैर मुल्कों में अगर ,
आन्दोलन करके विरोध किये जाते हैं .
अतिथि देवो भवः गाने वाले भारतीय ,
इनके प्रति अशोभनीय आचरण दिखाते हैं .
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विश्व व्यापी रूप अपनी संस्था को देने वाले ,
संघी मानसिकता से उबार नहीं पाते हैं .
भारतीय कहकर गर्दन उठाने वाले ,
वसुधैव कुटुंबकम कहाँ अपनाते हैं

भारत का छोरा जब गाड़े झंडे इटली में ,
भारतीयों की तब बांछें खिल जाती हैं .
इटली की बेटी अगर भारत में बहु बने ,
जिंदादिल हिंद की जान निकल जाती है .

अलग-अलग मानक अपनाने वाले ये देखो ,
एक जगह एक जैसे मानक अपनाते हैं ,
देशी हो विदेशी हो भारत की या इटली की ,
बहुओं को सारे ये पराया कह जाते हैं .

मदर टेरेसा आकर घाव पर लगायें मरहम ,
सेवा करवाने को ये आगे बढ़ आते हैं .
सोनिया गाँधी जो आकर राज करे भारत पर ,
ऐसी बुरी हार को सहन न कर पाते हैं.
The dead Indira Gandhi with her son, Prime Minister Ranjiv Ghandi.
सारा परिवार देश हित कुर्बान किया ,
ऐसी क़ुरबानी में ये ढूंढ स्वार्थ लाते हैं .
नेहरु गाँधी परिवार की देख प्रसिद्धि यहाँ ,
विरोधी गुट सारे जल-भुन जाते हैं .
सोनिया की सादगी लुभाए नारियों को यहाँ ,
इसीलिए उलटी सीधी बाते कहे जाते हैं .
पद चाह छोड़कर सीखते जो ककहरा ,
राहुल के सामने खड़े न हो पाते हैं .
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राजनीति में विराजें कितने ही अंगूठा टेक ,
पीछे चल जनता उन्हें सर पर बैठाती है .
राहुल गाँधी कर्मठता से छा न जाये यहाँ कहीं ,
उनकी शिक्षा को लेकर हंसी करी जाती है .

भेदभाव भारत में कानूनन निषिद्ध हुआ ,
लोग पर इसे ही वरीयता दिए जाते हैं
योग्यता और मेहनत को मिलता तिरस्कार यहाँ ,
इसलिए राहुल सोनिया पर ये प्रहार किये जाते हैं .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]


शनिवार, 26 सितंबर 2015

नारी और आदर :दूर की कौड़ी



 रामायण में लव-कुश रामायण देखी मन विह्वल हो गया और आंसू से भीग गए अपने नयन किन्तु नहीं झुठला सकता वह सत्य जो सीता माता माँ वसुंधरा की गोद में जाते हुए कहती हैं -
''माँ ! मुझे अपनी गोद में ले लो ,इस धरती पर परीक्षा देते देते मैं थक गयी हूँ ,यहाँ नारी का आदर नहीं हो सकता .''
एक सत्य जो न केवल माता सीता ने बल्कि यहाँ जन्म लेने वाली हर नारी ने भुगता है .एक परीक्षा जो नारी को कदम कदम पर देनी पड़ती है किन्तु कोई भी परीक्षा उसे खरा साबित नहीं करती बल्कि उसके लिए आगे का मार्ग और अधिक कठिन कर देती है .
माता सीता ने जो अपराध नहीं किया उसका दंड उन्हें भुगतना पड़ा .लंकाधिपति रावन उनका हरण कर ले गया और उन्हें ढूँढने में भगवान राम को और रावन का वध करने में जो समय उन्हें लगा वे उस समय में वहां रहने के लिए बाध्य थी इसलिए ऐसे में उन्हें वहां रहने के लिए कलंकित करना पहले ही गलत कृत्य था और राजधर्म के नाम पर माता सीता का त्याग तो पूर्णतया गलत कृत्य ,क्योंकि यूँ तो माता सीता तो देवी थी इसलिए उनका त्याग तो वैसे भी असहनीय ही रहा किन्तु इस कार्य ने एक गलत परंपरा की नीव रखी क्योंकि इस कार्य ने समाज के ठेकेदारों को एक मान्य उदाहरण दे दिया जबकि यदि कोई नारी स्वयं की मर्जी से ही कहीं गयी हो तब ही इस श्रेणी में आती है ,वह महिला जो बलात हरण कर ले जाई गयी है यदि दुर्भाग्य वश उसके साथ कुछ गलत घट भी जाये तो उसका त्याग वर्जित होना चाहिए .]
किन्तु ऐसा कहाँ है औरत का एक रात कहीं और किसी के साथ रुक जाना उसकी जिंदगी के लिए विनाशकारी हो जाता है और पुरुष शादी विवाह करके बच्चे होने के बाद भी बहुत सी बार घर-बार छोड़कर भाग जाता है बरसों बरस गायब रहता है तब उसके साथ तो कोई परीक्षा का विधान नहीं है .
जो सीता ने भोगा वही अहिल्या ने भी भोगा ,इंद्र ने वेश पलटकर उनके साथ सम्भोग किया और ऋषि गौतम ने उन्हें पत्थर बनने का श्राप दे दिया ,अब यदि इस प्रसंग को हमारे समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो ऐसा श्राप तो नहीं दिया जाता बल्कि शक की बिना पर सीधे मौत के घाट उतार दिया जाता है .प्रेम विवाह हो या हमारे देश की संस्कृति के अनुसार किया गया विवाह कहीं भी ऐसी घटनाएँ होने से बची हुई नहीं हैं .नारी हर जगह शोषित की ही श्रेणी में हैं .उसके लिए आदर कहीं भी नहीं है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 23 सितंबर 2015

देशभक्ति जूनून है कानून नहीं .


शिक्षण संस्थाओं में तिरंगा फहराना अनिवार्य

मदरसों में तिरंगा जरूर फहराया जाए 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सभी शिक्षण संस्थाओं में 15 अगस्त और 26 जनवरी को अनिवार्य रूप से तिरंगा झंडा फहराया जाए। संविधान के अनुच्छेद 51 ए का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यह प्रत्येक नागरिक का कत्तर्व्य है कि वह जाति, धर्र्म, लिंग आदि से ऊपर उठकर ध्वजारोहण करे।


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मदरसों में तिरंगा फहराना अनिवार्य घोषित किया है जबकि भारतीय ध्वज संहिता ऐसा कोई कर्तव्य ऐसी किसी संस्था पर नहीं आरोपित करती जिसमे तिरंगा फहराना उसके लिए अनिवार्य हो। भारतीय ध्वज संहिता २००२ कहती है -

भारतीय ध्वज संहिता

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
लाल किला, दिल्ली की प्राचीर पर फहराता तिरंगा
भारतीय ध्वज संहिता भारतीय ध्वज को फहराने व प्रयोग करने के बारे में दिये गए निर्देश हैं। इस संहिता का आविर्भाव २००२ में किया गया था। भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-२००२ में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-२००२ को २६ जनवरी २००२ से लागू किया गया है।[1]
  • जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
  • सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्‍टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है।
  • झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।
  • झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।
  • फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।
  • झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।
  • किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।
  • झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।
  • जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।

संशोधन[संपादित करें]

भारतीय नागरिक अब रात में भी राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहरा सकते हैं। इसके लिए शर्त होगी कि झंडे का पोल वास्तव में लंबा हो और झंडा खुद भी चमके।[2] गृह मंत्रालय ने उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल द्वारा इस संबंध में रखे गये प्रस्ताव के बाद यह फैसला किया। इससे पहले जिंदल ने हर नागरिक के मूलभूत अधिकार के तौर पर तिरंगा फहराने के लिहाज से अदालती लड़ाई जीती थी। कांग्रेस नेता जिंदल को दिये गये संदेश में मंत्रालय ने कहा कि प्रस्ताव की पड़ताल की गयी है और कई स्थानों पर दिन और रात में राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के लिए झंडे के बड़े पोल लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है। जिंदल ने जून २००९ में मंत्रालय को दिये गये प्रस्ताव में बड़े आकार के राष्ट्रीय ध्वज को स्मारकों के पोलों पर रात में भी फहराये जाने की अनुमति मांगी थी। जिंदल ने कहा था कि भारत की झंडा संहिता के आधार पर राष्ट्रीय ध्वज जहां तक संभव है सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच फहराया जाना चाहिए, लेकिन दुनियाभर में यह सामान्य है कि बड़े राष्ट्रीय ध्वज १०० फुट या इससे उंचे पोल पर स्मारकों पर दिन और रात फहराये गये होते हैं।                            
    साथ ही भारतीय संविधान के भाग-४ में अनुच्छेद ५१ क में बताये गए मूल कर्तव्यों में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो इसे अनिवार्य बनाये। अनुच्छेद ५१ क का भाग क कहता है कि -

[क]   संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों ,संस्थाओं ,राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान  का आदर करें। 
        इसलिए भारतीय कानून का वर्तमान स्वरुप इस अनिवार्यता की राह में बाधा है और यह तभी अनिवार्य हो सकता है जब सम्बंधित कानून में संशोधन हो और आश्चर्य इस बात का है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ऐसा कह रही है कि यह प्रत्येक नागरिक का कत्तर्व्य है कि वह जाति, धर्र्म, लिंग आदि से ऊपर उठकर ध्वजारोहण करे जबकि हमारे संविधान तक में ये कर्तव्य सम्मिलित नहीं है संविधान राष्ट्रध्वज के आदर के लिए कहता है आरोहण के लिए नहीं ये तो हम भारतवासियों की राष्ट्रीय भावनाओं की बात है कि हम नवीन जिंदल की तरह इसे ज्यादा से ज्यादा फहराने का अधिकार मांगें न कि इसे बोझ समझकर फहराने को आगे बढ़ें। 
शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]
  

सोमवार, 21 सितंबर 2015

ये ''कामवालियां'' ही-- करवाएं राज़ .



Woman in depression - stock photo
लड़ती हैं
खूब झगड़ती हैं
चाहे जितना भी
दो उनको
संतुष्ट कभी नहीं
दिखती हैं
खुद खाओ
या तुम न खाओ
अपने लिए
भले रसोईघर
बंद रहे
पर वे आ जाएँगी
लेने
दिन का खाना
और रात का भी
मेहमानों के बर्तन
झूठे धोने से
हम सब बचते हैं
मैला घर के ही लोगों का
देख के नाक सिकोड़ते हैं
वे करती हैं
ये सारे काम
सफाई भेंट में हमको दें
और हम उन्हीं को 'गन्दी 'कह
अभिमान करें हैं अपने पे
माता का दर्जा है इनका
लक्ष्मी से इनके काम-काज
ये ''कामवालियां'' ही हमको
रानी की तरह करवाएं राज़ .
.....................
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

मीडिया की तो राम ही भली करें


Image result for lalu and rahul gandhi image
मीडिया आजकल क्या कर रहा है किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है किन्तु इतना साफ है कि मीडिया अपनी भूमिका का सही निर्वहन नहीं कर रहा है .सच्चाई को निष्पक्ष रूप से सबके सामने लाना मीडिया का सर्वप्रमुख कार्य है किन्तु मीडिया सच्चाई को सामने लाता है घुमा-फिरा कर .परिणाम यह होता है कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है और समाचार जनता में भ्रम की स्थिति पैदा करता है .अभी २ दिन पहले की ही बात है लालू यादव ने राहुल गांधी की रैली में शामिल होने से इंकार किया तो समाचार प्रकाशित किया गया अमर उजाला दैनिक के मुख्य पृष्ठ ३ पर जो कि १ व् २ पेज पर विज्ञापन के कारण नंबर ३ ही था देखिये-


{राहुल की रैली में नहीं जाएंगे लालू
पटना। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने में असमर्थता जाहिर की है। इसलिए वह अपनी जगह अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को 19 सितंबर को चंपारण में आयोजित राहुल की रैली में भेजेंगे। विस्तृत पेज 14 पर}

और वे राहुल गांधी के साथ मंच साझा क्यों नहीं करेंगे इसका कारण छिपाकर पेज १४ पर प्रकाशित किया गया जिसमे इसका मुख्य कारण बताया गया है और वह है लालू द्वारा राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने के बहाने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को राजनीति के गलियारों में लांच करना  -
{राहुल के साथ मंच पर दिखेंगे राजद के युवराज
पटना (ब्यूरो)। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने में असमर्थता जाहिर की है। इसलिए वह अपनी जगह अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को 19 सितंबर को चंपारण में आयोजित राहुल की रैली में भेजेंगे। हालांकि बिहार के सीएम नीतीश कुमार इस रैली में शामिल होंगे।
कहा जा रहा है कि लालू कांग्रेस उपाध्यक्ष के साथ राजद के युवराज को मंच पर दिखाना चाहते हैं। राहुल की रैली से लालू का किनारा होना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय जरूर है, लेकिन राजद का कहना है कि लालू चुनाव की घोषणा होने के बाद काफी व्यस्त हैं और यही एक मात्र वजह है, जिसके कारण वह रैली में शामिल नहीं हो पाएंगे।}
लेकिन मीडिया क्यों राहुल गांधी की प्रमुखता दिखायेगा वह तो अपने कुछ पूर्वग्रहों से ग्रस्त है और इसलिए वह राहुल गांधी को नीचे दिखाने का कोई मौका चूकना नहीं चाहता .इसलिए वह जब देखो राहुल गांधी के खिलाफ अपने चुके हुए तीर चलाता ही रहता है .
यही नहीं कि मीडिया ऐसा किसी गलतीवश करता है असल में मीडिया को अब अपना काम करना ही शायद आता नहीं है क्योंकि मीडिया को अब इंसान इंसान नज़र आता ही नहीं है अगर वह पढ़ने लिखने वाली उम्र का है तो अगर उसके साथ कोई घटना होती है तो वह समाचार  में छात्र ही लिखा जायेगा चाहे घटना के वक़्त स्कूल का कोई मतलब न हो ..मुज़फ्फरनगर में घर से अपहृत एक बच्चे की हत्या का समाचार जब समाचारपत्र में आया तो उसमे उसे छात्र लिखा गया जबकि घटना शाम की थी और बच्चा घर के बाहर साइकिल चला रहा था .ऐसे ही मेरठ में एक युवक की हत्या हो गयी और वह उस वक्त अपनी स्कूटी खड़ी कर चला गया था जब शाम तक नहीं लौटा तो ध्यान दिया गया और उसकी हत्या का पता चला इसमें कॉलिज का केवल इतना मतलब कि वह मेरठ कॉलिज में पढता था बस इतने मात्र से समाचार का शीर्षक हो गया मेरठ कॉलिज के छात्र की गोली  मारकर हत्या .
  अब ऐसे मीडिया का क्या किया जाये इसके लिए तो ये भी नहीं कह सकते कि सुबह का भूला शाम तक घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते क्योंकि यह तो अपने घर लौटने वाला ही नहीं है .इसका तो बस एक ही चारा है हमारे पास कि इसकी गलतियों को रोज दरकिनार कर अपनी ही सुध लें .

शालिनी कौशिक 
  [कौशल ]


मंगलवार, 15 सितंबर 2015

जन्मदिन दो प्रथम पूजनीयों का :हार्दिक शुभकामनायें

इस वर्ष १७ सितम्बर का दिन हर भारतीय के लिए विशेष महत्व रखता है धार्मिक रूप से भी और राजनीतिक रूप से भी.१७ सितम्बर को इस वर्ष गणेश चतुर्थी और देश की राजनीति को एक नया आयाम देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का जन्मदिन है .जिस तरह हर शुभ कार्य के पूर्व सभी के लिए हिन्दू धर्म में गणेश जी को मनाना अनिवार्य है और अपनी त्रुटियों को दूर करने के लिए उनका आह्वान किया जाना आवश्यक है वैसे ही आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए राजनीति में लोकतंत्र के महत्व को जानने के लिए नरेंद्र मोदी जी को स्मरण किया जाना एक ऐसा ही काम बन जायेगा क्योंकि अकेले दम पर प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने न केवल विपक्ष के समूचे समूह को धूल चटा दी है बल्कि अपनी पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में बिठाया है और अपना ऐसा स्थान बनाया है कि उनके निर्णय के आगे उनकी पार्टी के किसी नेता की ऊँगली तक उठाने की हिम्मत ही नहीं है .ऐसे में उनका स्थान उनकी पार्टी और समूचे भारतीय लोकतंत्र के लिए भगवान गणेश के समान ही प्रथम पूजनीय हो गया है .इसलिए इस शुभावसर पर सभी को गणेश चतुर्थी और भारतीय लोकतंत्र के नवीन प्रथम पूजनीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनायें .
ganesh chaturthi 2015 muhurt     Narendra D Modi.png
नरेन्द्र दामोदरदास मोदी (उच्चारण सहायता·सूचनागुजरातीનરેંદ્ર દામોદરદાસ મોદીजन्म: १७ सितम्बर १९५०) भारतके वर्तमान प्रधानमन्त्री हैं। भारत के राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें २६ मई २०१४ को भारत के प्रधानमन्त्री पद की शपथ दिलायी।[2][3] वे स्वतन्त्र भारत के १५वें प्रधानमन्त्री हैं तथा इस पद पर आसीन होने वाले स्वतंत्र भारत में जन्मे प्रथम व्यक्ति हैं।
उनके नेतृत्व में भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने २०१४ का लोकसभा चुनावलड़ा और २८२ सीटें जीतकर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।[4] एक सांसद के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी एवं अपने गृहराज्य गुजरात के वडोदरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और दोनों जगह से जीत दर्ज़ की।[5][6]
इससे पूर्व वे गुजरात राज्य के १४वें मुख्यमन्त्री रहे। उन्हें उनके काम के कारण गुजरात की जनता ने लगातार ४ बार (२००१ से २०१४ तक) मुख्यमन्त्री चुना। गुजरात विश्वविद्यालय सेराजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त नरेन्द्र मोदी विकास पुरुष के नाम से जाने जाते हैं और वर्तमान समय में देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से हैं।।[7] माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर भी वे सबसे ज्यादा फॉलोअर वाले भारतीय नेता हैं।[8] टाइम पत्रिका ने मोदी को पर्सन ऑफ़ द ईयर २०१३ के ४२ उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया है।[9]
अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नरेन्द्र मोदी एक राजनेता और कवि हैं। वे गुजराती भाषा के अलावा हिन्दी में भी देशप्रेम से ओतप्रोत कविताएँ लिखते हैं।[10][11]
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

मुज़फ्फ्फरनगर में नहीं लड़कियों के मानवाधिकार


अभी ९ सितम्बर को मुज़फ्फरनगर के जिलाधिकारी ने जिले में बढ़ती छेड़छाड़ की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए एक बहुत ही बेहतरीन कदम उठाने के बारे में कहा था जिसे अमरउजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था -
शहर के चौराहों पर रखा जाएगा मंजनू पिंजरा[अमर उजाला से साभार ]
मुजफ्फरनगर। डीएम ने कहा जिले में छेड़छाड़ की घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शहर के सभी चौराहों पर मंजनू पिंजरा रखा जाएगा। पकड़े मंजनू को इसे में बंद किया जाएगा। यदि कोई छेड़खानी करता है तो उसकी 1090 पर शिकायत करें।
डीएम और एसएसपी की टीम ने मंगलवार जैन डिग्री कॉलेज के आसपास अभियान चलाकर आठ मंजनुओं को पकड़ा। बाद में उनके अभिभावकों को बुलाकर चेतावनी के बाद छोड़ दिया। डीएम ने बताया शहर के सभी चौराहों पर मजनूं पिंजरा रखा जाएगा। जो भी मंजनू पकड़ा जाएगा उसे इसी पिंजरे में रखा जाएगा। एसएसपी केबी सिंह ने बताया मंजनुओं को पकड़ने के लिए पूरे जिले में अभियान चलाया जा रहा है। पुलिस की गोपनीय टीम बनाकर मंजनुुओं पर नजर रखेगी। महिला थाना इंचार्ज, शहर के तीनों थानाध्यक्षों को मंजनुओं के खिलाफ अभियान चलाने के लिए कहा गया है।]
और इससे पहले कि यह अमल में आ पाता कि उठ खड़े हुए मानवधिकार संगठन और सामाजिक संगठन इसके विरोध में -
शोहदों को कैद नहीं कर पाएगा ‘मजनू पिंजरा’[अमर उजाला से साभार ]
बखेड़ा खड़ा होने पर प्रशासन का फरमान वापस
स्कूल-कालेजों के बाहर लगेंगे सीसीटीवी कैमरे
छात्राओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं बवाल और संघर्ष का रूप ले लेती हैं। डीएम ने डीआईओएस को प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। कन्या कालेज और स्कूलों के बाहर प्रबंध समिति से वार्ता कर तत्काल सीसीटीवी कैमरे लगवाए जाएं। एसएसपी केबी सिंह को निर्देश दिया कि सादी वर्दी में महिला एवं पुरुष बल गोपनीय टीमों के साथ स्कूली क्षेत्रों पर तैनात किया जाए। पुलिस की मोबाइल टीमें वायरलेस सेट से युक्त हों, जिससे तत्काल वूमेन पावर लाइन 1090 पर कॉल ट्रांसफर की जाए। छेड़छाड़ से जुड़ी शिकायतों का निस्तारण शीघ्र किया जाएगा। महिला थाना, कोतवाली और सिविल लाइन एवं मंडी थाने के प्रभारियों की टीमें गठित कर दी गई हैं।
अमर उजाला ब्यूरो
मुजफ्फरनगर। शहर के चौराहों पर मजनू पिंजरा रखकर शोहदों पर अंकुश लगाने का प्रशासन का फैसला विवादों में घिर गया है। छेड़छाड़ की घटनाओं पर रोकथाम के लिए मजनुओं के खिलाफ पुलिस का धरपकड़ अभियान चल रहा है। मंगलवार को प्रशासन ने मजनू पिंजरा चौराहों पर रखने का फरमान जारी किया था। इसे लेकर मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों ने बखेड़ा खड़ा कर दिया।
महिलाओं और छात्राओं से छेड़छाड़ की घटना गंभीर समस्या है। फिलहाल डीएम निखिल चंद्र शुक्ला के निर्देश पर जिलेभर में मजनुओं की धरपकड़ की जा रही है, ताकि स्कूल-कालेजों के बाहर बेटियों को सुरक्षा का माहौल मिल सके। इसी बीच पुलिस प्रशासन का मजनू का पिंजरा शहर के चौराहों पर रखे जाने का निर्णय विवादों में घिर गया है। मामला मीडिया में उछलने के बाद लखनऊ तक हलचल मच गई। बॉलीवुड की फिल्मों और सर्कस में लोहे के ऐसे पिंजरे नजर आते हैं। जैसे ही मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों में पिंजरे में शोहदों को कैद कर चौराहे पर शर्मसार करने की प्रशासन की मंशा पर चर्चा हुई तो मामले में पेंच फंस गया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने प्रशासन के निर्णय पर उंगली उठाते हुए लखनऊ तक शिकायतें भेज दीं। इनका कहना था कि छेड़छाड़ की घटनाओं को रोकने के लिए पिंजरे का इस्तेमाल मानवीय रूप से अनुचित है। मानवाधिकार मामलों के पैरवी करने वाले एडवोकेट मनेश गुप्ता कहते हैं कि कानून में छेड़छाड़ के दोषियों के खिलाफ तर्कसंगत कार्रवाई का प्रावधान है, ऐसे में चौराहों पर पिंजरों का कोई औचित्य नहीं है। पिंजरे का मामला शासन तक गूंजा तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। डीएम निखिल चंद्र शुक्ला ने सूचना विभाग के जरिये भेजी विज्ञप्ति में कहा है कि मजनू के पिंजरे का इस्तेमाल हकीकत में नहीं किया जाना था, बल्कि मजनुओं में प्रशासन का भय व्याप्त करना था। चरथावल के हैबतपुर में बस में स्कूल जाती लड़कियों से छेड़छाड़ की घटना के बाद डीएम ने सभी एसडीएम और सीओ को इस बारे में अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। कहा कि देहात के बस स्टैंड पर स्कूल के समय मौजूद असामाजिक तत्वों और शोहदों के खिलाफ चेकिंग कर निरोधात्मक कार्रवाई की जाए।
सादी वर्दी में पुलिसकर्मियों को भी तैनात किया जाए। छेड़छाड़ की घटनाओं पर एसएसपी के साथ पाक्षिक समीक्षा बैठक की जाएगी।

जैसे कि ये पिंजरे सामान्य लड़कों के लिए रखा जा रहा हो .वे लड़के जो लड़कियों को परेशान करने के लिए उन्हें अभद्र तरीकों से छेड़ने के लिए सड़कों पर घंटों खड़े रहते हैं ,दुकानों के स्लैब पर बैठे रहते हैं ,गलियों में और वो भी तंग गलियों में मोबाइल लिए अश्लील गाने बजाते रहते हैं ,जिनके कारण कभी लड़की के माँ-बाप तो कभी भाई को अपने पास समय न होते हुए भी उसे स्कूल कॉलेज ,ट्यूशन  पर छोड़ने के लिए आना पड़ता है जबकि वह स्वयं जा सकती है और कभी कभी या कहूँ तो ज्यादातर इन शोहदों के द्वारा की गयी हरकत का विरोध करने पर हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है जो अभी हैबतपुर [चरथावल ]में हुआ जहाँ लड़कियां अब कॉलेज जाने का भी साहस भी नहीं कर पा रही हैं -
स्कूल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही छात्राएं
हैबतपुर बवाल के बाद गांव में तनाव, पुलिस-पीएसी डटी रही
अमर उजाला ब्यूरो
चरथावल। हैबतपुर में हुए बवाल के बाद गांव में तनावपूर्ण शांति हैं, हालांकि छात्राएं स्कूल, कालेज जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही। मामले की संवेदनशीलता को देख गांव में पुलिस और पीएसी डटी रही। उधर, दोपहर में कसबे के बस स्टैंड पर छात्रों के गुटों में मारपीट होने का शोर मचने से माहौल गर्माया।
हैबतपुर के भट्ठे पर छात्राओं को बस से खींचने के मामले में हालात नियंत्रण में लेकिन तनावपूर्ण हैं। बस से खींचने की घटना से छात्राएं अभी भी कालेज जाने से डर रही हैं, उनके परिजन भी उन्हें कालेज भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। देहात क्षेत्रों से पढ़ने के लिए आने वाली छात्राएं भी कम ही कालेज आ रही हैं। हैबतपुर से यह संख्या तो बहुत कम है।
हालांकि घटना की संवेदनशीलता तो देखते हुए पुलिस प्रशासन गंभीर है और सीओ सदर अकील अहमद, एसओ आनंद मिश्रा पूरे दिन पुलिस बल के साथ गांव में डेरा डाले रहे। पीएसी भी यहां डेरा डाले है। कथित फर्जी नामजदगी के कारण कोई भी व्यक्ति सच बोलने को तैयार नहीं है। बुधवार को कस्बे के बस स्टैंड पर दोपहर में छात्रों के दो गुटों में मारपीट हो गई, इसे लेकर शोर मच गया कि हैबतपुर के छात्र आपस में भिड़ गए हैं। सूचना पर पुलिस ने बस स्टैंड पर दबिश दी, लेकिन तब तक छात्र रफूचक्कर हो चुके थे। हैबतपुर प्रकरण से बड़े नेताआें ने खुद को दूर रखे हुए हैं हालांकि अलग-अलग दलों से जुडे़ दोनों समुदाय के नेता आपसी सद्भाव बनाने की अपील कर रहे हैं।]
उनके लिए मानवाधिकार व् सामाजिक संगठन उठें हैं क्या लड़कियों के कोई मानवाधिकार नहीं हैं ,क्या उन्हें संविधान द्वारा दिए गए गरिमा से जीने का अधिकार नहीं मिले हैं जो उन्हें ये सब झेलने को विवश होना पड़ता है .तब कहाँ होते हैं ये मानवाधिकार व् सामाजिक संगठन जब एक लड़की ऐसे छेड़छाड़ का शिकार होकर समाज में अपमानित होती है .तब तो ये संगठन सड़कों हों तो सरक लेते हैं ,बसों में हों तो आँखें बंद कर लेते हैं .क्या ऐसे लड़के जब सड़कों पर समय बिताते ही हैं तो अगर पिंजरों में बैठ बिता लेंगे तो उनके अधिकार पर चोट पहुंचेंगी या फिर समाज के माहौल में सुधार .कानून ने लड़कियों की सुरक्षा के लिए बहुत से उपाय किये हैं किन्तु मनीष गुप्ता जी को भी ये तो जानना ही चाहिए कि कानूनी प्रक्रिया में बहुत देर लगती है और हर लड़की व् उसके घर वाले कानून का दरवाजा खटकना उचित नहीं समझते क्योंकि बहुत सी बार उन्हें वहां भी निर्दोष होते हुए अपमान के घूँट पीने पड़ते हैं और तब कोई मानवाधिकार संगठन या सामाजिक संगठन उनकी मदद के लिए वहां खड़ा नहीं होता .ऐसे में तो ये ही कहना होगा कि मुज़फ्फरनगर हमेशा की तरह अपराध के ही साथ है और लड़कियों के लिए तो यह बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है क्योंकि -

मुज़फ्फरनगर रखता हर बात में है शान
मानव हैं इनके लड़के ,लड़कियों में न जान ,
सताना लड़कियों को अधिकार लड़कों का
घंटों सड़कों पर ये कर सकें बबाल,
इनकी वजह से रहती हैं लड़कियां पिंजरों में
ये अगर रहें पिंजरे में ये इनका है अपमान .

शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]

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