बुधवार, 26 जुलाई 2017

बनोगी उसकी ही कठपुतली

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माथे ऊपर हाथ वो धरकर
बैठी पत्थर सी होकर
जीवन अब ये कैसे चलेगा
चले गए जब पिया छोड़कर
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बापू ने पैदा होते ही
झाड़ू-पोंछा हाथ थमाया
माँ ने चूल्हा-चौका दे दिया
चकला बेलन हाथ थामकर .
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पढ़ना चाहा पाठशाला में
बाबा जी से कहकर देखा
बापू ने जब आँख तरेरी
माँ ने डांट दिया धमकाकर .
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आठ बरस की होते मुझको
विदा किया बैठाकर डोली
तबसे था बस एक सहारा
मेरे पिया मेरे हमजोली .
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उनके बच्चे की माता थी
उनके घर की चौकीदार
सारा जीवन अपना देकर
मिला न एक भी खेवनहार .
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आज गए वो मुझे छोड़कर
घर-गृहस्थी कहीं और ज़माने
बच्चों का भी लगा कहीं मन
मुझको सारे बोझ ही मानें .
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व्यथा कहूं क्या इस जीवन की
जिम्मेदारी है ये खुद की
मर्द के हाथ में दी जब डोरी
बनोगी उसकी ही कठपुतली .
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शालिनी कौशिक
    [कौशल]

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (29-07-2017) को "तरीक़े तलाश रहा हूँ" (चर्चा अंक 2681) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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