मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

दहेज लोभियों को सबक



Purple turban with gem and pearls isolated on white - stock photo Father_daughter : mother and baby hands at homeIndian Headgear used in Marriages / occasions - stock photo
मंडप भी सजा ,शहनाई बजी ,

आई वहां बारात भी ,
मेहँदी भी रची ,ढोलक भी बजी ,
फिर भी लुट गए अरमान सभी .
समधी बात मेरी सुन लो ,अपने कानों को खोल के ,
होगी जयमाल ,होंगे फेरे ,जब दोगे तिजोरी खोल के .
आंसू भी बहे ,पैर भी पकड़े ,
पर दिल पत्थर था समधी का ,
पगड़ी भी रख दी पैरों में ,
पर दिल न पिघला समधी का .
सुन लो समधी ये भावुकता ,विचलित न मुझे कर पायेगी ,
बेटे पर खर्च जो मैंने किया ,ये मुझको न दे पायेगी .
देख पिता की हालत को ,
बेटी का घूंघट उतर गया .
सम्मान जिन्हें कल देना था ,
उनसे ही माथा ठन गया .
सुन लो बाबूजी बात मेरी ,अब खुद की खैर मना लो तुम ,
पकड़ेगी पुलिस तुम्हें आकर ,खुद को खूब बचा लो तुम .
सुनते ही नाम पुलिस का वे ,
कुछ घबराये ,कुछ सकुचाये ,
फिर माफ़ी मांग के जोड़े हाथ ,
बोले रस्मे पूरी की जाएँ .
पर बेटी दिल की पक्की थी ,बाबूजी से अड़कर बोली ,
अब शादी न ये होगी कभी ,बोलो चाहे मीठी बोली .
ए लड़की !बोलो मुँह संभाल ,
तू लड़की है ,कमज़ोर है ,
हम कर रहे बर्ताव शरीफ ,
समझी तू शायद और है .
बेटी से ऐसी भाषा पर ,बाप का क्रोध भी उबल पड़ा ,
समधी को पकड़ के  खुद ही पुलिस में  देने चल पड़ा .
आ गयी पुलिस , ले गयी पकड़ ,
लालच के ऐसे मारों को ,
देखा जिसने की तारीफें ,
अच्छा मारा इन यारों को .
लड़के वाला होने का घमंड ,जब हद से आगे जायेगा ,
बेटे का बाप बारातों संग ,तब जेले ही भर पायेगा .
बेटी ने लाकर पगड़ी को ,
पिता के शीश पर रख दिया .
पोंछे आंसू माँगा वादा ,
दुर्बल न होगा कभी जिया .
बदलेंगे सोच अगर अपनी ,कानून अगर हम मानेंगे ,
तब बेटी को अपने ऊपर न बोझ कभी हम मानेंगे .
सबक दहेज़ के दानवों को ,गर यूँ बढ़कर सिखलाएंगे ,
सच्चे अर्थों में हम जीवन बेटी को तब दे पाएंगे .
                शालिनी कौशिक 
                              [कौशल ]






शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने ,


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तखल्लुस कह नहीं सकते ,तखैयुल कर नहीं सकते ,

तकब्बुर में घिरे ऐसे ,तकल्लुफ कर नहीं सकते .

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मुसन्निफ़ बनने की सुनकर ,बेगम मुस्कुराती हैं ,

मुसद्दस लिखने में मुश्किल हमें भी खूब आती है ,

महफ़िलें सुन मेरी ग़ज़लें ,मुसाफिरी पर जाती हैं ,

मसर्रत देख हाल-ए-दिल ,मुख्तलिफ ही हो जाती है .

मुकद्दर में है जो लिखा,पलट हम कर नहीं सकते ,

यूँ खाली पेट फिर-फिर कर तखल्लुस कह नहीं सकते .

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ज़बान पर अवाम की ,मेरे अशआर चढ़ जाएँ ,

मुक़र्रर हर मुखम्मस पर ,सुने जो मुहं से कह जाये ,

मुखालिफ भी हमें सुनने ,भरे उल्फत चले आयें ,

उलाहना न देकर बेगम ,हमारी कायल हो जाएँ .

नक़ल से ऐसी काबिलियत हैं खुद में भर नहीं सकते ,

यूँ सारी रात जग-जगकर तखैयुल कर नहीं सकते .

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शहंशाही मर्दों की ,क़ुबूल की है कुदरत ने ,

सल्तनत कायम रखने की भरी हिम्मत हुकूमत ने ,

हुकुम की मेरे अनदेखी ,कभी न की हकीकत ने ,

बनाया है मुझे राजा ,यहाँ मेरी तबीयत ने .

तरबियत ऐसी कि मूंछे नीची कर नहीं सकते ,

तकब्बुर में घिरे ऐसे कभी भी झुक नहीं सकते .

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मुहब्बत करके भी देखो, किसी से बंध नहीं सकते ,

दिलकश हर नज़ारे को, यूँ घर में रख नहीं सकते ,

बुलंद इकबाल है अपना ,बेअदबी सह नहीं सकते

चलाये बिन यहाँ अपनी ,चैन से रह नहीं सकते .

चढ़ा है मतलब सिर अपने ,किसी की सुन नहीं सकते ,

शरम के फेर में पड़कर, तकल्लुफ कर नहीं सकते .

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शख्सियत है बनी ऐसी ,कहे ये ”शालिनी ”खुलकर ,

सही हर सोच है इनकी,भले बैठें गलत घर पर .

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शब्दार्थ-तखल्लुस-उपनाम ,तखैयुल-कल्पना ,तकब्बुर-अभिमान ,तकल्लुफ-शिष्टाचार ,मुसन्निफ़-लेखक,मुसाफिरी-यात्रा ,मसर्रत-ख़ुशी ,मुख्तलिफ -अलग

मुसद्दस -उर्दू में ६ चरणों की कविता ,मुखम्मस-५ चरणों की कविता ,मुखालिफ-विरोधी ,उल्फत-प्रेम, उलाहना -शिकायत ,कायल-मान लेना ,तरबियत-पालन-पोषण ,बुलंद इकबाल -भाग्यशाली

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

धर्म का.. दिया बुझाके चल दिये.





     कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने कहा है -
  ''जितनी देखी दुनिया सबकी दुल्हन देखी ताले में
   कोई कैद पड़ा मस्जिद में ,कोई बंद शिवाले में ,
    किसको अपना हाथ थमा दूं किसको अपना मन दे दूँ ,
   कोई लूटे अंधियारे में ,कोई ठगे उजाले में .''
धर्म के   ये ही दो रूप हमें भी दृष्टिगोचर होते हैं .कोई धर्म के पीछे अँधा है तो किसी के लिए धर्म मात्र दिखावा बनकर रह गया है .धर्म के नाम पर सम्मेलनों की ,विवादों की ,शोर-शराबे की संख्या तो दिन-प्रतिदिन तेजी से बढती जा रही है लेकिन जो धर्म का मर्म है उसे एक ओर रख दिया गया है .आज जहाँ देखिये कथा वाचक कहीं भगवतगीता ,कहीं रामायण बांचते नज़र आयेंगे ,महिलाओं के सत्संगी संगठन नज़र आएंगे .विभिन्न समितियां कथा समिति आदि नज़र आएँगी लेकिन यदि आप इन धार्मिक समारोहों में कथित सौभाग्य से  सम्मिलित होते हैं तो ये आपको पुरुषों का  बड़े अधिकारियों, नेताओं से जुड़ने का बहाना ,महिलाओं का एक दूसरे की चुगली करने का बहाना  ही नज़र आएगा .
     दो धर्म विशेष ऐसे जिनमे एक में संगीत पर पाबन्दी है तो गौर फरमाएं तो सर्वाधिक कव्वाली,ग़ज़ल गायक आपको उसी धर्म विशेष में मिलेंगे और एक अन्य धर्म के प्रवचन स्थल पर उन उपदेशों को दरकिनार कर उनके ही धर्मावलम्बियों का बड़ी संख्या आगमन भी दिखेगा .
     धर्मान्धता देखकर ही कबीर दास ने कहा था -
''पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार ,
ताते ये चाकी भली ,पीस खाए संसार .''

''कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाये ,
ता चढ़ी मुल्ला बाँगी  दे ,क्या बहरा हुआ खुदाए .''
इन  धर्मों के कामों में यदि कुछ कहा जाये तो बबाल पैदा हो जाते हैं  और न कहने पर जो शोर-शराबे की मार पड़ती है वह असहनीय है .लाउडस्पीकर ,जेनरेटर,डी.जे.जैसे अत्याधुनिक यंत्रों के प्रयोग ने आज जनता को वास्तव में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के रूप में सिरदर्द दे दिया है .रोज कोई न कोई आयोजन है और प्रतिदिन उपदेशों के नदियाँ बह रही हैं .फिर भी देश समाज के हाल बेहाल हुए जा रहे हैं .
   कहीं भजन बजता है -
''भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना ,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम कांटे बनकर मत रहना .''

लोग गाते हैं गुनगुनाते हैं ,तालियाँ बजाते हैं और करते क्या हैं वही जो करना है -लूट -खसोट ,इधर का मॉल उधर -उधर का मॉल इधर .चारों ओर ढकोसले बाजी चल रही है ..भगवा वेश में २५-३० लोगों की बस रोज किसी न किसी शहर में पहुँचती है ,दिन निर्धारित है किस किस दिन आएंगे .भगवा वस्त्र पहनकर आते हैं लोगों से, दुकानदारों से धार्मिक भावना के नाम पर ५०-५० पैसे लेते हैं और अपने अड्डे पर पहुंचकर शराब ,जुए,भांग में उड़ाते हैं .धर्म आज ऐसे ही दिखावों का केंद्र बनकर रह गया है .
     जगह जगह आश्रम खुले हैं .अन्दर के धंधे सभी जानते हैं यही कि ये आश्रम राजनीतिज्ञों के दम पर फल फूल रहे हैं और आम जनता बेवकूफ बन उन साधू महात्माओं के चरण पूज रही है .जिनके काले कारनामे आये दिन सभी के सामने आ रहे हैं .कहने को इन साधू संतों को सांसारिक माया-मोह से कुछ लेना -देना नहीं और  सांसारिक  सुख सुविधा का हर सामान इनके आश्रमों में भरा पड़ा है .दिन प्रतिदिन आश्रमों की चारदीवारी बढती जा रही है और कितने ही अपराधिक कार्य यहाँ से संचालित किये जाते हैं और प्रशासन जनता में इनके प्रति निष्ठा के कारण उसके भड़कने की आशंका से इनपर हाथ डालते हुए घबराते हैं और इसी का दुष्प्रभाव है कि आज जनता की धर्मान्धता का लाभ उठाकर ये आश्रम बहुत बड़े क्षेत्र को निगलते जा रहे हैं .
   इसी कारण लगता है कि आज धर्म भी जनता से अपना पीछा छुड़ाने के मूड में है क्योंकि जो काम आज धर्मस्थलों से संचालित हो रहे हैं और धर्म के नाम पर संचालित किये जा  रहे है उन्हें हमारे किसी भी धर्म ने महत्व नहीं दिया .इसलिए लगता है कि धर्म भी आज यही कह रहा है -
''वो आये मेरी कब्र पे दिया बुझाके चल दिए ,
दिए में जितना तेल था सर पे लगाके चल दिए .''
           शालिनी कौशिक
                  [कौशल ]


मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

तेजाबी गुलाब है मीडिया का वैलेनटाइन


  ''गूंजे कहीं शंख कहीं पे अजान है ,                             
  बाइबिल है ,ग्रन्थ साहब है,गीता का ज्ञान है ,
दुनिया में कहीं और ये मंजर नहीं नसीब ,
  दिखलाओ ज़माने को ये हिंदुस्तान है .''
 ऐसे हिंदुस्तान में जहाँ आने वाली  पीढ़ी के लिए आदर्शों की स्थापना और प्रेरणा यहाँ के मीडिया का पुनीत उद्देश्य हुआ करता था .स्वतंत्रता संग्राम के समय मीडिया के माध्यम से ही हमारे क्रांतिकारियों ने देश की जनता में क्रांति का बिगुल फूंका था .आज जिस दिशा में कार्य कर रहा  हैं वह कहीं से भी हमारी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक व् प्रेरक नहीं कहा जा सकता .आज १४ फरवरी वेलेंटाइन डे के नाम से विख्यात है .एक तरफ जहाँ इस दिन को लेकर युवाओं के दिलों की धडकनें तेज़ हो रही हैं वहीँ दूसरी ओर लाठियां और गोलियां भी चल रही हैं और इस काम में बढ़ावा दे  रहा है हमारा मीडिया -आज का मीडिया .
     जहाँ एक ओर मीडिया की सुर्खियाँ हुआ करती थी -
''जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं ,
 वह ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .''

''पूछा उसने क्या नाम बता ?
  आज़ाद !पिता को क्या कहते ?
  स्वाधीन पिता का नाम ,और बोलो किस घर में हो रहते ?
  कहते हैं जेलखाना जिसको वीरों का घर है
   हम उसमे रहने वालें हैं ,उद्देश्य मुक्ति का संघर्ष है .''

आज प्रमुखता दे रहा है -
''यूँ मेरे ख़त का जवाब आया ,
     लिफाफे में एक गुलाब आया .''
एक तरफ सत्य का उजाला ,एक तरफ समाज की वास्तविकता ,राजनीति की कालिख सबके सामने लेन का विश्वास दिलाने वाला मीडिया आज युवाओं को बेच रहा है विदेशी संस्कृति जिसे भारतीय अपसंस्कृति भी कह सकते हैं ,गलत प्रवर्तियाँ भी कह सकते हैं .प्यार जिसके लिए भारतीय संस्कृति में जो भाव विद्यमान है उसे देवल आशीष अपने शब्दों में यूँ व्यक्त करते हैं -
''  प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है ,
पुण्य धाम जिसमे कि राधिका है श्याम है ,
श्याम की मुरलिया की ,हर गूँज प्यार है ,
प्यार कर्म प्यार धर्म ,प्यार प्रभु नाम है .''
भारतीय मीडिया द्वारा बिकाऊ श्रेणी में लाया जा रहा है .रोम के संत वेलेंटाइन के नाम पर मनाया जाने वाला यह सप्ताह भारत में समाचार पत्रों द्वारा जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा है .७ फरवरी से ही रोज हमारे समाचार पत्र बताते हैं -
''आज से बहेगी गुलाबी बयार ''
''आज रोज़ डे .आज प्रोमिस डे,चोकलेट डे ,प्रपोज डे ,ऐसे करें प्रपोज आदि आदि .''
 यही नहीं ज्योतिषी आकलन कर भी बताया जाता है कि किस किस के लिए रोज़ डे अच्छा रहेगा किसके लिए प्रपोज डे, कपडे का रंग कैसा हो और इनके अच्छे रहने के लिए ज्योतिषी उपाय भी बताये जाते हैं जिनके जरिये लड़की के बाप-भाई, समाज के संस्कारों के ठेकेदारों रुपी विपत्तियों  से बचा जा सकता है .कुल मिलाकर  यही कहा जा सकता है कि बाज़ार में बिकने के लिए और विश्व में सर्वाधिक पठनीय ,रेटिंग आदि उपलब्धियां अर्जित करने के लिए मीडिया के ये अंग भारतीय समाज में आवारागर्दी को बढ़ावा दे रहे हैं .ये आज की फ़िल्में हैं जो प्यार के नाम पर वासना का भूत युवाओं के सिर पर चढ़ा रही हैं .ये समाचार पत्र हैं  जो अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए कहीं फेयरवेल समारोह के तो कहीं फ्रेशर पार्टी में लड़के लड़कियों के युगल नृत्यों के चित्र छाप रहे हैंमीडिया के इन अंगों में हीरोइनों के अश्लील चित्रों का ही असर है कि लड़कियां जो पहले भारतीय  परिधानों में गौरवान्वित महसूस करती थी आज कपडे छोटे करने में खुद को हीरोइन बनाने में [और वह भी फ़िल्मी न कि ऐतिहासिक ] जुटी हैं .ये फ़िल्मी असर ही है कि दिन रात  कभी भी लड़के लड़कियों के जोड़े शहरों में अभद्र आचरण करते घूमते हैं  और ये समाचार पत्रों की ही कारस्तानी है जो वासना ,आकर्षण में डूबे इन जोड़ों को प्रेमी युगल कहकर सम्मानित करता है .ये ऐसे सम्मान का ही असर है कि दामिनी जैसी गैंगरेप की घटनाएँ घट  रही हैं और बढती जा रही हैं .क्योंकि जब सभ्य समाज कहे जाने वाले  ये युवा खुद पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं तो जंगली ,गंवार कहे  जाने वाले वे युवा तो पहले ही से नियंत्रण जैसी भावनाओं को जानते ही नहीं ,उनका कहना तो मात्र ये होता है ''-जब तू एक के साथ फिर सकती है तो हमारे साथ क्यों नहीं ,हम ही क्या बुरे ?''ये हमारा मीडिया ही है जो चार बच्चों की माँ को भी ''प्रेमिका '' कहकर संबोधित करता है .क्या नहीं जानता कि ये भारतीय समाज है जहाँ की संस्कृति में लड़कियों को शर्म लाज से सजाया जाता है और लड़कों को बड़ों का  आज्ञा पालन व् आदर करना सिखाया जाता है .यह वह संस्कृति है जहाँ सीता राम को पसंद करते हुए भी माँ गौरी से प्रार्थना करती हैं -
''..........करहूँ चाप गुरुता अति थोरी .''
अर्थात हे माँ धनुष को थोडा हल्का कर दीजिये .''वे अपनी चाहत माँ गौरी की आराधना से पूरी करना चाहती हैं न कि पिता का प्रण  तोड़ राम के साथ घर से भागकर .ऐसे ही राम सीता के प्रति आसक्त होते हुए भी गुरु विश्वामित्र की आज्ञा के पश्चात् ही धनुष को उठाने को आगे बढ़ते हैं-
   ''.....उठहु राम भंजहु भव चापा ,
   मेटहु तात जनक के तापा .''
 और पिता दशरथ की आज्ञा की प्राप्ति के पश्चात् ही सीता को वधू के रूप में स्वीकार करते हैं .ये भारतीय संस्कृति ही है जो राम कृष्ण दोनों के भगवान  होने पर भी राम की सर्व-स्वीकार्यता स्थापित करती है उनका मर्यादा पुरुषोत्तम होना और सीता का मर्यादा का पालन करना ही वह गुण है जो सभी पुत्र रूप में राम की और पुत्री रूप में सीता की कामना करते हैं .
   आज भारतीय मीडिया अपने सांस्कृतिक स्वरुप को खो रहा हैं और विदेशों के खुले वातावरण को जहाँ संस्कारों के लिए कोई स्थान ही नहीं है यहाँ मान्यता दिलाने का प्रयास कर रहे हैं किन्तु यहाँ ऐसे प्रयास कुचेष्टाएं ही कही जाएँगी क्योंकि भारत में इन्हें कभी भी मान्यता नहीं मिल सकती जो ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ अपनाने के फेर में अपनी संस्कृति की उपेक्षा करते हैं उनको डिम्पल मिश्र जैसे अंजाम भुगतने पड़ते हैं .आज मीडिया युवाओं को उकसाकर उन्हें रोज़ डे ,प्रोमिस डे,प्रोपोज डे ,हग डे ,चोकलेट डे जैसे भ्रमों में डालकर  जो कार्य करने को उन्हें आगे बढ़ा रहा है उसे यहाँ की देसी भाषा में ''आवारागर्दी ''कहते हैं और उसका परिणाम शिव सैनिकों की उग्रता के रूप में दुकानों को भुगतना पड़ता है. आज जिस चेहरे में ख़ूबसूरती के चाँद नज़र आते हैं कल को उसे अपने से अलग होने पर तेजाब से झुलसा दिया जाता है और ये लड़की के लिए जीवन भर का अभिशाप बनकर रह जाता है .आज मीडिया के इसी गलत प्रचार का ही परिणाम है की लड़कियां गोली का ,तेजाब का शिकार हो रही है ,लड़के अपराध या फिर आत्महत्या की राह पर आगे बढ़ रहे हैं .आज गुलामी का समय नहीं है किन्तु मीडिया का दायित्व आज भी बहुत अधिक है क्योंकि इसका प्रभाव भी बहुत अधिक है .मीडिया लोकतंत्र का एक मजबूत  स्तम्भ है और उसे जानना ही होगा कि हम भले ही कितने अग्रगामी हो जाएँ किन्तु हमारी संस्कृति में भाई भले ही किसी से प्यार कर ले किन्तु अपनी बहन को उस राह पर आगे बढ़ते नहीं देख सकता और ये भी हमारी संस्कृति ही है जो आई ए एस में सर्वोच्च रेंक हासिल करने वाली शेन अग्रवाल से भी विवाह के सम्बन्ध में माता -पिता की ही सोच को मान्यता दिलाती है .इस संस्कृति के ही कारण हमारे परिवार ,हमारा समाज विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं विदेशियों को आकर्षित करते हैं और जोड़ते हैं हमें किसी और संस्कृति की नक़ल करने की कोई आवश्यकता ही नही है और इसलिए मेरा भारतीय मीडिया से हाथ जोड़कर निवेदन है कि मीडिया हमें भारतीय ही बने रहने दे विदेशी सोच में ढलने की कोशिश  न करे .क्योंकि हम कितने सक्षम हैं ये हम तो जानते ही हैं मीडिया भी जान ले-
''जब जीरो दिया मेरे भारत ने ,दुनिया को तब गिनती आई ,
तारों की भाषा भारत ने दुनिया को पहले सिखलाई ,
देता न दशमलव भारत तो यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था ,
धरती और चाँद की दूरी का अंदाजा लगाना मुश्किल था ,
सभ्यता जहाँ पहले आई पहले जनमी है जहाँ पे कला ,
अपना भारत वो भारत है जिसके पीछे संसार चला ,
संसार चला और आगे बढ़ा यूँ आगे बढ़ा बढ़ता ही गया ,

भगवान् करे ये और बढे ,बढ़ता ही रहे और फूले फले .''
इसलिए मीडिया आज के इस दिन माँ भारतीको

पूजे न कि रोम की संस्कृति वेलेंटाइन को 
वक्त के रंग में यूँ न ढल जिंदगी ,
     अब तो अपना इरादा बदल जिंदगी ,
असलियत तेरी खो न जाये कहीं ,
   यूँ न कर दूसरों की नक़ल जिंदगी .


  
       शालिनी कौशिक
              [कौशल ]
     

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

प्यार से भी मसलों का हल निकलता है.



"  प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है.

पुण्य धाम जिसमे कि राधिका है श्याम  है .

श्याम की मुरलिया की हर गूँज प्यार है.

प्यार कर्म प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है."

एक तरफ प्यार को "देवल आशीष"की उपरोक्त पंक्तियों से विभूषित किया जाता है तो एक तरफ प्यार को "बेकार बेदाम की चीज़ है"जैसे शब्दों से बदनाम किया जाता है.कोई कहता है जिसने जीवन में प्यार नहीं किया उसने क्या किया?प्यार के कई आयाम हैं जिसकी परतों में कई अंतर कथाएं    छिपी हैं .प्रेम विषयक दो विरोधी मान्यताएं हैं-एक मान्यता के अनुसार यह व्यर्थ चीज़ है तो एक के अनुसार यह  जीवन में सब कुछ है .पहली मान्यता को यदि देखा जाये तो वह भौतिकवाद  से जुडी है .जमाना कहता है कि लोग प्यार की अपेक्षा दौलत को अधिक महत्व देते हैं लेकिन यदि कुछ नए शोधों पर ध्यान दें तो प्यार का जीवन में स्थान केवल आकर्षण तक ही सीमित  नहीं है वरन प्यार का जीवन में कई द्रष्टिकोण  से महत्व है .न्यू   हेम्पशायर विश्व विध्यालय के प्रोफ़ेसर एडवर्ड लीमे और उनके येल विश्व विध्यालय के साथियों ने शोध में पाया कि जिन लोगों को दुनिया में बहुत प्यार और स्वीकृति मिलती है वे भौतिक वस्तओं को कम तरजीह देते हैं.वे लोग जिन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें लोग ज्यादा प्यार नहीं करते और अपना नहीं मानते ,वे भौतिक चीजों से ज्यादा जुड़े होते हैं .शोध कर्ताओं ने १८५ लोगों पर शोध किया और पाया कि दूसरी तरह के लोग ,पहली तरह के लोगों के मुकाबले वस्तओं को पांच गुना महत्व दे रहे थे .इसका सीधा साधा अर्थ यह है कि जिन्हें जीवन में प्रेम और जुडाव की कमी ज्यादा महसूस होती है वे चीज़ों के प्रति ज्यादा लगाव महसूस करते हैं या उनमे असुरक्षा की भावना होती है जिसे वे भौतिक उपलब्धियों के जरिये पूरा करने की कोशिश करते हैं .जाहिर है कि जिसको यह लगता है कि आसपास के लोग उसे प्यार नहीं करते या उसे अपना नहीं मानते वह असुरक्षित महसूस करने लगता है और तब उसे लगेगा कि दुनियावी चीज़ें ही उसे सहारा और सुरक्षा दे सकेंगी.

अमेरिका के स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक हालिया शोध में पता चला है कि प्रेम के कारण उपजे दर्दे दिल का इलाज भी प्रेम की अनुभूति से ही होता है .शोधकर्ताओं ने कुछ छात्रों को हल्का शारीरिक दर्द पहुंचाते हुए उनकी प्रतिक्रियाएं रिकॉर्ड  की .गौरतलब है कि अधिकांश छात्र प्रेम की शुरूआती अवस्था में थे ,और पाया कि छात्रों के सामने उनके प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर रखने पर उनका ध्यान मामूली सा बँटा .शोध में सभी छात्रों के मस्तिष्क का स्कैन  किया गया  था .शोध में शामिल डॉ.जेरेड यंगर का कहना है "कि प्रेम एक दर्द निवारक का भी काम करता है."

असलम कोल असली ने कहा है-

"कभी इश्क करो और फिर देखो,

इस आग में जलते रहने से

कभी दिल पर आंच नहीं आती

कभी रंग ख़राब नहीं होता."

प्रेम के बारे में कवि, दार्शनिक,प्रेमीजन आदि ऐसे विचार व्यक्त करते ही रहे हैं किन्तु प्रेम न  सिर्फ कलाकारों,लेखकों और दार्शनिकों को प्रेरित करता है अपितु आम इंसानों की रोजमर्रा की जिन्दगी में आने वाली परेशानियों से और तनावों से उबरने में भी मदद करता है .वाशिंगटन पोस्ट ने एक शोध के बारे में बताते हुए कहा कि यदि हमारा करीबी भावनात्मक संबल या सलाह दे तो नकारात्मक विचारों या तनाव  से आसानी से  उबरा जा सकता है .शोध के दौरान उन्होंने पाया कि एक खुशहाल दंपत्ति का ब्लड  प्रेशर अविवाहित लोगों के मुकाबले कम था .हालाँकि बुरे वैवाहिक संबंधों से गुजर रही जोड़ी का ब्लड प्रेशर सबसे ज्यादा पाया गया.प्रेम सम्बन्ध जिन्दगी को मायने और अर्थ देते हैं .एरोन ने पाया कि "प्यार का एहसास मस्तिष्क के डोपेमायीं रिवार्ड सिस्टम को सक्रिय कर देता है  .ख़ुशी और प्रेरणा जैसी भावनाओं के लिए दिमाग का यही हिस्सा जिम्मेदार है.

प्रेम के क्षेत्र में बाधा बनकर आज "एड्स "भी उपस्थित हुआ है  किन्तु इस बीमारी के लिए भी कहा जाता है  कि "एड्स के रोगी को नफरत नहीं प्यार दीजिये,इससे उसकी उम्र बढ़ेगी रोग घटेगा."इस बात की पुष्टि की है  स्विट्ज़रलैंड स्थित वेसल इंस्टीट्यूट फार क्लिनिकल अपिदेमोलोग्य ने.रिपोर्ट के अनुसार अगर एड्स प्रभावित रोगी प्यार पाए ,रोमांस करे तो उसकी जीवन अवधि बढ़ जाती है  .शोधकर्ता डॉ.हेनर सी.बचर ने अपने प्रयोग को एक बड़े समूह पर किया .हैरान करते परिणाम यह थे कि जो रोगी घबराये हुए थे और जीने की आस छोड़ चुके थे उनमे न केवल जीने की लालसा बढ़ी बल्कि वे नई स्फूर्ति से भर गए.शोधकर्ता का मानना  है  कि उनके परीक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि "प्यार और स्वास्थ्य साथसाथ चलता है ."

इस प्रकार देखा जाये तो प्रेम ही जीवन  ऊर्जा का शिखर है  जिसने प्रेम को जान लिया उसने सब जान लिया,जो प्रेम से वंचित रहा वह सबसे वंचित रह गया .प्रेम का अर्थ है  समर्पण की दशा जहाँ दो मिटते है  और एक बचता है  .जिसे अपने लक्ष्य से,सहस से ,उद्देश्य से जरा भी प्रेम है  वह स्वयं को मिटा देता है  .यही सच्चा प्रेम है  रही और मंजिल एक हो जाते हैं .जीवन आनंद की सच्ची रह वहीँ से निकलती है  .कबीर ने भी कहा है -

"प्रेम न हाट बिकाय"

अर्थात प्रेम किसी बाज़ार में नहीं बिकता.प्यार के मायने बदल सकते हैं किन्तु सच्चे प्रेम का स्वरुप कभी नहीं बदल सकता.सच्चा प्रेम वह महक है  जो हर दिशा को महकाती है  .सच्चे प्रेम को तलवार की धार कहा जाता है  और हर किसी के बस का इस पर चलना नहीं होता.इसलिए सच्चा प्रेम कम ही दिखाई देता है .वर्तमान युवा पीढ़ी प्रेम की और अग्रसर  है  किन्तु उसके लिए सच्चे  प्रेम का स्वरुप कुछ अलग है  .होटल मैनजमेंट   कर रही पारुल के अनुसार-"प्रेम को मैं तलवार की धार नहीं मानती हूँ  पर हंसी  खेल  भी नहीं मानती हूँ .मेरा  मानना है  कि ये  एक दैवीय  एहसास  है  जिसे सिर्फ  महसूस  किया जा  सकता है  ,व्यक्त  नहीं किया जा  सकता है ."

पल्लवी  कहती   हैं-"प्रेम करना  आसान  लग  सकता है  पर यह निभाना  उतना  ही मुश्किल  है .ये  एक ऐसा  करार  है   जो कभी ख़त्म  नहीं होता है  ."

ये  तो प्रेम का एक रूप  है  .प्रेम तो कई    स्वरूपों  में ढला  है .देश  प्रेम,प्रभु  प्रेम.मानव  प्रेम,मातृ -प्रेम पितृ  प्रेम,पुत्र  प्रेम आदि  इसके  अनेको  स्वरुप हैं.प्रभु  ईसा  मसीह  ने सभी  प्राणियों , अपने पड़ोसियों  आदि  से प्रेम का सन्देश  दिया .गुरु  नानक  ने प्रेम करने  वालो  को सारी  दुनिया  में बिखर  जाने   का आशीर्वाद  दिया  ताकि  वे प्यार को सारेजहाँ  में फैला  सकें .सभी  धर्मो  के गुरु  जन प्राणी  मात्र   को प्रेम का सन्देश  देते  हैं और आपस  में मिलजुल  कर रहने  की शिक्षा  देते  हैं.उनका  भी मानना है  कि प्रेम वह है  जो अपने प्रिय  के हित  में सर्वस्व  त्याग  करने  को तैयार  रहता  है  .प्यार त्याग  करता  है  बलिदान  नहीं मांगता .प्रेम की ही महिमा  को हमारे  कविजनो  ने  अलग अलग तरह  से वर्णित  किया है    -

देश -प्रेम

"जो भरा  नहीं  भावों  से बहती  जिसमे  रसधार  नहीं ,

वह ह्रदय  नहीं है  पत्थर  है  जिसमे  स्वदेश  का प्यार  नहीं ."

मानव  प्रेम-

"यही  प्रवृति  है  जो आप  आप  ही चरे ,

मनुष्य  है  वही  जो मनुष्य  के लिए मरे."

प्रेमी जनों  का प्यार यहाँ देखिये-

"जब जब कृष्ण की बंसी बाजी  निकली राधा सज के

जान अजान का ध्यान भुला के लोक लाज को तज के ,

वन वन डोली जनक दुलारी पहन के प्रेम की माला,

दर्शन जल की प्यासी मीरा पी गयी विष का प्याला."

 मातृ पितृ भक्ति कहे या मातृ   पितृ प्रेम -इसके वशीभूत हो श्रवण कुमार माता पिता को कंधे पर बिठाकर तीर्थ यात्रा करते हैं,पितृ भक्ति में परशुराम माता का गला काट देते हैं,मात्र भक्ति में श्री गणेश भगवान भोलेनाथ से अपना मस्तक कटवा देते हैं और पुत्र प्रेम में माँ पार्वती भयंकर रूप धारण करती हैं और गणेश को भोलेनाथ से पुनर-जीवन दिलवाकर उन्हें देवताओं में प्रथम पूज्य के स्थान पर विराजमान कराती हैं.

सच पूछा जाये तो दुनिया की समस्त समस्याओं का हल प्रेम में है.अनादर,उपेक्षा,द्वेष,ईर्षा और अंधी स्पर्धा की मारी हुई इस दुनिया में हर व्यक्ति हर प्रसंग एक बिदके हुए घोड़े की तरह हमारा वजूद कुचलने को उद्धत घूम  रहा हो तब आहत अहम् पर यह    कितना बड़ा मरहम है की कोई तो है जो मेरी कद्र करता है,कोई तो है जिसकी आँखों में मुझे देख चमक पैदा होती है .मुझे देखकर जो मेरी भलमन साहत पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता.

इस तरह यदि हम विचार करें तो प्रेम का जीवन में वास्तविक महत्व जीवन अस्तित्व से है और अस्तित्व ऐसा की -

"हज़ार बर्फ गिरें लाख आंधियां चलें

वो फूल खिलकर रहेंगे जो खिलने  वाले हैं,"

प्यार से बढ़कर कुछ नहीं और सच्चा  प्रेम वही  है जो रोते को हंसी दे ,गिरते को उठने की ताक़त दे

मरणासन्न व्यक्ति में   जान फूँक दे.सच्चे प्रेम की महक  संसार महसूस करता है और सच्चे  प्रेम के आगे ये दुनिया झुकती है.सच्चा प्रेम  समस्याएँ मिटाता है चाहे दिलों की हों या देशों की.बलिउद्दी देवबंदी ने कहा  है-

"फैसले सब के सब होते नहीं तलवार से ,

प्यार से भी मसलों का हल निकलता है."

शालिनी कौशिक

(कौशल) 

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

भावुक सहनशील नारी शक्ति स्वरूप



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 ये सर्वमान्य तथ्य है कि महिला शक्ति का स्वरुप है और वह अपनों के लिए जान की बाज़ी  लगा भी देती है और दुश्मन की जान ले भी लेती है.नारी को अबला कहा जाता है .कोई कोई तो इसे बला भी कहता है  किन्तु यदि सकारात्मक रूप से विचार करें तो नारी इस स्रष्टि की वह रचना है जो शक्ति का साक्षात् अवतार है.धेर्य ,सहनशीलता की प्रतिमा है.जिसने माँ दुर्गा के रूप में अवतार ले देवताओं को त्रास देने वाले राक्षसों का संहार किया तो माता सीता के रूप में अवतार ले भगवान राम के इस लोक में आगमन के उद्देश्य को  साकार किया और पग-पग पर बाधाओं से निबटने में छाया रूप  उनकी सहायता की.भगवान विष्णु को अमृत देवताओं को ही देने के लिए और भगवान् भोलेनाथ  को भस्मासुर से बचाने के लिए नारी के ही रूप में आना पड़ा और मोहिनी स्वरुप धारण कर उन्हें विपदा से छुड़ाना पड़ा.
   हमारे संस्कृत ग्रंथों में कहा गया है -
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता."
       प्राचीन काल  का इतिहास नारी की गौरवमयी  कीर्ति से भरा पड़ा है.महिलाओं ने समय समय पर अपने साहस पूर्ण कार्यों से दुश्मनों के दांत खट्टे किये हैं.प्राचीन काल में स्त्रियों का पद परिवार में अत्यंत महत्वपूर्ण था.गृहस्थी का कोई भी कार्य उनकी सम्मति के बिना नहीं किया जा सकता था.न केवल धर्म व् समाज बल्कि रण क्षेत्र में भी नारी अपने पति का सहयोग करती थी.देवासुर संग्राम  में कैकयी ने अपने अद्वित्य रण कौशल से महाराज दशरथ को चकित किया था.
   गंधार के राजा रवेल की पुत्री विश्पला ने सेनापति का दायित्व स्वयं पर लेकर युद्ध किया .वह वीरता से लड़ी पर तंग कट गयी ,जब ऐसे अवस्था में घर पहुंची तो पिता को दुखी देख बोली -"यह रोने का समय नहीं,आप मेरा इलाज कराइये मेरा पैर ठीक कराइये जिससे मैं फिर से ठीक कड़ी हो सकूं तो फिर मैं वापस शत्रुओसे  सामना करूंगी ."अश्विनी कुमारों ने उसका पैर ठीक किया और लोहे का पैर जोड़ कर उसको वापस खड़ा किया -
" आयसी जंघा विश्पलाये अदध्यनतम  ".[रिग्वेद्य  १/ ११६]
इसके बाद विश्पला ने पुनः     युद्ध किया और शत्रु को पराजित किया.
   महाराजा  रितध्वज    की पत्नी      मदालसा ने अपने पुत्रों को समाज में जागरण के लिए सन्यासी बनाने का निश्चय किया .महाराजा   रितध्वज के आग्रह पर अपने आठवे पुत्र अलर्क को योग्य शासक बनाया.व् उचित समय पर पति सहित वन को प्रस्थान कर गयी.जाते समय एक यंत्र अलर्क को दिया व् संकट के समय खोलने का निर्देश दिया.कुछ दिनों बाद जब अलर्क के बड़े भाई ने उसे राजपाट सौंपने का निर्देश दिया तब अलर्क ने वह यंत्र खोला जिसमे सन्देश लिखा था-"संसार के सभी ईश्वर अस्थिर हैं तू शरीर मात्र नहीं है ,इससे ऊपर उठ."और उसने बड़े भाई को राज्य सौंप देने का निश्चय किया.सुबाहु इससे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें ही राज्य करते रहने का आदेश दिया.राजा  अलर्क को राज ऋषि की पदवी मिली .यह मदालसा की ही तेजस्विता थी जिसने ८ ऋषि तुल्य पुत्र समाज को दिए.
    तमलुक [बंगाल] की रहने वाली मातंगिनी हाजरा ने ९ अगस्त १९४२ इसवी में भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया और आन्दोलन में प्रदर्शन के दौरान वे ७३ वर्ष की उम्र में अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हुई और मौत के मुह में समाई .
                असम के दारांग जिले में गौह्पुर   गाँव की १४ वर्षीया बालिका कनक लता बरुआ ने १९४२ इसवी के भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया .अपने गाँव में निकले जुलूस का नेतृत्व इस बालिका ने किया तथा थाने पर तिरंगा झंडा फहराने के लिए आगे बढ़ी पर वहां के गद्दार थानेदार ने उस पर गोली चला दी जिससे वहीँ उसका प्राणांत हो गया.
इस तरह की नारी वीरता भरी कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है.और किसी भी वीरता,धैर्य        ज्ञान      की तुलना नहीं की जा सकती.किन्तु इस सबके बावजूद नारी को अबला  बेचारी  कहा जाता है.अब यदि हम कुछ और उदाहरण  देखें तो हम यही पाएंगे कि नारी यदि कहीं झुकी है तो अपनों के लिए झुकी है न कि अपने लिए .उसने यदि दुःख सहकर भी अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी है तो वह अपने प्रियजन    के दुःख दूर करने के लिए.
   कस्तूरबा गाँधी,जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में घूमकर महिलाओं में सत्याग्रह का शंख फूंका .चंपारण ,भारत छोडो आन्दोलन में जिनका योगदान अविस्मर्णीय रहा ,ने भी पतिव्रत धर्म के पालन के लिए कपडे धोये,बर्तन मांजे और   ऐसे ऐसे कार्य किये जिन्हें कोई सामान्य भारतीय नारी सोचना भी पसंद नहीं करेगी.
   महाराजा जनक की पुत्री ,रघुवंश की कुलवधू,राम प्रिय जानकी सीता ने पतिव्रत धर्म के पालन के लिए वनवास में रहना स्वीकार किया.
       हमारे अपने ही क्षेत्र की  एक कन्या मात्र इस कारण से जैन साध्वी के रूप में दीक्षित हो गयी कि उसकी बड़ी बहन के साथ उसके ससुराल वालों ने अच्छा व्यव्हार नहीं किया और एक कन्या इसलिए जैन साध्वी बन गयी कि उसकी प्रिय सहेली साध्वी बन गयी थी.
स्त्रियों का प्रेम, बलिदान ,सर्वस्व समर्पण ही उनके लिए विष बना है.गोस्वामी तुलसीदास जी नारी को कहते हैं-
"ढोल गंवार शुद्रपशु नारी,
     ये सब ताड़न के अधिकारी. "
    वे एक समय पत्नी  प्रेम में इतने पागल थे कि सांप को रस्सी समझ उस पर चढ़कर पत्नी  के मायके के कमरे में पहुँच गए थे.ऐसे में उनको उनकी पत्नी  का ही उपदेश था जिसने उन्हें विश्व वन्दनीय बना दिया था-
"अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीती,
       ऐसी जो श्रीराम में होत न तो भाव भीती."
इस तरह नारी को अपशब्दों के प्रयोग द्वारा    जो उसकी महिमा को नकारना चाहते हैं वे झूठे गुरुर में जी रहे हैं और अपनी आँखों के समक्ष उपस्थित सच को झुठलाना चाहते हैं .आज नारी निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही है .भावुकता सहनशीलता जैसे गुणों को स्वयं से अलग न करते हुए वह पुरुषों के झूठे दर्प के आईने को चकनाचूर कर रही है .अंत में नईम अख्तर के शब्दों में आज की नारी पुरुषों से यही कहेगी-
"तू किसी और से न हारेगा,
     तुझको तेरा गुरुर मारेगा .
        तुझको    दस्तार जिसने बख्शी है,
        तेरा सर भी वही उतारेगा ."

                               शालिनी  कौशिक   

              

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

उफ ये समाज और बेटियाँ


समाज की बलि चढ़ती बेटियां

'साहब !मैं तो अपनी बेटी को घर ले आता लेकिन यही सोचकर नहीं लाया कि समाज में मेरी हंसी उड़ेगी और उसका ही यह परिणाम हुआ कि आज मुझे बेटी की लाश को ले जाना पड़ रहा है .'' केवल राकेश ही नहीं बल्कि अधिकांश वे मामले दहेज़ हत्या के हैं उनमे यही स्थिति है दहेज़ के दानव पहले लड़की को प्रताड़ित करते हैं उसे अपने मायके से कुछ लाने को विवश करते हैं और ऐसे मे बहुत सी बार जब नाकामी की स्थिति आती है तब या तो लड़की की हत्या कर दी जाती है या वह स्वयं अपने को ससुराल व् मायके दोनों तरफ से बेसहारा समझ आत्महत्या कर लेती है .
   सवाल ये है कि ऐसी स्थिति का सबसे बड़ा दोषी किसे ठहराया जाये ? ससुराल वालों को या मायके वालों को ....जहाँ एक तरफ मायके वालों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होती है वहां ससुराल वालों को ऐसी चिंता क्यूं नहीं होती ?
   इस पर यदि हम साफ तौर पर ध्यान दें तो यहाँ ऐसी स्थिति का एक मात्र दोषी हमारा समाज है जो ''जिसकी लाठी उसकी भैंस '' का ही अनुसरण करता है और चूंकि लड़की वाले की स्थिति कमजोर मानी जाती है तो उसे ही दोषी ठहराने से बाज नहीं आता और दहेज़ हत्या करने के बाद भी उन्ही दोषियों की चौखट पर किसी और लड़की का रिश्ता लेकर पहुँच जाता है क्योंकि लड़कियां तो ''सीधी गाय'' हैं चाहे जिस खूंटे से बांध दो .
       मुहं सीकर ,खून के आंसू पीकर ससुराल वालों की इच्छा पूरी करती रहें तो ठीक ,यदि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा दें तो यह समाज ही उसे कुलता करार देने से बाज नहीं आता .पति यदि अपनी पत्नी से दोस्तों को शराब देने को कहे और वह दे दे तो घर में रह ले और नहीं दे तो घर से बाहर खड़ी करने में देर नहीं लगाता  .पति की माँ बहनों से सामंजस्य बैठाने की जिम्मेदारी पत्नी की ,बैठाले तो ठीक चैन की वंशी बजा ले और नहीं बिठा पाए तो ताने ,चाटे सभी कुछ मिल सकते हैं उपहार में और परिणाम वही ढाक के तीन पात  रोज मर-मर के जी या एक बार में मर .
    ये स्थिति तो तथाकथित आज के आधुनिक समाज की है किन्तु भारत में अभी भी ऐसे समाज हैं जहाँ बाल विवाह की प्रथा है और जिसमे यदि दुर्भाग्यवश वह बाल विधवा हो जाये तो इसी समाज में बहिष्कृत की जिंदगी गुजारती है ,सती प्रथा तो लार्ड विलियम बैंटिक के प्रयासों से समाप्त हो गयी किन्तु स्थिति नारी की  उसके बाद भी कोई बेहतर हुई हो ,कहा नहीं जा सकता .आज भी किसी स्त्री के पति के मरने पर उसका जेठ स्वयं शादी शुदा बच्चों का बाप होने पर भी उसे ''रुपया '' दे घरवाली बनाकर रख सकता है .ऐसी स्थिति पर न तो उसकी पत्नी ऐतराज कर सकती है और न ही भारतीय कानून ,जो की एक जीवित पत्नी के रहते हुए दूसरी पत्नी को मान्यता नहीं देता किन्तु यह समाज मान्यता देता है ऐसे रिश्ते को .
     इस समाज में कहीं  से लेकर कहीं तक नारी के लिए साँस लेने के काबिल फिजा नहीं है क्योंकि यदि कहीं भी कोई नारी सफलता की ओर बढती है या चरम पर पहुँचती है तो ये ही कहा जाता है कि सामाजिक मान्यताओं व् बाधाओं को दरकिनार कर उसने यह सफलता हासिल की .क्यूं समाज में आज भी सही सोच नहीं है ?क्यूं सही का साथ देने का माद्दा नहीं है ?सभी कहते हैं आज सोच बदल रही है कहाँ बदल रही है ?जरा वे एक ही उदाहरण सामने दे दे जिसमे समाज के सहयोग से किसी लड़की की जिंदगी बची हो या उसने समाज के सहयोग से सफलता हासिल की हो .ये समाज ही है जहाँ तेजाब कांड पीड़ित लड़कियों के घर जाने मात्र से ये अपने कदम मात्र इस डर से रोक लेता हो कि कहीं अपराधियों की नज़र में हम न आ जाएँ ,कहीं उनके अगले शिकार हम न बन जाएँ और इस बात पर समाज अपने कदम न रोकता हो न शर्म महसूस करता हो कि अपराधियों की गिरफ़्तारी पर थाने जाकर प्रदर्शन द्वारा उन्हें छुडवाने की कोशिश की जाये .
 इस समाज का ऐसा ही रूप देखकर कन्या भ्रूण हत्या को जायज़ ही ठहराया जा सकता है क्योंकि -
   ''क्या करेगी जन्म ले बेटी यहाँ ,
        साँस लेने के काबिल फिजा नहीं .
    इस अँधेरे को जो दूर कर सके ,
       ऐसा एक भी रोशन दिया नहीं .''
          शालिनी कौशिक
                    [एडवोकेट ]

न भाई ! शादी न लड्डू

  ''शादी करके फंस गया यार ,     अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उ...