शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .-2 october

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एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की,
दोनों ने ही अलख जगाई देश की खातिर मरने की .
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जेल में जाते बापू बढ़कर सहते मार अहिंसा में ,
आखिर में आवाज़ बुलंद की कुछ करने या मरने की .
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लाल बहादुर सेनानी थे गाँधी जी से थे प्रेरित ,
देश प्रेम में छोड़ के शिक्षा थामी डोर आज़ादी की .
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सत्य अहिंसा की लाठी ले फिरंगियों को भगा दिया ,
बापू ने अपनी लाठी से नीव जमाई भारत की .
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आज़ादी के लिए लड़े वे देश का नव निर्माण किया ,
सर्व सम्मति से ही संभाली कुर्सी प्रधानमंत्री की .
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मिटे गुलामी देश की अपने बढ़ें सभी मिलकर आगे ,
स्व-प्रयत्नों से दी है बढ़कर साँस हमें आज़ादी की .
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दृढ निश्चय से इन दोनों ने देश का सफल नेतृत्व किया
ऐसी विभूतियाँ दी हैं हमको कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .
शालिनी कौशिक
[कौशल]

सोमवार, 26 सितंबर 2016

मुस्लिम महिलाओं को भी मिले तीन तलाक का अधिकार

मुस्लिम विधि में तलाक का एक तरीका है - "तलाक - उल - बिददत". वर्तमान में यह तरीका ही विवाद का विषय बना हुआ है और आंध्र व तेलंगाना के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष आबिद रसूल खान का इसी तलाक के दुष्परिणाम के लिए कहना है "कि आज मुस्लिम समुदाय के सामने यह बड़ी सामाजिक समस्या है क्योंकि सही मायने में लाखों की संख्या में महिलाएं तलाक से पीड़ित हैं. उनके पतियों ने तीन बार तलाक शब्द का इस्तेमाल कर उन्हें अलग कर दिया. मैंने पर्सनल लॉ बोर्ड व जमियत - उलेमा - ए-हिंद को लिखा है कि 3 साल के मेरे कार्यकाल में मैने पाया है कि तमाम मुस्लिम महिलाएं उत्पीड़न, परित्याग, गुजारा भत्ता न मिलने जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं. "उन्होंने कहा कि बोर्ड तीन तलाक पर जोर देता है तो वह हमारी लाखों बहनों के साथ अन्याय कर रहा है.                                                                                      
  अब यदि हम आगे इस विषय में कुछ कहना चाहते हैं तो पहले जरूरी है कि इस तलाक के रूप को भली भांति समझ लें - " तलाक - उल - बिददत को तलाक - उल - बैन के नाम से भी जाना जाता है. यह तलाक का निंदित या पापमय रूप है. विधि की कठोरता से बचने के लिए तलाक की यह अनियमित रीति ओमेदिया लोगों ने हिज्रा की दूसरी शताब्दी में जारी की थी. शाफई और हनफी विधियां तलाक - उल - बिददत को मान्यता देती हैं यघपि वे उसे पापमय समझते हैं. शिया और मलिकी विधियां तलाक के इस रूप को मान्यता ही नहीं देती. तलाक की यह रीति नीचे लिखी बातों की अपेक्षा करती है -                                
 1- एक ही तुहर के दौरान किये गये तीन उच्चारण, चाहे ये उच्चारण एक ही वाक्य में हों-"जैसे - मैं तुम्हें तीन बार तलाक देता हूं. " अथवा चाहे ये उच्चारण तीन वाक्यों में हों जैसे -" मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं. "                                                      
  2-एक ही तुहर के दौरान किया गया एक ही उच्चारण, जिससे    रद्द न हो सकने वाला विवाह विच्छेद का आशय साफ प्रकट हो :जैसे"  मैं तुम्हें  रद्द न हो सकने वाला तलाक देता हूं."                                                  
      आज ये तलाक विवाद का विषय बना है और इसे गैर इस्लामिक कहकर मुस्लिम विधि से हटाये जाने की कोशिश जारी है जो कि असंभव ही लगता है क्योंकि आजतक भी मुस्लिम पर्सनल लॉ में कभी न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया गया है. एेसा कोई भी परिवर्तन निश्चित रूप में बाद में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ही जिम्मे सौंप दिया जाएगा. अब ये मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ही ऊपर है कि वह यहां भी अपनी महिलाओं के साथ समानता दिखाये जैसा कि वह हमेशा से यह दावा करता आया है कि मुस्लिम समुदाय में समानता का अधिकार है क्योंकि यहां मुस्लिम महिलाओं को मेहर का अधिकार मिला है. अब अगर समानता है तो मुस्लिम महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को करके दिखाना चाहिए कम से कम उन्हें भी तीन तलाक के प्रयोग का अधिकार तो मिलना ही चाहिए.                                          
 शालिनी कौशिक एडवोकेट,
(कौशल) 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

कैराना : राजनीति पलायन की

कैराना उत्तर प्रदेश की यूं तो मात्र एक तहसील है किन्तु वर्तमान विधान सभा चुनाव के मद्देनजर वोटों की राजधानी बना हुआ है. इसमे पलायन का मुद्दा उठाया गया है और निरन्तर उछाल दे देकर इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देकर वोट बैंक में तब्दील किया जा रहा है जबकि अगर हम मुद्दे की गहराई में जाते हैं तो पलायन की जो मुख्य वजह है "अपराध" वह कोई एक दो दिन में पनपा हुआ नहीं है वह कैराना क्षेत्र की जड़ों में बरसो - बरस से फैला हुआ है. रंगदारी की मांग यहाँ अपराध का एक नवीन तरीका मात्र है. आम जनता में अगर हम जाकर अपराध की स्थिति की बात करें तो आम आदमी का ही कहना है कि कैराना में कभी दंगे नहीं हो सकते क्योंकि अगर यहां दंगे होते हैं तो सेना यहां आकर घर घर पर दबिश देगी और उससे यहां पर घर घर पर अस्तित्व में रहने वाले बम, कट्टे, तमंचे, नशीली दवाओं आदि के अवैध कारोबार का पटाक्षेप हो जायेगा और यही एक कारण है जिस वजह से आज कैराना " मिनी पाकिस्तान" की उपाधि पा चुका है. मिनी पाकिस्तान यूं क्योंकि जो मुख्यतः पाकिस्तान है वह आतंक के अपराध के अड्डे के रूप में वर्तमान में विश्व में   खूब नाम कमा रहा है.      
                     आज चुनावों को देखते हुए उसी अपराध के शिकार और लगभग इसके आदी हो चुके लोगों के यहां से जाने को " पलायन"  कहकर भुनाया जा रहा है और उन राजनीतिक तत्वों द्वारा ये किया जा रहा है जो बरसों बरस से उन पीड़ितों के ही खैरखवाह के ही रूप में रहे हैं और जो सब कुछ देखकर भी अपनी आंखें मूंदकर बैठे रहे और जिस कारण यह घाव नासूर के रूप में उभरकर सामने आया है. तब और अब के पाखंड को देखते हुए राजनीतिक व्यवहार के लिए मन में यही भाव आते हैं-  
                  " लोग जाते रहे ये लखाते रहे,                                      
              आज हमदर्दी क्यूं कर जताने लगे."                              
                वैसे अगर हम पलायन की इस समस्या के मूल में जाते हैं तो  अपराध से भी बड़ा कारण यहां रोजगार के अभाव का होना है. तरक्की का इस क्षेत्र से दूर दूर तक भी कोई ताल्लुक नहीं है. आज भी यहां सदियों पुरानी परंपरा जड़े जमाये हैं जिसके कारण लोगों की सोच पुरानी है और आगे बढने के रास्तों पर बंदिशें लगी हैं इसलिए जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए और अपनी प्रतिभा के सही इस्तेमाल के लिए भी यहां से लोग बाहर जा रहे हैं और यही बात कैराना से सटे काँधला कस्बे के एक कारोबारी गौरव जैन द्वारा जी टीवी पर इंटरव्यू में कही गई जिसके परिवार का नाम पलायन वादियों की  लिस्ट में शामिल किया गया और जिसके काँधला स्थित घर पर इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने वाले तत्वों द्वारा " यह मकान बिकाऊ है"  लिख दिया गया. गौरव जैन द्वारा साफ साफ ये कहा गया कि मैं अपने काम के कारण बाहर गया हूँ मुझे या मेरे परिवार को कोई रंगदारी की चिट्ठी नहीं मिली है.                              
                   एेसे में साफतौर पर इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने वाले और इसे वास्तविकता मानने वाले राजनीतिज्ञों की मंशा व उस मंशा के अनुसार जांच दिखा अपनी पुष्टि की मुहर लगाने वाले मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर ऊंगली उठना लाजिमी है. सच्चाई क्या है यहां की जनता भी जानती है और नेता भी, बस सब अपनी जिम्मेदारी से बचने के तरीके ढूंढते हैं. अपराध का सफाया और विकास ये इस क्षेत्र की मुख्य जरूरत हैं जो यहां के नेता कभी नहीं होने देंगे क्योंकि जिस दिन ये हो गया नेताओं की राजनीति की जड़ें कट जायेंगी, ये यहाँ की जनता कहती है.
शालिनी कौशिक  
     [कौशल ]            
                                               एडवोकेट                                                                                                                          

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारी...