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......लो फिर बिक गया .....

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कल से उत्तर-प्रदेश में नगरपालिका चुनावों में पहले चरण का मतदान आरम्भ होने जा रहा है .सभी मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए निष्पक्ष एवं स्वतंत्र मतदान करेंगे.इससे बड़ा झूठ इस भारतीय लोकतंत्र में नहीं हो सकता. निष्पक्ष एवं स्वतंत्र मतदान की हामी भरने वाला भारतीय लोकतंत्र किस हद तक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र है इसे हमारे नेतागण से कहीं ज्यादा हमारे वोटर जानते हैं जो भारतीय लोकतंत्र में मतदान का कार्य तो करते हैं किन्तु पूरी तरह से लालच की भावना के वशीभूत होकर और यह कोई एक दो दिन की तैयारी से नहीं वरन वर्षो पुरानी सोची-समझी रणनीति के तहत किया जाता है .
     एक व्यक्ति की वोट एक जगह ही होगी हमारी सरकार व् सुप्रीम कोर्ट इसके लिए प्रयत्नशील है और इसके लिए ही वह आधार कार्ड को लेकर ज़रूरी घोषणाओं में व्यस्त है क्योंकि आधार कार्ड अगर ज़रूरी हो गया तो पूरे भारत वर्ष में एक व्यक्ति की एक जगह की उपस्थिति पूरे देश में उसकी उपस्थिति मानी जाएगी क्योंकि आधार नंबर पूरे देश में एक ही होता है क्योंकि इस नंबर में व्यक्ति के अंगूठे की छाप ली जाती है और ये नहीं पलटती इसलिए आदमी का नंबर भी नहीं पलट स…

इंदिरा गाँधी -ध्रुवतारा :... सबसे प्यारी

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इंदिरा गाँधी -ध्रुवतारा :विरोधियों के कुत्सित प्रयासों के बाद भी सबसे प्यारी

चुनाव आयोग ख़त्म ......?

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उत्तर प्रदेश में नगरपालिका चुनाव कार्यक्रम आरम्भ हो चुका है .चुनाव आचार संहिता अधिसूचना जारी होते ही लागू हो चुकी है .सरकारी घोषणाओं पर विराम लग चुका है ,सरकारी बंदरबाट फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में बंद हो चुकी है किन्तु भारत के अन्य राज्यों की तरह यह राज्य भी संप्रभु नहीं है .यह भारत संघ का एक राज्य है इसलिए इसमें जो अंकुश लगता है वह केवल इसी राज्य की सरकार पर लगता है .यह राज्य जिस संघ से ,जिस देश से जुड़ा है उस पर कोई अंकुश नहीं लगता और ऐसा अंकुश न होना चुनाव वाले राज्यों के वोटरों पर प्रभाव डालने हेतु पर्याप्त फायदेमंद हो जाता है राजनीतिक दलों के लिए और उस स्थिति में और भी ज्यादा जब सम्बंधित राज्य में जिस दल की सरकार हो उसी दल की सरकार केंद्र में हो और इस वक़्त ये स्थिति सर्वाधिक फायदेमंद है भाजपा के लिए क्योंकि उत्तर प्रदेश में व् केंद्र में दोनों में ही भाजपा की सरकार है .
              देश में बड़ी बड़ी बातें करने वाले कई राजनीतिक दल हैं लेकिन जो इनके बीच स्वयं को ''ग्रेट'' की श्रेणी में रखती है उसी भाजपा ने नगरपालिका चुनावों में उतरते हुए बहुत निचले स्तर को छूने का कार्य…

बच्चे बदले क्यूँ न जब चाचा बदले ?

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बचपन जीवन का स्वर्णिम समय होता है .न कोई फ़िक्र न कोई परवाह ,अपनी मस्ती में बचपन के दिन बीतते रहते हैं .ये समय ऐसा होता है जब मन पर न तो किसी के लिए कोई निन्दित भाव होता है और न ही बहुत ज्यादा प्यार का भाव ,किसी का जरा सा प्यार अगर बच्चे को उसके करीब ला देता है तो जरा सी फटकार बच्चे को उससे कोसो मील दूर बैठा देती है .इसीलिए ही पढाई का सबसे बेहतरीन समय बचपन माना जाता है क्योंकि इसमें बालमन उस स्लेट की तरह होता है जो कोरी होती है जिस पर कुछ लिखा नहीं होता और जिस पर वही लिखा जाता है जो उसका गुरु लिख देता है . ऐसी ही बालमन की दशा को लेकर कबीरदास जी कह गए हैं -
''गुरु कुम्हार सिष कुम्भ है ,गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट ,
अंतर हाथ सहार दे ,बाहर बाहे चोट .''
        अर्थात गुरु कुम्हार है और सिष कुम्भ के समान है जो कुम्हार की तरह अपने सिष कुम्भ के खोट दूर करता है ,वह उसके अंतर अर्थात ह्रदय को सहारता है अर्थात सराहता है  और बाहर से चोट करता है अर्थात उसे मजबूत करता है .
        ऐसी कोमल मनोवृति जो सब कुछ अपने में समा लेती है वह बच्चो की ही होती है और इसीलिए ये देखने में आ रहा है कि बच…

नारी तो चुभती ही हैं .

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नहटौर में एक चुनावी सभा में ''आप''नेता अलका लम्बा पर पत्थर से हमला ,कोई नई बात नहीं है .राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाली महिलाएं आये दिन कभी शब्द भेदी बाणों का तो कभी पत्थरों आदि के हमलों का शिकार होती रहती हैं .ममता बनर्जी तो पश्चिमी बंगाल में इसका जीता-जागता उदाहरण हैं और देश की प्रथम महिला व् पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी तो इस क्षेत्र में किंवदंती बन चुकी हैं .ममता बनर्जी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर वामपंथियों का ख़ौफ़ग्रस्त होना सब जानते हैं क्योंकि इसी खौफ के चलते उन्होंने अपनी सत्ता जाते देख ममता बनर्जी को मरवाने की कोशिश तक कर डाली थी और रही इंदिरा गाँधी जी की बात उन्हें देख तो उनके विपक्षियों की रूहें उनके जीते-जी भी कांपती थी ही उनके मरने के बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया हैं आज भी उनके नाम से सभी विपक्षियों के शरीर में कंपकपी दौड़ जाती हैं और इसलिए आज भी कोई भी चुनाव हो या देश में कोई भी नवीन शुरुआत इंदिरा गाँधी का नाम ले विपक्षी दल उनकी नियत व् चरित्र पर हमले कर इंदिरा गाँधी को चाहने वाली जनता को उनसे तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं जबकि आज…

पटाखों बिना क्या शादी क्या चुनाव !

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चारो तरफ धुंआ ही धुंआ दिखाई दे रहा था आज सारे दिन और सूरज की रौशनी का कहीं नामो-निशान नहीं था .पहले तो सुबह सुबह यही लगता रहा कि या तो बादल हैं या कोहरा किन्तु जैसे जैसे दिन बढ़ा यह महसूस होने लगा कि यह न तो बादल का असर है न कोहरे का दुष्प्रभाव क्योंकि वह साफ तौर पर धुंआ नज़र आ रहा था और  कारण के लिए पिछली रात में अपने कुत्ते जॉन्टी के भौंक-भौंक कर कमरे में अंदर करने की अनुनय विनय की ओर ध्यान गया और याद आया कि कल रात भी काफी सारे पटाखे छोड़े गए थे तब धुंआ होना स्वाभाविक था और फिर रही सही कसर आज के समाचारपत्रों की रिपोर्ट ने पूरा कर दिया जिसमे नगर पालिका चुनावों में आतिशबाजी के जबरदस्त इस्तेमाल के समाचार प्रकाशित थे .        अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली-एनसीआर में दिवाली के मौके पर पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने पर काफी तीखी प्रतिक्रिया हमारे बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा व्यक्त की गयी थी चेतन भगत को मैं बुद्धिजीवी ही कहूँगी जिन्होंने महान उपन्यासकार होते हुए इस प्रतिबन्ध की आलोचना की पर उद्धव ठाकरे को मैं बुद्धिजीवी की श्रेणी में नहीं रखूंगी क्योंकि वे तो नेता हैं और नेता बुद…

अरे घर तो छोड़ दो

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''सियासत को लहू पीने की लत है ,
 वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .''
        महज शेर नहीं है ये ,असलियत है हमारी सियासत की ,जिसे दुनिया के किसी भी कोने में हो ,लहू पीने की ऐसी बुरी लत है कि उसके लिए यह सड़कों से लेकर चौराहों तक, राजमहलों से लेकर साधारण घरों तक भी दौड़ जाती  है .उत्तर प्रदेश में इस वक्त नगरपालिका चुनावों की धूम मची है और हर तरफ उम्मीदवारों की लाइन लगी हुई हैं .लगें भी क्यों न आखिर पांच साल में एक बार ही तो ये मौका हाथ लगता है और राजनीति में उतरे हुए लोगों के क्या वारे-न्यारे होते हैं ये तो सभी जानते हैं ,आखिर जिस सरकारी नौकरी के लिए एक आम आदमी कहाँ-कहाँ की ठोकर खाता फिरता है उसे छोड़कर सेवा का नाम लेकर सोने के पालने में झूलने यूँ ही तो बड़े-बड़े तीसमारखाँ यहाँ नहीं आ रहे .
          नगरपालिका चुनाव एक तरह से एक जगह पर रहने वाले लोगों के बीच का ही चुनाव होता है इसमें किसी भी बाहरी व्यक्ति का कोई दखल नहीं होता ,पर अब लगता है कि कानून में फेरबदल हो ही जाना चाहिए क्यूंकि राजनीतिक दल विशेष रूप से राष्ट्रीय स्तर के दल भी इसमें टिकट देने लगे हैं और उम्मीदवार जो कि अब…

माँ - एक लघु कथा

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''ये शोर कैसा है ''नरेंद्र ने अपने नौकर जनार्दन से पूछा ,कुछ नहीं बाबूजी ,वो माता जी को खांसी का धसका लगा और उनसे मेज गिर गयी जिससे उसपर रखी हुई दवाइयां इधर-उधर गिर गयी ,जनार्दन ने बताया ,''पता नहीं कब मरेंगी  मेरी इतनी मेहनत की कमाई यूँ ही स्वाहा हुई जा रही है ,वे तो मेरे और इस घर पर बोझ ही बनकर पड़ गयी हैं .घर से निकाल नहीं सकता लोगों में सारी इज़ज़त गिर जायेगी मेरी ''बड़बड़ाते हुए नरेंद्र बाहर चले गए . नरेंद्र....नरेंद्र...धीमी सी आवाज़ में कौशल्या देवी ने मुश्किल से आवाज़ लगायी तो जनार्दन तेज़ी से भागकर वहाँ पहुंचा ,जी माता जी ,जनार्दन के कहने पर कौशल्या देवी बोली ,''जनार्दन! कहाँ है नरेंद्र ?''..जी वे तो बाहर चले गए ..जनार्दन के कहने पर कौशल्या देवी बोली ..वो कुछ गुस्सा हो रहा था ,क्यूँ किस पर ?..जी आप पर ,वे कहते हैं कि आप घर पर बोझ हैं .''..जनार्दन के मुंह से ये सुनकर कौशल्या देवी का मन बैठ गया वे दुखी मन से बोली ,''मेरे पर क्यूँ गुस्सा हो रहा था ..मैंने क्या किया ...आज तक उसका और इस घर का करती ही आ रही हूँ ,जरा सा बीमार क्…

सच ! तू तो बदल गया .

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पड़ोस में आंटी की सुबह सुबह चीखने की आवाज़ सुनाई दी ....
''अजी उठो ,क्या हो गया आपको ,अरे कोई तो सुनो ,देखियो क्या हो गया इन्हें ...'' हालाँकि हमारा घर उनसे कुछ दूर है किन्तु सुबह के समय कोलाहल के कम होने के कारण उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी ,मैंने ऊपर से आयी अपनी बहन से कहा कि ''आंटी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही हैं लगता है कि अंकल को कुछ हो गया है ,वैसे भी वे बीमार रहते हैं ''वह ये सुनकर एकदम भाग ली और उसके साथ मैं भी घर को थोडा सा बंदकर भागी ,वहाँ जाकर देखा तो उनके घर के बराबर में आने वाले एक घर से दो युवक उनकी सहायता के लिए आ गए थे किन्तु अंकल को जब डाक्टर को दिखाया तो वे हार्ट-अटैक के कारण ये दुनिया छोड़ चुके थे किन्तु आंटी के बच्चे दूर बाहर रहते हैं और उनके आने में समय लगता इसलिए उन्हें यही कहा गया कि अंकल बेहोश हैं .उनके पास उनके घर का कोई आ जाये तब तक के लिए मैं भी वहीँ रुक गयी .बात बात में मैंने उनसे पूछा कि आंटी ये सामने वाली आंटी क्या आजकल यहाँ नहीं हैं ?मेरा प्रश्न सुनकर उनकी आँख भर आयी और वे कहने लगी कि यहीं हैं और देखलो आयी नहीं .मैं भी आश्चर…

तू गुलाम है .....

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जनता सोना छोड़ो

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दिल्ली के गांधीनगर में पांच वर्षीय गुडिया के साथ हुए दुष्कर्म ने एक बार फिर वहां की जनता को झकझोरा और जनता जुट गयी फिर से प्रदर्शनों की होड़ में .पुलिस ने एफ.आई.आर.दर्ज नहीं की ,२०००/-रूपए दे चुप बैठने को कहा और लगी पुलिस पर हमला करने -परिणाम एक और लड़की दुर्घटना की शिकार -ए.सी.पी. ने लड़की के ऐसा चांटा मारा कि उसके कान से खून बहने लगा .
        बुरी लगती है सरकार की प्रशासनिक विफलता ,घाव करती है पुलिस की निर्दयता किन्तु क्या हर घटना का जिम्मेदार सरकार को ,पुलिस को कानून को ठहराना उचित है ?क्या हम ऐसे अपराधों के घटित होने में अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं देखते ?
       १५ फरवरी सन १९९७कांधला   जिला मुजफ्फरनगर में एक दुकान में डाक्टरी कर रहे एक डाक्टर का सामान दुकान मालिक द्वारा नहर में डाल दिया गया ,सुबह जब वह अपने क्लिनिक में पहुंचा तो वहां कोई सामान न देख वह मामला समझ मार-पीट पर उतारू हो गया .दोनों तरफ से लोग जुटे और जुट गयी एक भीड़ जो तमाशबीन कही जाती है .वे डाक्टर को कुल्हाड़ी से ,लाठी से पीटते मारते रहे और जनता ये सब होते देखती रही .क्यों नहीं रोका किसी ने वह अपराध घटित होने से ?जबकि भीड़ अग…

बेघर बेचारी नारी

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निकल जाओ मेरे घर सेएक पुरुष का ये कहना अपनी पत्नी से आसान बहुत आसान किन्तु क्या घर बनाना उसे बसाना सीखा कभी पुरुष ने पैसा कमाना घर में लाना क्या मात्र पैसे से बनता है घर नहीं जानता घर ईंट सीमेंट रेत का नाम नहीं बल्कि ये वह पौधा जो नारी के त्याग, समर्पण ,बलिदान से होता है पोषित उसकी कोमल भावनाओं से होता पल्लवित पुरुष अकेला केवल बना सकता है मकान जिसमे कड़ियाँ ,सरिये ही रहते सिर पर सवार घर